कई दिनों से साहिबाबाद रेप केस को फॉलो कर रहा था. 10 साल की बच्ची को उसके एक 17 साल के पड़ोसी द्वारा फुसला के ले जाने और फिर एक दिन के लिए मदरसे में रखे जाने के बीच रेप का आरोप लगा जो मेडिकल जाँच में पुष्ट हो गया. लड़का गिरफ़्तार हो गया है. मामला मौलवी को लेकर लटका हुआ है. एक तरह की ताक़तें इसमें मौलवी की गिरफ़्तारी की मांग कर रही हैं.

बच्ची ने अपने बयान में स्पष्ट कहा है कि लड़का उसे मदरसे में ले गया और मौलवी के जाने के बाद उसे दूसरी मंज़िल पर ले गया. उसने मौलवी पर बलात्कार का कोई आरोप नहीं लगाया है, न किसी गैंग रेप का. इसी बिना पर पुलिस ने मौलवी को इस आरोप से बरी किया था लेकिन लोगों की मांग पर अब जाँच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई है. दुबारा मेडिकल जाँच की बात है और तफ़्तीश जारी है.

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पहली बात तो यह कि मौलवी हो या पादरी, रेप के लिए सज़ा मिलनी चाहिए और कड़ी से कड़ी मिलनी चाहिए. आजीवन क़ैद मुझे सबसे कड़ी सज़ा लगती है. दूसरी बात यह कि क्राइम ब्रांच की चार्जशीट आने से पहले निश्चित तौर पर कुछ कह पाना मुश्किल है. मुझे नहीं लगता कि हफ्ते-पंद्रह दिन में रिपोर्ट नहीं आ जाएगी.

तीसरी और ज़रूरी बात. मौलवी या मदरसे के समर्थन में कोई राजनैतिक दल नहीं आया है. कहीं झंडे आन्दोलन नहीं आरोपियों को बचाने के लिए और बच्ची जीवित है ज़ुल्म का क़िस्सा सुनाने के लिए तो कठुआ से इसकी तुलना एकदम जायज़ नहीं.

चौथी और भयानक बात यह कि इसे धार्मिक मसला बनाने पर आतुर लोगों ने लड़की का नाम और पहचान जाहिर कर दी है. सोचिये कितना अमानवीय और ग़ैर क़ानूनी है यह जबकि बच्ची जीवित है और उसे अपना जीवन जीना है. धर्म के खेल में उसका कितना नुक्सान कर रहे हैं उसके नाम से जस्टिस की कैम्पेन चलाने वाले.

दरअसल आपको न बच्ची की चिंता है न न्याय की. आपको मंदिर से मदरसे, पुजारी से मौलवी का स्कोर सेटल करना है बस. सच तो यह है कि हिन्दू की बच्ची हो या मुसलमान की अगर उसके साथ यह सुलूक होता है तो ज़िम्मेदार यह समाज है और सरकार. आप और हम. उसे धर्मों में बांटने की जगह हर निर्भया को सुरक्षा और न्याय का अधिकार मिल पाया तभी यह देश इस शर्मिंदगी से बाहर निकलेगा.

अशोक कुमार पांडे की कलम से…

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