मोहम्मद शाहिद अली मिस्बाही

इलेक्शन में किसी पार्टी को सपोर्ट करने या उसमें शामिल होने का इरादा रखते हों तो हज़रत अल्लामा शाहिद रज़ा साहब मस्कत उमान की ये तजरबात और हकाइक पर मबनी तहरीर ज़रूर पढ़ें फिर अकेले बैठ खूब गौर करें तब फ़ैसला करें कि हमें सियासी मैदान में क्या करना है। किस के साथ जाना है किस के साथ नहीं, कौन वफादार है और कौन धोखेबाज, किस ने हमें इस्तेमाल किया, किसने हमें नुकसान पहुंचाया और किसने मतलब निकल जाने के बाद हमें दूध की मक्खी की तरह पार्टी से निकाल कर जेल की काल कोठरी में फेंक दिया।  कौन लोग हैं? जो हमारे लोगों की सियासी ताकत बढ़ती है तो उन्हें रास्ता से हमेशा के लिए हटा देते हैं। कौन हैं ? जो चाहते हैं कि मुस्लिम क़यादत (नेतृत्व) खड़ी ना हो सके या कौन हैं वोह जिन का मुस्लिम कयादत खड़ी होने से नुकसान है ???

आप की नज़रों के सामने आज़म ख़ान,मुख्तार अंसारी, शाहबुद्दीन, अतीक अहमद, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, ताहिर हुसैन से लेकर अमानतुल्लह खान तक की दयनीय हालत है। अब आप खुद समझ सकते हैं कि हमें कब तक इस्तेमाल किया जाता है और कब निकाल फेंका जाता है ? तो औरों की बड़ी और मूनक्कश दरी चादर उठाने के बजाए अपना बोसीदह और छोटा फर्श बिछाएं और उसी पर आराम से बैठें।

हुज़ूर हाफ़िज़ मिल्लत फरमाते हैं: “अकलमंद वोह है हो दूसरों के तजरबा से फायदा उठाए, खुद तजरबा करके उम्र बर्बाद ना करे।” तो हमें हमारे मज़कूरा (ऊपर लिखे गए) सियासी महारथियों के तजरबात से सबक हासिल करने की जरूरत है इसी गलती को बार बार दोहराने की जरूरत नहीं, अगर हम फिर भी ऐसा करते हैं तो बकौल हुज़ूर हाफ़िज़ मिल्लत अलैहिर रहमा हम ना सिर्फ उम्र के वोह कीमती लम्हात बर्बाद कर रहे हैं बल्कि फिरासत मोमिनाना के भी खिलाफ काम कर रहे हैं। हुज़ूर अल्लामा शाहिद रज़ा मस्कत ओमान का एक कॉमेंट में यहां से आप के सामने पेश कर रहा हूं तवज्जुह से पढ़ें और बार बार नहीं हजार बार गौर करें फिर अपना सियासी फ़ैसला करें।

आप अहबाब इस पर तबसरह फरमाएं, जरह करें , अंदर तक झांक कर दूर अंदेशी का मुज़ाहरा करें, सिर्फ आमन्ना सद्दकना कह देने से अब काम शायद नहीं चलने वाला है।  1995 या 96 में मायावती ने काशी राम के साथ आजमगढ़ में रैली की थी उसी रात खैराबाद मदरसा का सालाना जलसा था हम लोगों ने अपनी आंखों से मुख्तार अंसारी का काफिला देखा था जोकि 47 कारों और जीप पर मुश्तमिल था जबकि मायावती 22 गाड़ियों में आयी थी। बचपना था सोच ही कुछ ऐसी थी कि किसके काफिले में कितनी गाडियां हैं तो हम लोगों ने गिनती की थी।

अब मौजू पर आ जाएं मुख्तार अंसारी के आते ही पार्टी में मुसलमानाने उत्तर प्रदेश टूट पड़े और पार्टी कहां से कहां तक पहुंच गई लेकिन लेकिन अंजाम किया हुआ? मुख्तार पर केस, कई केस पहले भी थे लेकिन जब तक मायावती को मुख्तार की जरूरत रही मुख्तार के लिए ढाल बनी रही। मुख्तार का कद जब ऊंचा होने लगा तो ठिकाने लगा दिया।  शहाबुद्दीन सीवान एक नंबर का गुंडा क्रिमनल कई केस पहले से दर्ज थे जेल से बतौर आज़ाद उम्मीदवार इलेक्शन फाइट किया (हम लोग इस वक्त सीवान के बंसार मदरसा में थे जो उसका छत्तर था जीत गया) बाद में लालू की R.J.D. में आया जब तक उसकी ज़रूरत रही लालू ने इस्तेमाल किया।

