Tuesday, October 26, 2021

 

 

 

मालदा के बहाने तथाकथित नास्तिक और सो काल्ड सेक्यूलर तबके के मुँह पर तमाचा

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हैलो मिस्टर ब्राह्मणवादी सेक्यूलर एंड मिस सेक्यूलराइन,

हाऊ आर यू?

अरे सुनो, सुन लो भाई। मालदा पर आप दोनों ने लेख लिखा था। ख़ूब चर्चा में रहा। प्वाइंट टू प्वाइंट समझाया की मुसलमान क्यों पिछड़ें हैं। क्यों उनका जी घबराता है। क्यों वे बुर्क़े में क़ैद रहना चाहते हैं। क्यों वे चौदह सौ साल पुरानी किताब को अंतिम सच माने बैठे हैं। क्यों वे तीन तलाक़ और हवाला ओह सॉरी हलाला के साथ चुपके से चिपके हुए हैं। क्यों वे पंचर बनाते हैं। क्यों वे टट्टी साफ़ करते हैं। एक ज़रा सा मालदा क्या हुआ आपने तो पूरी जन्म कुंडली खंगाल डाली। इतना मोरली डिप्रेश कर दिया गया कि मुसलमान मुँह छुपाते फिरे।

आपने दो दर्जन गाड़ियों के फूंकने और एक थाना जला देने की कोशिश करने वाली मालदा की दस हज़ार की भीड़ से पूरे मुसलमानों और इस्लाम को तौल दिया। आप उस दिन कहाँ थे जब गुजरात में पटेल, पाँच हज़ार करोड़ की सरकारी और निजी संपत्ति को फूँक कर मीडिया विमर्शों में हीरो की तरह पेश किए जा रहे थे। कहाँ थे सोशल मीडिया के दिग्गज जब पूरे राजस्थान में रेल लाइन ठप करके बैठे जाट हज़ारों ट्रेन रोक करोड़ों का सरकारी नुक़सान कर देते हैं।

क्या पटेल और जाट के बहाने किसी ने हिंदू धर्म, गीता, रामायण, और वेदों को ज़िम्मेदार ठहराया?

क्या किसी ने लिखा की करोड़ों ठेले और खोमचे वाले हिंदुओं की हालात इसलिए ख़राब है क्योंकि जाट और पटेलों ने सरकारी जायदाद को नुक़सान पहुँचाया।

क्या किसी ने लिखा की भगवान राम और भगवान कृष्ण, माँ सरस्वती चाहती हैं कि हिंदुओं का यह समूह ऐसी हरकतें करे।

क्या किसी ने गुजरात और राजस्थान के विरोध प्रदर्शनों के बाद मीणाओं,जाटों,पटेलों के बहाने देश के नब्बे करोड़ हिंदुओं से हिसाब किताब माँगा ?

दाढ़ी टोपी वाली तस्वीर शेयर कर दी तो क्या जाटों, मीणाओं और पटेलों के हिंसक प्रदर्शनों के बाद किसी तिलक धारी की तस्वीर क्यों नहीं वायरल की गई।

अपराध बोध नहीं होना चाहिए। भक्तों के चैनलों ने माहौल बनाया और वही हुआ जो मैं हमेशा लिखता हूँ। वे तथाकथित सेक्यूलर जो बाप का पिंडदान करने के बाद भी नास्तिक बने रहते हैं। वे तथाकथित सेक्यूलर जो गंगा किनारे मुंडन के बाद भी नास्तिक बने रहते हैं। वे तथाकथित सेक्यूलर जो अग्नि के फेरे ले कर भी ब्रह्मा विष्णु और महेश को गरिया देते हैं ताकि दोनों तरफ़ का बैलेंस बराबर रहे। इन बैलेंसवादी तथाकथित सेक्यूलराइन और सेक्यूलरों से बचिए। छद्म नास्तिकों से तो बिल्कुल भी दूर रहिए। इन्हें समाज की नहीं, ख़ुद की फ़िक्र है। ऐसे लोगों को साथ लेकर संघर्ष नहीं होता, अकेले लड़नी पड़ती है लड़ाइयाँ।

