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मोहम्मद अली जिनाह हमारे न तो नायक हैं और ना ही खलनायक. वो इतिहास की विषय वस्तु हैं, जिन्हें पढ़ा जाना चाहिए बिना जिनाह के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अधूरा है और ये बात वो समझते हैं जिन्हें देश के इतिहास से प्यार होगा।

खैर समस्या जिनाह में नहीं है बल्कि एक सोची समझी साजिश है, संघ को मुसलमानों से हमेशा दिक्कत रही है, संघ को समस्या है मुसलमान से, मस्जिद से, मदरसे से, मुसलमानों के कारोबार से, हमारी शादी से, हमारी परंपरा से यहाँ तक की तलाक से, समस्या बुर्के से है तो दाढ़ी और टोपी से भी है, हमारे खाने से, हमारे पहनावे से, अज़ान से है तो नमाज़ से है, हमारी आबादी से है, उन्हें समस्या पंचर बनाने वाले से है तो मुस्लिम आईएएस और आईपीएस से है, उन्हें हमारी संपत्ति अर्जित करने से समस्या है, मजबूरी में बस रहे मुस्लिम मुहल्ले से है.

बात जिनाह की होती तो दरगुज़र है…

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बात ये है इन्हें बराबरी का हक़ देने से समस्या है, मुसलमान क्यों सीना तान कर चल रहा है नज़र नीची क्यों नहीं है? खुद को भारत के अव्वल दर्जे का नागरिक क्यों समझता है जबकि संघ के मुताबिक हम दोयम दर्जे के लायक है, कोई पाकिस्तान भेज रहा है तो कोई वोट देने का अधिकार छीनने की दलील देता है.

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कोई सर काटने की बात कर रहा है तो कोई कब्र से निकाल कर बलात्कार करने को सजेस्ट कर रहा है। ये लिबरल आपको बताएंगे की मुसलमान पड़ी लकड़ी लेता है और भाजपा को बैठे बिठाए मुद्दे देता है.  कितने मक्कार और दोगले हैं ये लोग – हमारे वजूद से जुड़ी हर बात संघ और सत्ताधारी दल के लिए समस्या है तो किस बात को इग्नोर करे?

बताओ? बात जिनाह तक होती तो दरगुज़र है. समस्या मुसलमान है, उसका वजूद है, उसकी आइडैंटिटी है, बात वजूद की है, चुप नहीं रहेंगे, जो समझना है समझ लो.

सलमान नजीर की कलम से….

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