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एक तरफ मरहूम सर सय्यद अहमद खान ने कहा था “हिंदुस्तान एक दुल्हन है और हिन्दू और मुसलमान उसकी दो आँखे है”.

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सर सय्यद ने भारत की सामाजिक संरचना के बनावट के अनुसार हिन्दू और मुसलमानों को एक दुल्हन की दो आँखों से मुख़ातिब किया है. जिसमें किसी भी व्यक्ति को कोई शक नहीं होना चाहिए और नहीं मुझे इसमें कोई शक है. दूसरी तरफ़ लोकल सेल्फ गवर्नमेंट बिल पर तक़रीर करते हुए सर सय्यद अहमद खान ने जॉन स्टुअर्ट मिल का हवाला देते हुए कहा “अगर लोकतंत्र में बहुसंख्यक की आमरियत क़ायम हो जाये तो वह लोकतंत्र नहीं होती है.”

आज भी जॉन स्टुअर्ट मिल की इस पोलिटिकल फिलोसोफी को सभी बड़े विश्वविधालय में पढ़ाया जाता है. आगे उसी अवसर पर सर सय्यद अहमद खान कहते है “बल्कि बहुसंख्यक की आमरियत को कम करने का कोई न कोई तरीक़ा होना चाहिए और जो अल्पसंख्यक और महरूम तबका है उनकी नुमाइंदगी का तरीका इख़्तियार करना चाहिए.”

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अब आप समझने की कोशिश कीजिये की एक ही व्यक्ति हिन्दू और मुस्लिम को दुल्हन की दो आँखों से मुख़ातिब कर रहे है जब्कि दूसरी जगह बहुसंख्यक की आमरियत को कम करने के लिए अल्पसंख्यक की नुमाइंदगी सुनिश्चित करने की बात कर रहे है.

सर सय्यद ने भारत की सामाजिक संरचना को आधार मानकर दुल्हन की दो आँख से मुखातिब किया जब्कि राजनीति पर बहुसंख्यकों के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए अल्पसंख्यकों की नुमाइंदगी सुनिश्चित करने की भी बात कही है.

आप कल्पना कीजिये यदि सर सय्यद जिन्दा होते और इसतरह से खुलकर अल्पसंख्यकों की नुमाइंदगी की बात करते तब आज का पढ़ा-लिखा शिक्षित वर्ग जो स्वयं को सेकुलरिज्म का सिपाही समझ बैठा है उनका सर सय्यद के प्रति कैसा व्यवहार होता?

मेरे अनुसार बीते हुए कल में जिस प्रकार सर सय्यद के विरुद्ध 68 फ़तवा निकला था उसी प्रकार वर्तमान में सर सय्यद को 68 बार संघी कहा जा चूका होता.

जनाब तारिक अनवर चम्पारणी की फेसबुक पोस्ट से

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