Saturday, June 12, 2021

 

 

 

मुल्क को आज फिर से ख़ुदाई खिदमतगार की ज़रूरत हैं…

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पठानो को सब एक सुर में कहते थे की यह लड़ाकू लोगों का झुँड है। यह लड़ते वक़्त इंसान और इंसानियत को भूल जाते हैं। पठानो में ताक़त ही दर्जे तय करती थी। बदला जितना खूँखार होगा उतना ही पठान की ताक़त के ढोल बजेंगे। तब किसने सोचा था कि कोई आएगा और इन्हें लड़ाई झगड़ों के रास्ते से इतर शांति और सेवा की पगडंडियों पर ले जाएगा।इनमे मुल्क़ और माटी की सौंधी खुशबू भर देगा।

यह काम किया खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान ने। हर क़बीले के पठानो को इकट्ठा करके शाँति, सदभावना और प्रेम के लिए संगठित करके ख़ुदाई खिदमतगार की नीव रखी। हर एक पर हाथ उठा लेने वाले पठान जब से ख़ुदाई खिदमतगार बने तब से उनका हर विरोध अहिँसा से होकर जाने लगा। अंग्रेज़ों की लाठियों से इनके सर से ख़ून की धार बह उठती फिर बीही खान बाबा के यह अनुशासित सिपाही गाँधी मार्ग से नही डिगते।

बादशाह एक लौते शख्स थे जिन्हें महात्मा गाँधी की ज़िन्दगी में ही दूसरा गाँधी कहा जाने लगा। सरहदी गाँधी के नाम से मशहूर बादशाह खान के बहुत से दिलचस्प किस्से हैं। एक बार जब वोह गाँधी जी के पास रुकने आए तो गाँधी जी फ़िक्र में थे की अपने इस पख़्तून पठान को खाने में गोश्त कैसे दें जबकि आश्रम में मांसाहार वर्जित था। फिर भी गाँधी जी खुद खान साहब के लिए गोश्त पकाने को तैयार हो गए तब बादशाह खान बोल उठे की वाह बापू एक पठान के लिए आप आश्रम का नियम तोड़ सकते हैं तो एक पठान क्या एक वक़्त अपना खाना नही छोड़ सकता।

20 जनवरी उन्ही बादशाह खान की पुण्यतिथि है। गाँधी जी अपने इस पठान साथी के लिए खुद वज़्ज़ू का पानी रखते, जानमाज़ बिछाते तो यह अफगानी पठान भी गाँधी की प्रार्थना सभा में सबसे ऊँची आवाज़ में भजन पढ़ता। क्या लोग थे। जो प्रेम, समर्पण और त्याग से देश की नीव रख रहे थे। इन्हें खोजकर पढ़ने और अपनाने का समय है।

हफ़ीज़ क़िदवई

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