पहले दो रोज़े:

पहले ही दिन ब्लड शुगर लेवल गिरता है यानी खून से चीनी के नुक़सानदेह असरात का दरजा कम हो जाता है- दिल की धड़कन सुस्त हो जाती है और खून का दबाव कम हो जाता है यानी B P गिर जाता है- आसाब (पुट्ठे) जमा शुदा ग्लाइकोजिन को आज़ाद कर देते हैं जिसकी वजह से जिस्मानी कमज़ोरी का एहसास उजागर हो जाता है- ज़हरीले माद्दों की सफाई के पहले मरहले में नतीजतन सर दर्द- चक्कर आना- मुंह का बदबूदार होना और ज़बान पर मवाद के जमा होना होता है-

तीसरे से सातवें रोज़े तक:

जिस्म की चर्बी टूट फूट का शिकार होती है और पहले मरहले में ग्लूकोज़ में तब्दील हो जाती है- बाज़ लोगों की जिल्द मुलायम और चिकनी हो जाती है- जिस्म भूख का आदी होना शुरू करता है और इस तरह साल भर मसरूफ रहने वाला निज़ामे हाज़मा रुख्सत मनाता है जिसकी उसे शदीद ज़रूरत थी- खून के सफेद बैक्टेरिया और क़ुव्वते मुदाफअत (Immunity) में इज़ाफा शुरू हो जाता है- हो सकता है रोज़ेदार के फेफड़ों में मामूली तकलीफ हो इसलिए कि ज़हरीले माद्दों की सफाई का अमल शुरू हो चुका है- अंतड़ियों और कोलोन की मरम्मत का काम शुरू हो जाता है-अंतड़ियों की दीवारों पर जमा मवाद ढीला होना शुरू हो जाता है

ramzan

आठवें से पंद्रहवे रोज़े तक:

आप पहले से तवाना महसूस करते हैं- दिमागी तौर पर चुस्त और हल्का महसूस करते हैं- हो सकता है पुरानी चोट और ज़ख्म महसूस होना शुरू हों- इसलिए कि अब आपका जिस्म अपने दिफा (बचाव) के लिए पहले से ज़्यादा फआल ( सरगर्म) और मज़बूत हो चुका है- जिस्म अपने मुर्दा या कैंसर शुदा सेल को खाना शुरू कर देता है जिसे आम हालात में कीमियोथैरेपी के साथ मारने की कोशिश की जाती है- इसी वजह से दबी हुई पुरानी तकालीफ और दर्द का एहसास निस्बतन बढ़ जाता है- आसाब (पुट्ठे) और टांगों में तनाव इस अमर का क़ुदरती नतीजा होता है- ये क़ुव्वते मुदाफअत (Immunity) के जारी अमल की निशानी है- रोज़ाना नमक के गरारे आसाबी अकड़ाओ का बेहतरीन इलाज है-

सोलहवे से तीसवे रोज़े तक

जिस्म पूरी तरह भूख और प्यास को बर्दाश्त का आदी हो चुका है- आप अपने आप को चुस्त- चाको चौबंद महसूस करते हैं- इन दिनों आपकी ज़बान बिल्कुल साफ और सुर्खी माइल हो जाती है- सांस में भी ताज़गी आ जाती है- जिस्म के सारे ज़हरीले माद्दों का खात्मा हो चुका है- निज़ामे हाज़मा की मरम्मत हो चुकी है- जिस्म से फालतू चर्बी और फासिद माद्दे बाहर हो चुके हैं- बदन अपनी पूरी ताक़त के साथ अपने फराइज़ अदा करना शुरू कर देता है- बीस रोज़ों के बाद दिमाग और याद्दाश्त तेज़ हो जाते हैं- तव्वजोह और सोच को मरकूज़ करने की सलाहियत बढ़ जाती है- बिला शुबह बदन और रूह तीसरे अशरे की बरकात को भरपूर अंदाज़ से अदा करने के क़ाबिल हो जाता है-

ये तो दुनिया का फायदा रहा जो बेशक हमारे खालिक़ ने हमारी ही भलाई के लिए हम पर फर्ज़ किया- मगर देखिए उसकी रहमत का अंदाज़े करीमाना कि उसके अहकाम मानने से दुनियां के साथ साथ हमारी आखिरत भी संवारने का बेहतरीन बंदोबस्त कर दिया..!!

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