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रमजान का आगाज होते ही सहरी के वक्त गाँव गाँव व मुहल्लों में पुराने दौर मे नक्कारों ढोल और नात की सदायें गूंजती थी। घर-घर जाकर लोगों को सहरी में जगाना किसी वक्त आम बात थी। एक आवाज की गूंज से मुहल्ले के रोजेदार सहरी के लिए जाग जाते और एक दूसरे से मिलकर सहरी करते। देखते ही देखते मुहल्ले का माहौल खुशनुमा हो जाता। आधुनिकता के युग में वो माहौल पीछे छूट गया। वक्त बदला और बदल गए सहरी में जगाने के अंदाज। अब मुहल्लों में नक्कारों नात व नहीं सुनाई देतीं।

सहरी के लिये जगाने वालो की सामाजिक पहचान हुआ करती थी. पुरानी तहजीब के रहनुमा माने जाने वाले ये यह रमजान में देहातों और शहरों में रात को लोगों को सहरी की खातिर जगाने के लिये शेरो शायरी करते हुए निकलते थे। ज्यादातर सहरी मे जगाने वाले फकीर बिरादरी के होते थे

सहरी के लिये जगाने के बदले लोग ईद में उन्हें बख्शीश देते थे लेकिन अब लोगों के दिल और हाथ तंग पड़ गए हैं यही वजह है कि सहरी के लिये जगाने की परम्परा अब दम तोड़ चुकी है अब ढोल नगाडो की जगह लाउडस्पीकर और अलार्म ने ले ली है पुराने जमाने में संपन्न लोग कमजोर तबके के लोगों की अच्छे अंदाज से खिदमत करते थे और सहरी मे जगाने के बदले बख्शीश भी इसी का हिस्सा हुआ करती थी अमीर लोग इन फेरी वालों के त्यौहार की जरूरतें पूरी कर देते थे, मगर अब वह फिक्र अपना नूर खो चुकी है ढोल नगाडे बजा कर जगाने वाले लोग मजहबी लिहाज से खुशी और सवाब के लिये भी यह काम करते थे.

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सहरी मे जागने के लिये अब तो मोबाइल फोन के रूप में अलार्म हर खास-ओ-आम के हाथ में पहुंच चुका है.उस बक्त के जगाने वालो की रवायती हरी लचकदार सदरी और पगड़ी पहन कर रात करीब डेढ़ बजे टोलियों में बंटकर शहर के अलग-अलग मुहल्लों में जाकर लोगों को सहरी के लिये जगाते थे.

अब सहरी में नक्कारों ढोल की सदायें नहीं गूंजती। सहरी के लिए कोई दरवाजे की कुंडी नहीं खटखटाता।बिजनौर जामा मस्जिद से नक्कारों की आवाजें गूंजने लगती थी। वो सदायें बहुत दूर तक लोगों को सहरी का वक्त बता देती थीं। साथ ही सहरी व इफ्तार के वक्त मस्जिदों व मुहल्लों चौराहों से गोले छोड़े जाते थे। वक्त के साथ साथ आज सबकुछ बदल गया। आज न तो मुहल्ले में ढोल नगाड़ों की आवाजें आती हैं और न ही पहले जैसा माहौल दिखाई देता है। अब तो बच्चे मोबाइल पर अलार्म लगाकर सहरी के वक्त पर जागते हैं। मेरे नाना भी मुहल्ले में आवाज लगाते थे कि उठो रोजा रखने वालों सहरी का वक्त हो गया। वह माहौल अपनापन दे जाता था। हालांकि कुछ मुहल्लों में आज यह केवल दस्तूर के नाम पर जिंदा है।
प्रस्तुति – तैय्यब अली

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