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सीरिया में जारी जंग अब अपने आठवें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। इसके बावजूद भारतीय मीडिया ने इस पर अभी तक बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया है जबकि यह इक्कीसवीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक घटनाओं में से एक है। पिछले सात साल में 5 लाख से ज्यादा लोग इस युद्ध में मारे जा चुके हैं। सीरिया के भीतर और बाहर एक करोड़ से ज्यादा लोग शरणार्थी बनने को मजबूर हुए हैं।

इस मानव निर्मित मानवीय आपदा को लेकर दुनिया की नींद तब खुली जब वर्ष 2014 में यूनान के तट पर शरणार्थियों का आवागमन शुरू हुआ। वे आसरे की तलाश में पैदल ही महाद्वीप को लांघना शुरू कर चुके थे। उनके अपने यहां पहुंचने पर बहुत-से देश सकते में आ गए। कुछ ने तो इनक प्रवेश रोकने के लिए भौतिक अवरोध तक खड़े कर दिए।

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कहानी शुरू होती है 2011 में, जब सीरिया में तख्‍तापलट करने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिम और खाड़ी के देशों के एक गठबन्धन ने काम करना शुरू किया था। ऐसा अलावी सम्प्रदाय (शिया) से जुड़े सीरिया के राष्ट्रपति असद के ईरान और रूस से नजदीकी सम्बन्धों के चलते किया गया था। इस गठबन्धन में तुर्की, सउदी अरब, कतर और जॉर्डन के अलावा ब्रिटेन और फ्रांस जैसे कुछ नाटो सदस्य भी शामिल थे। 2011 की गर्मियों में इसी गठबन्धन ने अरब स्प्रिंग के नाम से एक बग़ावत का आग़ाज़ किया।

विभिन्‍न देशों से भाड़े पर लाए गए सैनिकों को तुर्की के शिविरों में पश्चिमी प्रशिक्षकों ने प्रशिक्षण दिया और उसके बाद इन्‍हें सीरिया में घुसा दिया गया। इनका मुख्‍य काम राष्ट्रपति असद का तख्‍तापलट कर के उसकी जगह पश्चिम की एक पिट्ठू सरकार बैठानी थी जो वाशिंगटन और तेल अवीव के दिशा-निर्देशों पर काम कर सके।

2014 की गर्मियों तक यह गठबंधन असद को सैन्‍य स्‍तर पर हराने के कगार पर पहुंच चुका था। असद के सैन्‍यबल को पश्चिमी आतंकियों ने घुटनों पर ला दिया था। उनमें अल कायदा और आइएसआइएस के लोग भी शामिल थे जिन्‍हें सउदी अरब और कतर भारी मात्रा में हथियार मुहैया करवा रहे थे।

सितम्बर में घटनाक्रम में नया मोड़ आया जब रूस ने सीरिया में (वैध तरीके से) राष्ट्रपति असद के आमन्त्रण पर प्रवेश किया। रूसी वायुसेना ने जल्द ही असद के खिलाफ जंग छेड़ने वाले आतंकियों और तुर्की के बीच मौजूद आपूर्ति श्रृंखला को अवरुद्ध कर डाला और कुछ ही महीनों में निर्णायक रूप से युद्ध की तस्वीर बदल दी।

दिसम्बर 2016 में अलेपो को आज़ाद करवा लिया गया। यह गठबंधन सेनाओं की हार का पहला संकेत था और 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद से वैश्विक भूराजनीति में एक नया प्रस्‍थान बिंदु था। अमेरिका की एकतरफ़ा कार्रवाई का अब अंत हो चुका था। पुतिन का आत्‍मविश्‍वास बढ़ा कि वे अमेरिका और उसके सहयोगियों को टक्‍कर दे सकते हैं।

इस समय तक हालांकि अमेरिका ने सीरिया में दूसरा ही खेल शुरू कर दिया था। उत्तरी और उत्तर-पूर्वी सीरिया में कुर्दों की रिहाइशों में में उसने अपना सैन्‍य ठिकाना बनाना और सैनिकों की तैनाती करना शुरू कर दिया था। इस जगह सीरिया के सबसे बड़े तेल और गैस के मैदान थे।

माना जाता है कि अमेरिका ने उन क्षेत्रों में फिलहाल आठ ठिकाने बनाए हुए हैं जहां करीब 2000 अनामंत्रित अमेरिकी सैनिकों का डेरा है। सीरिया में उनकी उपस्थिति अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से अवैध है।

पश्चिमी सीरिया के सभी प्रमुख शहरों में अब राष्ट्रपति असद की सरकार का नियन्त्रण है। भूमध्यसागर पर देश के समुद्र तट भी इसमें शामिल हैं। लेकिन पूरब में इफ़रात की पहाडि़यों के पार सीरिा के सबसे बड़े तेल और गैस के मैदानों पर अमेरिका और उसकी छद्म सेना कुर्दिश सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्स (एसडीएफ) का कब्‍ज़ा है।

पिछले साल के अन्त तक अमेरिका लगातार कहता रहा था कि सीरिया में उसकी (अवैध) उपस्थिति इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) को जड़ से उखाड़ने के लिए है, जिसने वहां 2014 में खलीफा की स्थापना की बात की थी जिसकी राजधानी को रक्‍का में होना था। अपने आधिकारिक वक्तव्य में अमेरिका ने घोषणा की कि जब तक वह आइएस को हरा नहीं देता, वह सीरिया में ही रहेगा।

