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लखनऊ से कई नौजवान की लाठी से घायल अपने साथियों की तस्वीरें भेज रहे हैं। यह ख़बर कई जगह छपी है। किस रूप में छपी है यह तो लाठी खाने वाले नौजवान ही बता सकते हैं। लोकतंत्र में अपने प्रति और दूसरों के प्रति लापरवाह होने का यह सब नतीजा है। जो लोग पढ़ रहे हैं उनके भीतर लाठी खाने वालों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं होगी और जो लाठी खा रहे हैं उनके भीतर भी किसी दूसरे समूह के लाठी खाने पर सहानुभूति नहीं होगी। यह स्थिति नागरिकों को बेबस करती है। नागरिक खुद को भी बेबस करते हैं।

मामला 68,500 शिक्षक भर्ती का है जिसके लिए 9 जनबरी 2018 को शासनादेश आया कि परीक्षा पास करने के लिये सामान्य एवं पिछड़ा वर्ग के लिये 45 % एवं अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिये 40% ज़रूरी होंगे। 12 मार्च को परीक्षा होनी था मगर कोर्ट से स्टे हो गया। यूपी टेट में लगभग 5000 पास हुये अभ्यथियों को परीक्षा में शामिल करने के लिये परीक्षा की नयी तिथि 27 मई 2018 रखी। इसी बीच योगी जी ने 21 मई 2018 को शिक्षक भर्ती परीक्षा की पासिंग मार्क में संशोधन कर दिया और सामान्य जाति और पिछड़ा बर्ग के लिये 33 % और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिये 30 % अंको को निर्धारित कर दिया गया।27 मई को परीक्षा सम्पन्न हो गयी और परीक्षा की उत्तर माला भी अा गयी ।

दिवाकर सिंह ने मान्यनीय इरशाद अली जी की लखनऊ खंडपीठ में 21 मई के संशोधित शासनादेश 30%/33% को कोर्ट में चैलेंज कर दिया और दिवाकर सिंह को 30%/33% पर कोर्ट द्वारा स्टे लगा दी गयी। सरकार से तीन सप्ताह के भीतर उसका पक्ष माँगा गया लेकिन सरकार ने परिणाम घोषित कर दिए। परिणाम घोषित हुए पहले आदेश के हिसाब से जब कटऑफ़ चालीस फ़ीसदी से अधिक था। इसमें कुल 41556 अभ्यर्थी पास हुये।

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वरिष्ठ पत्रकार, रवीश कुमार

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लखनऊ में जिन छात्रों पर लाठियाँ बरसीं हैं वे कट ऑफ़ को योगी सरकार के दूसरे आदेश के हिसाब से करने की माँग कर रहे हैं। यानी तीस प्रतिशत वाला कट ऑफ़। इनका कहना है कि 68,500 में से 27,000 पद ख़ाली हैं। अगर कट ऑफ़ नीचे होगा तो इन लोगों की नौकरी हो जाएगी। अगर इसके लिए दोबारा इम्तिहान होंगे तो उम्र सीमा पार हो जाएगी और इनका जीवन बर्बाद हो जाएगा। 12 नवंबर को 30/33 कट ऑफ़ वाले मामले की सुनवाई है और अगर सरकार इसके पक्ष में दलील दे तो इनका जीवन बच सकता है। नौकरी मिल सकती है। अगर 40/45 प्रतिशत कट ऑफ से मेधावी खोजने का ही तर्क है तो फिर कट ऑफ 80 फीसदी होना चाहिए था। 30 प्रतिशत और 45 प्रतिशत के कट ऑफ के अंतर पर कोई महान विद्वान नहीं मिल जाते हैं। इस पर बात हो सकती है कि भर्ती की यह प्रक्रिया सही है या नहीं। तो यह 30 प्रतिशत पर भी बेकार है और 40 प्रतिशत पर भी।

सभी राज्यों में नौकरियों को लेकर जानबूझकर कर प्रक्रियाएँ जटिल की जाती हैं ताकि कोर्ट में मामला चलता रहे। नौजवान भी अपने हिस्से का संघर्ष कर ही रहे हैं लेकिन इन भर्तियों की राजनीति को समझने के लिए अलग तरह की विद्वता चाहिए। अलग तरह की जानकारियाँ ताकि इन्हें समग्रता में देखा जा सके। फ़ौरी तौर पर इनकी राजनीति बताती है कि भारत के युवा राजनीतिक रूप से महत्वहीन हो चुके हैं। मैं प्राइम टाइम में नौकरी सीरीज़ के दौरान कहता था कि युवाओं की राजनीतिक समझ थर्ड क्लास है तभी नेता इन्हें नचा ले जाते हैं। तब लगता था कि मैं ज़्यादा तो नहीं कह रहा लेकिन मैं अपनी बात पर फ़िलहाल टिके रहना चाहूँगा। लखनऊ ने ही अलग अलग भर्तियों के कई प्रदर्शन देखे, लाठी चार्ज देखे, मगर खुद युवा इन्हें समग्र रूप में नहीं देख पाए। कोई रणनीतिक और राजनीतिक समझ नहीं बना पाए। लाखों छात्र परेशान हैं, मगर कभी एक साथ मिलकर एक न्यायपूर्ण परीक्षा प्रणाली के लिए संघर्ष नहीं करते हैं। सब अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। अपनी ताकत को छांट कर, बांट कर लड़ने वाले कभी कामयाब नहीं होते हैं।

मैं राजनीतिशास्त्री नहीं हूँ मगर फिर भी लग रहा है कि हम लोकतंत्र के ऐसे मोड़ पर आ गए हैं जहाँ लोक यानी जनता सिर्फ पीड़ित है। लाभार्थी नहीं है। जो अमीर हैं। उद्योगपति हैं वही लाभार्थी हैं। यह बदलाव सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल करने से नहीं आता बल्कि घंटों पढ़ने, संघर्ष करने और समझने से आता है। इसके लिए चंद लोग तो लगे रहते हैं, उनकी छोटी कामयाबी से रौशनी भी दिखती है मगर अंधेरे कमरे में मोमबत्ती जला देने से रौशनी तो आती है, अंधेरा दूर नहीं होता। उस रौशनी में कमरे में पड़ी हर चीज़ साफ़ साफ़ नहीं दिखती है।

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