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जब भी सत्ता में परिवर्तन होता है तो व्यवस्था में लोगों की आवाजाही एक स्थापित परंपरा है। ये यह तो सभी स्वीकार करते हैं और प्रमुख स्थानों पर सत्तारूढ़ समूह द्वारा चुने गए लोगों को स्थान दिया जाता है। इसके चलते विभिन्न सरकारी, अर्ध सरकारी और स्वायत्त निकायों में प्रशासनिक परिवर्तन की भी उम्मीद की जाती है।

तो जब वेंकैया नायडू को राज्यसभा के सभापति के रूप में चुना गया तो राज्यसभा सचिवालय के भीतर विभिन्न विभागों में बदलाव, जिसमे राज्यसभा टेलीविजन (आरएसटीवी) भी शामिल है, होना अपेक्षित था। विशेष सचिव, आंध्र प्रदेश राज्य विधानमंडल के पद पर प्रतिनियुक्ति पर गए अतिरिक्त सचिव पी.पी.के. रामाचार्युलु, को सितंबर 2017 में प्रतिनियुक्ति अवधि पूरी किए बिना वापस बुला लिया गया। अतिरिक्त सचिव रामाचार्युलु को अपने पद से सेवानिवृत होने से एक सप्ताह पहले सचिव राज्यसभा सचिवालय पदोन्नति दे दी गयी। वह 31 मार्च 2018 को सेवानिवृत्त हुए और उसी दिन एक और आदेश के द्वारा उन्हें 1 अप्रैल 2018 से ‘अनुबंध’ पर सचिव के रूप में नियुक्त कर दिया गया। इसके अतिरिक्त, जैसा कि अपेक्षित था, नायडू ने अपने लंबे समय सहयोगी एए राव को आरएसटीवी के संचालन के लिए राज्य सभा सचिवालय में लाया। राव एक भारतीय सूचना सेवा अधिकारी है। राव संयुक्त सचिव के पद पर सचिवालय में शामिल हो गए और बाद में उन्हें अतिरिक्त सचिव के पदोन्नत कर दिया गया। वैसे इसमें कुछ असाधारण नहीं है। इसकी इसकी परिपाटी नायडू के पूर्ववर्ती हामिद मोहम्मद अंसारी ने डी बी सिंह के मामले में डाल दी थी। वास्तव में अंसारी इस दिशा में दो कदम आगे ही रहे।

डी बी सिंह राज्यसभा सचिवालय कैडर से नहीं थे। जब अंसारी उप राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए खड़े थे तो सिंह अंसारी के कार्यालय में काम करने के लिए भारतीय सचिवीय सेवाओं से आए थे। उसके बाद डी बी सिंह को राज्यसभा सचिवालय कैडर में शामिल किया गया था, वहां से सेवानिवृत्त होने की अनुमति दी गई और अंसारी के कार्यालय तक पूर्ण सेवा लाभों के साथ दोबारा नियुक्त किया गया।

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नायडू राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के ‘स्वयंसेवक’ होने का दावा करते हैं। इसलिए उनकी कार्रवाई ने मौजूदा फैसलों में कोई विवाद नहीं उठा। क्योंकि ऐसा कहा जा सकता है की उनका इरादा राज्यसभा और आरएसटीवी समेत संबंधित इकाइयों के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करना होगा।

अब तक तो चीजें ठीक थीं। राव ने ऊर्जा से भर कर आरएसटीवी का प्रभार संभाला और चैनल से नई सरकार की उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन के लिए तैयार करना शुरू कर दिया।

लेकिन अचानक मामले ने एक मोड़ लिया। राव के प्रभार सँभालने के कुछ दिनों के भीतर एक नए प्रधान संपादक (एनसी) नियुक्त करने के लिए एक “खोज और चयन समिति” का गठन किया गया। फिर संभवतः इसमें कुछ पुनर्विचार किया गया और पद के पद के लिए आवेदन आमंत्रित करने के लिए एक विज्ञापन प्रकाशित किया गया। मीडिया में काफी विवाद के साथ कुछ महीनों के बाद राहुल महाजन को आरएसटीवी का प्रधान संपादक नियुक्त किया गया। और चैनल में एक स्वमित्व की लड़ाई शुरू हो गयी।

नव नियुक्त संपादक राहुल महाजन ने संघ (आरएसएस) के समर्थन का दावा करते हुए चैनल के फैसलों में राव को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया। हालांकि संघ के साथ उनका कोई सीधा संबंध नहीं है। संगठन के साथ उनका निकटतम परिचय उस अवधि के दौरान था जब वह भाजपा को कवर करते थे। आरएसएस के साथ उनकी बातचीत मीडिया के लिए संघ द्वारा नियुक्त निम्न स्तर की कार्यकर्ताओं तक ही सीमित थी। पर इतना है की बी जे पी और संघ समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के साथ महाजन का लम्बा इतिहास है। एक स्वयंसेवक होने के बावजूद नायडू ने आरएसटीवी में संपादकीय पद के लिए एक गैर स्वयंसेवक को ले लिया है, यह थोड़ा सा दिलचस्प है। ऐसा लगता है कि यहां सत्तारूढ़ गुट के भीतर से एक तीसरी शक्ति भी है। ऐसे में आरएसटीवी में एक सत्ता संघर्ष आपेक्षित तो था ही।

