अश्लीलता एक शब्द जो कथाकथित संस्कृति के ठेकेदारों को सालती है. अश्लीलता जो प्रबुद्ध समाज को चुभती है. अश्लीलता जो पढ़े-लिखे धड़े को अनपढ़ और गंवार धड़े में ज़्यादा नज़र आती है. अश्लीलता जो हिन्दुत्व के ठेकेदारों को प्रेमी जोड़ों के साथ रहने में नज़र आती है. अश्लीलता जो टेनिस कोर्ट से लेकर स्विमिंग सूट तक में नज़र आती है. लेकिन वही अश्लीलता संगम के घाटों से लेकर कोणार्क और खजुराहो में आस्था बन जाती है. अश्लीलता जो गुज़रती पीढ़ियों को नौजवान पीढ़ियों में तो नज़र आती है. लेकिन अपनी सोच का खोट नज़र नहीं आता. अश्लीलता जो बार बार चुभती है. हज़ार बार खलती है. जिसके नाम पर लाखों मुकदमे देशभर में दर्ज होते हैं. जिसकी धाराओं से क़ानून की किताबें अटी पड़ी है. उस अश्लीलता की परिभाषा क्या है ? और क्या होनी चाहिए इस अश्लीलता की परिभाषा ?  हमारे क़ानून में अश्लीलता की कोई परिभाषा तय नहीं है, जैसे ‘लाज’ या ‘इज़्ज़त’ या ‘सुशीलता’ की कोई क़ानूनी परिभाषा नही, किसी को मटकना अश्लील लगता है तो किसी को आखों का इशारा, किसी को वेस्ट और चेस्ट से तकलीफ़ है लेकिन इतना तो है कि इन सबके बीच हमारी युवा पीढ़ी में नैतिकता का पतन हुआ है. और इसी में संस्कृति और अश्लीलता की लाठी का सहारा लेकर न जाने कितनी बार औरतों पर हमला हुआ है. आख़िर कब रुकेगी ये अश्लीलता ?

वो सोच के सागर में डूबकर निकला जो मैं मन मेरा खाली पड़ा था औऱ खाली थी हथेलियां जो हासिलों का समंदर मैं खंगालने निकला था. वो निरर्थक और बेकार साबित हो रहा था. ज़िंदगी की झोली में हासिलों का एक भी मोती नहीं था. जो कुछ थे वो बस ठोकरों में मिले कुछ मरी सीपियां और कुछ मुर्दा शंख थे. फिर भी मैं हारा नहीं. मैंने चुनौती दोबारा ली. और मैं निकल पड़ा शब्दों के घने वन में. अश्लीलता का अर्थ खोजने. अश्लील की बयार से परिचित होने. संस्कृतियों की महक सूंघने और परंपराओं के सुंदर फूल तोड़ने, मैं चलता रहा, भटकता रहा, फिरता रहा घने जंगल में, मन में एक उधेड़-बुन लिये जो मस्तिष्क के चित्र पटल पर एक धुंधली सी तस्वीर खींच रहे थे इन शब्दों के जो बचपन से जवानी औऱ ज़िंदगी की आख़िरी दहलीज़ बुढ़ापे में अश्लीलता की एक चमकती दमकती, मदमाती, इठलाती स्वच्छंद मुस्कुराती, ठुमके लगाती, कमर उचकाती, केश उड़ाती, बदन लहराती, चिकोटियां काटती इशारे करती, कनखियां ताकती जिंदगी के कई रूप दिखा रही थी.