मालदा में जलाई गईं गाड़ियों का डीएनए टेस्ट करके हिंदू पहचान निकाल लेने वाले भयंकर पत्रकार और सौ करोड़ की फिरौती माँगने वाले सुधीर चौधरी से लगायत उन तमाम चैनलों के मालिकान और चर्चा करवाने वाले एंकरों, मुसलमानों का विरोध प्रदर्शन यदि सांप्रदायिक और कट्टरपंथी होता है तो उससे भी ख़तरनाक तरीक़े से प्रदर्शन करने वाले दूसरे लोगों को हीरो क्यों बना दिया जाता है।

विरोध प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार है परन्तुं हिंसा नहीं। लेकिन हिंसा पश्चात उसका विश्लेषण जिस तरह से किया जाता है वह यह बताता है कि सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की पत्रकारिता हद दर्जे से भी ज़्यादा मुसलमानों से नफ़रत करती है। वे कथित सोशल मीडिया ट्रेंड सेटर्स पूर्वाग्रही हैं जो किसी एक घटना के बाद लगातार उत्पीड़न का शिकार बन रही क़ौम को नोचने लगती है और उनके बराबर खड़ी कर देती है जो उनसे सौ गुना ताक़तवर हैं। वे कथित बुद्धिजीवी ऐसे ही किसी मालदा के इंतज़ार में होते हैं ताकि नीचा और पीछा दिखाने का मौक़ा मिल सके।

और मैं ऐसा होने नहीं दूँगा। मुसलमान भी बिल्कुल उसी सामाजिक संरचना में रचे बसे हैं जिनमें जाट,मीणा,पटेल। मुसलमान भी अपने मुद्दों पर मुखर होते हैं जैसे की कोई दूसरा। हाँ, जो लोग कहते फिर रहे हैं कि जेल में बंद बेक़सूर नौजवानों के लिए मुसलमान क्यों नहीं सड़क पर उतरते तो वे ज़रा गूगल कर लें क्योंकि मीडिया कभी नहीं दिखाएगी कि आज़मगढ़ से पूरी पूरी ट्रेन भर कर जंतर मंतर मुसलमान जाता है। बेक़सूर नौजवानों के लिए जिस रोज़ मुसलमान किसी मालदा जैसी हरकत कर देगा उस दिन आप लोग ही उन बेकसूरों को सबसे पहले गरियाएंगे।

बुरा लगा हो तो लगता रहे। हमको रत्ती भर भी फ़र्क़ नहीं पड़ता। हम पॉलिटिक्स नहीं करने देंगे आपको वो भी ऐसे मसले पर जहाँ हमारी जान अटकी हो। आपका क्या है। सेमिनार में याद करके दो बूँद आँसू टपका देंगे। साला, झेलना तो हमें पड़ता है। हर मिलने जुलने वाला जब मालदा जैसी किसी घटना पर आपसे पूछ ले कि इस्लाम यही है तो बहुत कुछ राउंड हो जाता है। और मुझे पता है उसका यह सवाल आप जैसे बैलेंसवादी कथित सेक्यूलरों की वजह से बना ह। अगर पहले दिन से ही चढ़ जाते भक्तों पर तो मज़ाल है कोई चैनल चलाता या फिर किसी बेहूदा की हिम्मत होती मालदा के बहाने मुसलमानों को गरियाने की। उन्हें यह महसूस करवाने कि की सब कुछ इस्लाम की वजह से हो रहा है। निकल आओ इस्लाम से बाहर। आओ हुज़ूर आपको, सितारों में ले चलूँ।

मैं नहीं छोड़ूँगा। आप लिखिए फिर मैं आपके लिखे पर टिप्पणी करूँगा। फिर जनता तय करेगी।
-धन्यवाद।

मोहम्मद अनस – लेखक जाने माने पत्रकार तथा समाजसेवी है

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