लेकिन शहाबुदीन का कद बुलंद हुआ भागलपुर सहरसा मुंगेर में उसकी पकड़ मजबूत हुई, इधर दरभंगा सीतामढ़ी और सीवान छपरा गोपाल गंज तो पहले ही से उसके असर रसूख में थे उसे लालू प्रशाद ने है पहले पहल जेल की हवा खिलवाई। बाद में बीजेपी और नीतीश ने उसपर मुहर लगा दी सजा काट रहा है सब पर गौर करें।”

हज़रत की इस तहरीर को पढ़ने के बाद जो लोग अभी भी दूसरों का दामन थाम कर चलने में आफियत महसूस कर रहे हैं वोह बखूबी समझ जाएंगे कि अब करना क्या है और कौन सा रास्ता दुरुस्त है। अगर हमारा काबतुल्लह जाने का इरादा है और वह रास्ता दुशवार है तो हम इजरायल की तरफ जाने वाले आसान रास्ते को नहीं अपना सकते। और अगर ऐसा किया तो अंजाम मुद्दते सफर गुजरने के बाद आपके सामने होगा जहां से वापसी मुहाल होगी। और मोमिन की शान यही है कि वोह ऐक ही जगह से दोबारा नहीं डसा जा सकता मगर आप बार बार उस ज़हरीले आस्तीन के सांप को अपना हाथ थमा रहे हैं कि ले तू अपना पेट भर ले हम मुसीबत बर्दाश्त कर लेंगे। जब मुसीबत बर्दाश्त करने का इतना ही शौक है तो अपने लिए या अपने भाई के लिए बर्दाश्त करें दुश्मन के लिए नहीं

शायद कि तेरे दिल में उतर जाए मेरी बात गौर करने की बात ये भी है कि इतने बड़े बड़े मुस्लिम सियासी लीडर किस अंजाम को पहुंचे और ओवैसी ब्रादरान क्यों आज कामयाब हैं और न सिर्फ जेल से बचे हुए हैं बल्कि हुकूमत में हिस्सेदार भी हैं। सिर्फ इसलिए कि उन्होंने दूसरों की दरी चादर नहीं उठाई अपना छोटा सा फर्श बिछाया है। और कामयाब हैं अब फ़ैसला आप के हाथ आप ओवैसी जैसे खुद मुख्तार और ताकतवर नेता पैदा करना चाहते हैं या आजम खान, अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और ताहिर हुसैन जैसे नाकाम और जेल की हवा खाने वाले आज़म खान यूनिवर्सिटी बनाने की सजा भुगत रहा है और ओवैसी वही जुर्म करके आज़ाद है फर्क सिर्फ इतना है कि ओवैसी अपने दम पर है और ये औरों के कंधों को मज़बूत सहारा करने की गलती कर बैठे थे। जिस ने आप की तरक्की को रोकने और आपकी बढ़ती ताकत व कूव्वत को देख अपना कंधा खींच लिया और आप आ गए फिर से ज़मीन पर, उन्हें खौफ महसूस हुआ कि अगर ये यूनिवर्सिटी कामयाब हुई ती आज़म ख़ान को ज़मीनी सतह पर ऐसी ताकत मयस्सर हो जाए गई जिस का काट नामुमकिन के करीब होगा लिहाज़ा अब इसे खत्म कर देना चाहिए और वही अंजाम हुआ जो माक़ब्ल के सियासी रहनुमाओं का होता आया है, यूनिवर्सिटी भी गई और खुद भी गए, अगर ये काम ना क्या होता तो कुछ दिन और चलते इस से समझ लेना चाहिए कि अगर दूसरों के लिए काम किया भी तो अपनी कौम के लिए नहीं कर पाएंगे अलबत्ता अपनी तिजोरी खूब भरी जा सकती है और हम जिस सियासत दलदल में कौम को मसाईब से बचाने के लिए कदम रख रहे हैं जब वही काम ना कर सके तो इस से बड़ी बेवकूफी और क्या होगी??? काश अब भी हम समझ जाएं तो आने वाली नस्लों को कामयाब कियादात दे जाएंगे।

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