अश्लीलता की खोज के सफ़र में इन्हीं अदाओं को अश्लीलता समझने लगा था. फिर एक कांटा चुभा. क़दम मेरे थम से गए. मैं झुका क़दमों में मेरे एक सुन्दर सुनहरा फूल था. कांटों में घिरा मुझको ये क़ुदरत का अनमोल शाहकार लगा. कांटे की चुभन के साथ ही इस नन्हें फूल की सुन्दरता एहसास बनकर मन में बस गई. मैं फिर उठा अश्लीलता के अर्थ की तलाश में आगे बढ़ता गया. संस्कृति पट्टी को देखा. धर्म और संप्रदायों का इतिहास खंगाला. हिन्दी की वन लताओं को निचोड़ा. देशवाद के ओले पिघला डाले लेकिन इस शब्द मतलब कहीं ओछा मिला. तो कहीं गंदा. कहीं भोंड़ा. तो कहीं ग्राम्य तो कहीं फूहड़. इन अर्थों के बाद हिन्दी का शब्द सागर सूखने लगा. लिहाज़ा मैंने रुख अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत की चुनौती ली. हाईनेक बेल्ट में तलाश करते हुए मैंने DIRTY BAWDINESS VULGAR INDESCENT PORN NAUGHT और CRUDE जैसे दर्जनों शब्द पाए. इन सब्दों का अपनी संस्कृति में अपने शब्दों से मेल किया तो कहीं लैंगिकता, भोग, संभोग जैसे शब्दों से कुछ कुछ मेल ज़रूर हुआ लेकिन सटीक मतलब कहीं नहीं मिला. फिर मैंने परिभाषा खोजने की चुनौती ली. लेकिन यहां मैं पूरी तरह असफल रहा. अश्लीलता की परिभाषा कहीं नहीं मिली. हैरानी की बात है कि दुनिया का सबसे विस्तृत लिखित संविधान जो दंड के विविध-विधानों से अटा पड़ा है. इसमें भी इस शब्द की न सटीक परिभाषा है. न ही मतलब. इसका अर्थ ये हुआ. कि विधि-विधानों का कोर कुछ खोखला ज़रूर है. तो फिर अश्लीलता को लेकर अदालतों से लेकर समाज के ठेकेदार, राजनेता और धर्माधिकारी सब के सब क्यों इतना हल्ला मचाते हैं.

मुस्लिम परिवार में शादीे करने के इच्छुक है तो अभी फोटो देखकर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें 

