दुनिया में इस्लाम ही एक मात्र ऐसा धर्म हैं जो प्रत्यक्ष रूप से पडोसी के अधिकारों की बात करता है। जैसा कि कुरान की उपरोक्त आयतों के माध्यम से अल्लाह (ईश्वर) साफ़ साफ़ सन्देश दे रहा है कि ए इस्लाम को मानने वालो! अपने पडोसी से अच्छा व्यवहार करो चाहे वो तुम्हारा सम्बन्धी हो या फिर कोई अजनबी ही क्यों न हों।

और पडोसी का मतलब यह नहीं कि आपके आसपास के 1-2 मकान में रहने वाले लोग बल्कि हर वह इन्सान आपका पडोसी हैं जो आपके आसपास के 40 मकानों तक रहता है। और पडोसी का मतलब यह भी नहीं कि सिर्फ मुसलमान पडोसी हीं बल्कि वह किसी भी धर्म या जाति का हो इस्लाम को मानने वालो पर उनके अधिकार है जो उन्हें अदा करने जरूरी हैं अन्यथा वो सच्चे मुसलमान नहीं हो सकते।

इस्लाम के पेगम्बर मुहम्मद साहब (स.अ.व.) ने फरमाया : “वो शख्स हरगिज मुसलमान नहीं हो सकता जो खुद पेट भर खाना खाकर सोयें और उसका पडोसी भूखा सोयें।” उन्होंने यह भी फरमाया कि अगर आपका पडोसी आपसे दुखी हैं तो आप स्वर्ग में नहीं जा सकते और आपकी हर इबादत (पुण्य) व्यर्थ हैं।

पेगम्बर मुहम्मद साहब (स.अ.व.) ने फरमाया कि अगर आपके घर में कुछ लजीज पकवान बन रहा है तो उसे ढक कर रखो ताकि उसकी खुशबू पडोस तक न पहुंचे क्योंकि अगर आपका पडोसी परिवार गरीब हैं और वह इस काबिल नहीं कि वैसा पकवान बनाकर खा सके तो इससे उनका दिल दुख सकता हैं कि वह इस काबिल नहीं कि ऐसा खाना खा सकें।

तो जो इस्लाम अपने मानने वालों को यह सिखाता हैं कि अपने पडोसी को तकलीफ मत दो, खुद खाना खाने से पहले अपने पडोसी से पूछो कि उन्होंने खाना खाया या नहीं, जो इस्लाम अपने मानने वालों से यह कहता हैं कि अगर तुम्हारा पडोसी तुम्से खुश नहीं तो अल्लाह (ईश्वर) तुम्से कभी खुश नहीं हो सकता। तो वही इस्लाम किसी बेगुनाह और मासूम को मारने की बात कैसे सिखा सकता हैं?

अत: दुनिया के तमाम लोगों से मेरी गुजारिश हैं कि अगर वास्तव में इस्लाम को समझना चाहते हैं तो पवित्र कुरान को पढे अथवा पेगम्बर मुहम्मद साहब (स.अ.व.) की जीवनी को पढ़ें। मेरा विश्वास है कि इस्लाम के प्रति आपकी सोच बदल जाएगी।

मोहम्मद जुनेद टाक (बाली) राजस्थान
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