सूत्रों का कहना है कि महाजन और राव के बीच टकराव प्रधान संपादक की नियुक्ति के तुरंत बाद ही शुरू हो गया था। बहुत जल्द ही संघर्ष इतना तीव्र हो गया कि सभापति नायडू को मामले में उतरना पड़ा। समझा जाता है कि महाजन को साफ़ तौर पर बताया गया कि राव विशेष रूप से चैनल के मामलों की निगरानी करने के लिए नायडू द्वारा नियुक्त चैनल के बॉस थे। यह महाजन के लिए एक बड़ा झटका था पर उनके पास कोई विकल्प नहीं था क्योंकि उनके आरएसएस समर्थन का मुलम्मा उप राष्ट्रपति नायडू पर काम नहीं करने वाला था। जाहिर है यह कुछ तीसरी शक्ति ही महाजन को प्रधान संपादक के रूप में स्थापित करने में कामयाब रही थी और वो आरएसएस नहीं थी।

अस्थायी रूप से महाजन ने कदम पीछे ले लिए लेकिन उनके पास सलाहकार सही थे। और ही एक और कहानी की अगली कड़ी शुरू हो गयी। महाजन के लिए सत्तारूढ़ गठबंधन के सबसे महत्वपूर्ण घातक में लोकप्रियता हासिल करना ज़रूरी था। इसके लिए महाजन ने “कांग्रेस मुक्त आरएसटीवी” अभियान शुरू किया। उन्होंने चैनल में काम कर रहे उन पेशेवरों की एक सूची बनाई जिन्हें कांग्रेस से जुड़े या कांग्रेस के निकट कहा जा सकता था। इस सूची को सत्तारूढ़ गठबंधन में दिखा कर और फिर इन पेशेवरों को चैनल से बाहर कर तुरंत-फुरंत संघ में स्वीकृति पाई जा सकती है।

इस अभियान की शुरुआत विनीत के. दीक्षित की सेवा समाप्त होने के साथ शुरू हुई । विनीत तीन बार दिल्ली के मुख्यमंत्री कांग्रेस नेता शीला दीक्षित के करीबी रिश्तेदार हैं। दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों 2010 के दौरान विनीत मीडिया टीम का हिस्सा भी थे । विनीत को 23 मार्च 2018 को एक माह के वेतन अग्रिम के साथ सेवा समाप्ति नोटिस दिया गया था, जो आरएसटीवी के इतिहास में एक अभूतपूर्व कदम था।

इस कड़ी में काटने वाली अगली गर्दन एक बहुत ही वरिष्ठ कांग्रेस नेता और लंबे समय से राज्यसभा सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी की बेटी रही । महाजन द्वारा हस्ताक्षरित कार्य मूल्यांकन रिपोर्ट के आधार पर उनकी बेटी निधि चतुर्वेदी को 25 अप्रैल 2018 को अनुबंध नवीनीकरण से वंचित कर दिया गया था। महाजन ने इस तथ्य के बावजूद अपनी मूल्यांकन रिपोर्ट पर लिखने पर जोर दिया था कि उन्होंने केवल एक महीने पहले ही अपना कार्यभार संभाला था। इस आग्रह के कारण पर अधिक कयास लगाने की ज़रुरत तो नहीं ही है ।

इस बीच महाजन आरएसटीवी में भाजपा विरोधी तत्वों की सूची के साथ निचले स्तर के आरएसएस कार्यकर्ताओं से भी मुलाकात कर रहे थे। उनकी कोशिश वरिष्ठ आरएसएस नेताओं से परिचित होना और आरएसटीवी में इस परिचय को अपने रसूख के रूप में इसका इस्तेमाल करना था।

ऐसा लगता है कि महाजन की स्कीम ने उन्हें अच्छा लाभ दिया है और संघ के वरिष्ठम अधिकारियो तक पहुंचा दिया जहाँ महाजन ने आरएसटीवी को कांग्रेस मुक्त बनाने के अपने भी बखान किया। कोई आसानी से कल्पना कर सकता है कि इस मीटिंग में ऊपर के कुछ उदाहरण ही उद्धृत किए गए होंगे। यह तो कहना मुश्किल है की इससे महाजन एक स्वयंसेवक के रूप मई स्थापित हो जायेंगे या नहीं पर इतना ज़रूर है की आर एस टी वी में कथित केसरिया एजेंडा लागू करने के दावे से उन्हें शीर्ष आरएसएस नेताओं की निकटता मिलना ज़रूर चिंता का विषय है।

फिलहाल इस मुलाकात से महाजन के हौसले बुलंद हैं और अब कथित कांग्रेस मुक्त आर एस टी वी में और भी पेशवरों को बहार का रास्ता दिखाया जाने वाला है। इस सब के बीच मई 2018 में आरएसटीवी में वरिष्ठ सहायक संपादक, अमृतांशु राय को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है।

सूत्र बताते हैं कि राहुल महाजन के एजेंडे पर सबसे अधिक विशाल दहिया, विनोद कौल और कविंद्र सचान को बाहर करना है।

और अगर कांग्रेस के निकटता ही निकले जाने का मानदंड है तो फतेह मोहम्मद टीपू, सैयद कंबर अब्बास जैसे और भी कई लोग हैं जिनका नंबर कभी भी लग सकता है। आरएसटीवी में सहायक निर्माता के रूप में काम कर रहे टीपू है सोनिया गांधी के चुनावी निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस में एक लोकप्रिय अल्पसंख्यक नेता का बेटा है।

आने वाले दिनों में यह स्थिति क्या मोड़ लेगी ये भविष्यवाणी करना तो मुश्किल है लेकिन एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि बिना प्रथम, द्वितीय, तृतीय वर्ष प्रशिक्षण के इस विशेष वर्ग की म्हणत से राहुल महाजन निश्चित रूप से खुद को एक संघी के रूप में स्थापित करने में सफल हो जायेंगे।

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