इस बात को भी कई हफ्ते बीत चुके। सीरिया में आइएसआइएस निर्णायक रूप से सीरियाई, रूसी और ईरानी सेनाओं द्वारा परास्त हो चुका है। गठबन्धन का दावा है कि इस हार में एसडीएफ के साथ मिलकर उसकी भी कुछ भूमिका है। यह दावा आंशिक रूप से सच हो सकता है, लेकिन उनकी गतिविधियों की पूरी कहानी कहीं ज्‍यादा जटिल है।

आइएसआइएस तो जा चुका है, मगर अमेरिकी सैनिक और सैन्‍य ठिकाने सीरिया में अब भी बरकरार हैं। अमेरिकी अधिकारी कहते हैं कि उनकी सेना सीरिया में ”तब तक” रहेगी, जब तक देश में ”स्थिरता” नहीं आ जाती।

यही वह पृष्‍ठभूमि है जिसमें अमेरिकी सेना ने 7 फरवरी की रात असद सरकार के लड़ाकों पर पर हमला किया था, जिसमें 100 से ज्‍यादा सीरियाई सैनिक मारे गए थे। उधर गठबन्धन की तरफ केवल एक एसडीएफ का सैनिक घायल हुआ।

अमेरिकियों ने दावा किया कि उन्होंने ”आत्मरक्षा” में सीरिया पर हमला किया है और रूस को वे पहले ही इसकी ”चेतावनी” दे चुके थे। दरअसल, सीरिया के कुछ सैनिक अमेरिका समर्थित एसडीएफ के कब्‍ज़े से तेल और गैस के कुछ मैदान वापस लेने की कोशिश में थे।

अब कुल मिलाकर स्थिति कुछ यूं बनती है कि सीरिया सरकार की सैन्‍य टुकडि़यों ने अपने ही देश मे अपने ही देशवासियों (कुर्द) से तेल और गैस के मैदानों को अपने कब्‍ज़े में लेने की कोशिश की जबकि उनके ऊपर एक विदेशी सेना द्वारा हमला किया गया, जिसकी सीरिया में उपस्थिति अंतरराष्ट्रीय कानूनों के हिसाब से अवैध है। इसके परिणामस्वरूप 100 से ज्यादा सीरियाई मारे गए।

यही अमेरिका का नया खेल है, जिसके तहत वह सीरिया के तेल और गैस के मैदानों पर कब्‍ज़ा बनाए रखना चाहता है और इसके बदले में सीरिया की वैध सरकार को किसी भी तरह का राजस्व देने से भी इनकार करता है। वह सीरिया अपने ठिकानों की मदद से सीरिया की सेना, रूसियों और ईरानियों का उत्पीड़न कर रहा है। वह वहां तख्‍तापलट करना चाहता है और सीरिया के कुर्दों का भाड़े के सैनिकों के बतौर इस्‍तेमाल कर के असद सरकार को कमज़ोर करना चाहता है।

इस समूची योजना को सीआईए, पेंटागन, यहूदी लॉबी और हथियार निर्माताओं ने तैयार किया है। इन सभी के पास ऐसा करने के अपने-अपने कारण हैं। कुछ ऐसा धन के लिए कर रहे हैं, कुछ के लिए यह भू-राजनीति है, कोई  प्राकृतिक संसाधन पर कब्जा करने के लिए ऐसा कर रहा है तो कोई ओर क्षेत्र विस्‍तार की लालसा में ऐसा कर रहा है।

इन सभी तत्‍वों पर ट्रम्‍प का प्रभाव आंशिक है। अधिकतर का अपना खुद का एजेंडा है और अपने ही तरीकों से वे चीज़ों को चला रहे हैं।

जब तक रास्‍ता और मंजिल पता हो, तब तक तो आटोपायलट मोड ठीक है। सीरिया में हालांकि दोनों ही अस्‍पष्‍ट हैं। इसके अलावा दूसरे खिलाड़ी जैसे रूसी, ईरानी और हिज़्बुल्ला भी अमेरिकियों की जिंदगी दुश्‍वार करते रहेंगे। राष्ट्रपति असद ने भी कह दिया है कि उनका इरादा सीरिया की ज़मीन का एक-एक इंच वापस लेने का है।

सवाल यह उठता है कि सीआईए और पेंटागन अपने इस सीरियाई दुस्‍साहस की क्या क़ीमत अदा करने को तैयार है? सीरिया छोड़ने पर मजबूर होने से पहले आखिर वे अपने साथ कितनी लाशें ले जाना चाहते हैं?

सीरिया और उसके सहयोगियों को लाशें ढोकर कहीं नहीं ले जानी हैं। उनके साथ ऐसी कोई दिक्‍कत नहीं। उन्‍होंने अपने 100 सैनिक गंवाए हैं और उनके हौसले पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा है।


लेखक भूतपूर्व भारतीय राजदूत हैं जो अमेरिका, सीरिया, लीबिया और सउदी अरब सहित दुनिया भर में तैनात रह चुके हैं. यह लेख thecitizen.in से साभार प्रकाशित है. अनुवाद अमन कुमार का है. 

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