कभी अश्लीलता के नाम पर बिना जांच पड़ताल के बेक़सूरों को जेलों में ठूंस दिया जाता है. तो कभी बार में डांस पर बंदिश लगा दी जाती है. एख ठुमके पर घायल न्यूज़ चैनल गला फाड़ चिल्लाते हैं. तो उसी रंगीली बाई की छरहरी काया वाली तस्वीरें छापकर अख़बार और मैगज़ीन बिक्री का कीर्तिमान स्थापित करने की कुचेष्टा करते हैं. इसी अश्लीलता की दुहाई देकर स्वयं सेवी संगठनों के साथ सियासी दलों के उद्दंड कार्यकर्ता सड़कों पर तांडव करते हैं. तो इसी की ओट लेकर फ़िल्मों और फिल्मकारों की सियासत में मंझा सेंसर बोर्ड अपने अधिकारों की कैंची चलाता है. लेकिन इसे ख़ूबसूरती समझने वाले फ़िल्मकार जनता की प्यासी आखों के सामने परोसने के हज़ार बहाने खोज ही लेते हैं. राजकपूर की श्री 420 हो या. किसी और फिल्मकार की फ़िल्में. सब में सुन्दरता के नाम पर अंगप्रदर्शन परोसा ही गया है. और अब की फ़िल्मों में यथार्थवाद औऱ फिल्म की मांग के नाम पर सेंसर की कैंची को कुंद कर दिया जाता है. जबकि फ़िल्म खलनायक में एक गाने पर सेंसर बोर्ड अड़ गया था. अब बॉलीवुड के बिकनी वर्ल्ड में इस नहीं चलती. वही सेंसर बोर्ड जो ममता कुलकर्णी की कमर और ऊपर तक पांव देखकर आग बबूला हो गया था. आज इन दलीलों पर खामोश है. अब ज़िगर में आग भी है. मुन्नी बदनाम भी हुई है. लेकिन सेंसर ख़ामोश है. दरअसल वो हैरान है उस क़ानून को लेकर जिसमें दंड की तमाम दाराएं तो हैं. लेकिन ऐसे जुर्म को साबित करने के लिए अश्लीलता की एक अदद परिभाषा नहीं गढ़ी जा सकी है. हां ये ज़रूर हुआ है. कि इस शब्द से मुंह चुराते समाज की किसी न किसी पीढ़ी में चोरी छुपे इसे निहारने की लत साथ साथ चली है. जो शायद आज कोणार्क खजुराओ की मदमस्त फ़िज़ाओं में सेक्स और संतृप्ति पर बातें करना संस्कृति की शान के ख़िलाफ़ समझता है. जबकि उसी कामुकता को अदालतें दूसरी जगह गुनाह मानती हैं. वही संस्कृति जिसमें सौन्दर्य का पर्याय कहीं न कहीं अंदरूनेपन को भी समझा जाता है. फ़िल्म और विज्ञापनों में खुलेआम परोसी जा रही कामुकता को ये क़ानून क्यों नहीं रोक पा रहा है. ये बड़े हारत की बात है. जबकि अदालतों में साल दर साल कनखियां देखने. इशारे और गोरी के ठुमकों को गुनाह की दहलीज़ पर दर्ज किया गया है. तो क्या अब ये मान लेना चाहिए. कि अश्लीलता कुछ नहीं बस मन का ग़ुबार है. जो अलग अलग लोगों के लिए अलग तरह से गढ़ी गई है. अश्लीलता पोंगापंथी संस्कृति में जीने मरने की ज़िद में जन्मी एक सोच है. जो पीढ़ियों और सदिय़ों के सफ़र में मन मस्तिष्क के साथ ही चरित्र में बस गई है. क्या इस शब्द के सही मतलब को जानना ज़रूरी नहीं. क्या नैतिकता के सूखेपन में आयी इस बाढ़ को रोके बिना समाज खुद बचा रह पाएगा. क्या समाज को खुद आगे आकर कड़े क़ानून की पहल नहीं करनी चाहिए. क्यों कि नेताओं की जमात तो सदन में भी नंगी फ़िल्में देखने के मौक़े तलाशती पकड़ी गई है.

पांव में पायल हाथ में कंगन और माथे की बिंदिया सुन्दरता का पर्याय जिस देश में मानी जाती है. जहां समर्पण प्रेम का प्रतीक है. और छुपाना कपट और चोरी माना जाता है. नवदंपति या प्रेमी जोड़ों को कई बार अश्लील बता दिया जाता है. ये बताता है. कि संस्कृति और मानसिकता दोनों का अश्लील होने या न होने की धारणा से गहरा नाता है. रीति-रिवाज़ों और परंपराओं की अनदेखी करना भी न तो संभव है.  न ही जायज़ है. अश्लीलता के बहुत से पहलू हैं. और उन्हें जाने बिना यह फ़ैसला नहीं किया जा सकता. कि कौन सी चीज़ अश्लील है. और कौन सी नहीं है. जबकि सबसे बड़ा पहलू तो ये है. कि इन सबके बीच शोषण का एक बड़ा भय पनप कर विकराल जंगल बन चुका है. जिसमें नुकसान महिलाओं का होता रहा है. और दूसरा ये कि इसी अश्लीलता के ज़रिये से नौजवान पीढ़ियां बर्बाद हुई हैं. इसलिए अब ज़रूरी हो गया है. कि अश्लीलता क्या है. इसकी परिभाषा सटीक तौर पर गढ़ी जाए. और इस शब्द की आड़ में देश की जनता पर हमला करने वालों को कड़ी सज़ा दी जाए. साथ ही क़ानून के बारीक़ सुराख़ से बचकर पीढ़ियों को बर्बाद कर रही मीडिया पर नकेल कसी जा सके.

शाहिद परवेज
Loading...