हम 21वीं सदी में ज़िंदगी का सफ़र कर रहे हैं. पीढ़ियां गुज़र चुकी हैं. सभ्यताओं की कहानी इतिहास बनकर हमारे आंखों के सामने है. यादों के झरोखे में राजाओं का दौर. शहंशाहों का ज़माना. ब्रिटिश हुक़ूमत और आज़ादी की जंग का ज़माना है. 1947 से 2017 तक के सफ़र में ये बात निकलकर आयी. कि बाक़ी दुनिया के मुक़ाबले हमारी रफ्तार कम होती जा रही है. हमें अपनी तरक्की की रफ़्तार तेज़ करने के लिए. समाज को नई दिशा देने के लिए. दुनिया का अगुआ बनने के लिए एक अदद आदर्श नेता की ज़रूरत है. फिर सवाल ये आता है. कि आख़िर हमारा नेता कैसा हो.

हमारा नेता कैसा हो. इसे सियासी नारा समझने की भूल मत करिये. ये एक सवाल है हिन्दुस्तान की सवा अरब की आबादी से. पीढ़ियों की खोई विरासत है. सोने के चिड़िया के आज का लुटा-पिटा भारत बनने तक की कहानी है. सतीत्व और पतिव्रता की गरिमा से लेकर औरत के मान-सम्मान का अर्द्धनग्न सांस्कृतिक सत्य है. जो सदियों बाद आज भी चुभता है. कचोटता है. आदर्शवाद का दर्शन संजोए बुद्धिजीवियों को परेशान करता है. सत्ता परिवर्तन की उस रिपाटी से सवाल है. जो कभी ब्रिटिश हुक्मरानों के हाथ से निकलकर नेहरू-इंदिरा की पीढ़ी से होते हुए आज के मोदी दौर में आ चुका है. जो देश के तमाम सूबों में यहां-वहां पैवस्त वंशवाद की बेलों में उलझी हुई कुछ खानदानों की ग़ुलाम बनकर रह गई है. और इन सियासी खानदानों के सिवाय पूरा हिन्दुस्तान. दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी इनका मुंह ताकने को मजबूर है. टकटकी लगाना इस आबादी का भाग्य. नियति और विडंबना बन गई है. क्योंकि भारतभूमि की सारी संपदाओं पर अधिकार की पूरी ताक़त परंपरावादी हो चली सियासत ने इन कुछ परिवारों के हवाले कर दिया है. सत्ता सिंहासनों के लिए साल दर साल हुए लोकतंत्र के महापर्व में राजनीति के महामंच से जिस तरह की अदाकारी जनता जनार्दन ने देखी है. वो सियासी नेताओं के क़िरदार समाज के चरित्र और लोकमन को छलने और चुभने लगा है. आम जन बार बार ठगे जाने के एहसास से व्यथित हो गया है. ऐसे में अब ये जनता बार बार सोचने को मजबूर हुई है. कि आख़िर हमारा नेता कैसा हो. किसे बनाएं अपना रहनुमा. किसे दें देश की बाग़डोर. क्या उसे जो नैतिकता के आडंबर तो फैलाता है. नैतिकता और आदर्शवाद के जुमले परोसता है. लेकिन दिल-दिमाग़ और चरित्र से उतना ही कुटिल और छलिया है. क्या उसे देश का नेता मान ले देश की ये युवा पीढ़ी. जो देश की भावनाओं का दोहन अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए करता रहा हो. अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति और अपने मन की बात को मनवाने के लिए नीति और नैतिकता के हर सिद्धांत को बदल डालने पर अड़ा हो. जो सीमाओं पर सनसनी सिर्फ़ इसलिए फ़ैलाता रहा हो. कि उसके ज़रिये से थोड़ा सा ही सही. अपनी राजनीति का हित किया जा सके. क्या देश को आज भी गांधी के आदर्शों और सुभाष की योजनाओं की दरकार नहीं है. ये देश अब सोचने को मजबूर हो गया है. कि अगर देश की कमान नेताजी सुभाष जैसे योग्य नेताओं के हाथ में होता. तो भारत तरक्की की किस बुलंदी पर होता. देश मोहनदास करमचंद गांधी, सुभाष मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल और सर सैय्यद के बताए रास्ते पर चला होता. तो फिज़ाओं में इतनी ज़हर न घुल पाती. दुनिया की महाशक्तियों के आगे बार बार देश को गुटने न टेकने पड़ते. चीन-अमेरिका के कुटिल चाल इसके क़दम कभी न रोक पाते. देश के नैतिक मूल्यों का इतना पतन शायद कभी न होता. और हमारी सभ्यता कुछ ही दशकों में इतनी खोखली न हो जाती. राम-रहीम की विरासत कुटिल नेताओं के मिटाए न मिट जाती. गंगा-जमुनी तहज़ीब को लाख चाहकर भी ये मिटा न पाते.

अब जो वक्त आ गया है. सोच और सियासत की जो रफ्तार देखी जा रही है. उसमें मौजूदा नेताओं की जमात को न सिरे से ख़ारिज किया जा सकता है. और न ही आदर्शवादी नेताओं की नई जमात हर दल हर ख़ेमे में खड़ी की जा सकती है. क्यों कि जिस सोच औऱ जिन संविधानों पर आज की राजनीति टिकी हुई है. उनकी हर लाइनों में लोभ. सत्ता की हवस. सिर्फ़ सगे-संबंधियों के लिए अपनत्व का बोध. जात-पात. रंग-भाव. कुलीनता का बोध और सांप्रदायिकता की सोच झलकती है. जबकि सच तो ये है. कि देश का हर नागरिक एक सेल की तरह अपनी श्रम और सोच शक्ति के ज़रिये देश को ताक़त देते रहे हैं. और आज भी दे रहे हैं. ऐसे ज़रूरत इस बात की है. कि देश का हर नागरिक आत्म मंथन करे. देश हित को मन के मरकज में रखे. अपने अंदर की ख़ामियों को खोजना शुरू करे. ऐसी प्रैक्टिस जिस दिन परिपाटी बनेगी. उसी दिन देश में आदर्श नेताओं की जमात खड़ी होने लग जाएगी. और देश के दीमक अपने आप एक या दो सियासी सीज़न बीतते बीतते ख़त्म हो जाएंगे.

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शाहिद परवेज

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