इस्लाम में बाप की जायदाद में भी बेटियों को हक़ लेकिन दस्तावेज़ की शक़्ल तक महदूद

7:32 pm Published by:-Hindi News
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महजबीन

इस्लाम में बाप की जायदाद में बेटियों का भी हक़ है, इसका ज़िक्र सूरह निसा में है, इस सूरत में सबके हक़- हक़ूक का ही ज़िक्र है, मगर हक़ीक़त यह है कि बेटियों का बहनों का जो बाप की जायदाद में हक़ है वो सिर्फ़ एक दस्तावेज़ की शक़्ल में महदूद है, क़ुर्आन के बरख़ों की सूरतो में महदूद है, इन हक-हक़ूक की आयतों को सूरतों की तफसीर मर्द उलमा अपने मफाद के हिसाब से अपनी तक़रीर में ब्यान करते हैं, हक़ीकत की रोजमर्रा की ज़िंदगी में इन आयतों की तफसीर को हक़ देने की बात को अमलीजामा कोई नहीं पहनाता।

ज़रा गिनवाए बाबा आदम से लेकर आज तक कितने मुसलमान भाइयों ने बाप ने अपनी बेटीयों को बहनों को दहेज़ की जगह उनका हक़ खुश होकर या अल्लाह से डरकर अदा किया हो ? हुज़ूर की सुन्नतों पर अमल भी ऊपरी सतह पर दाढ़ी – टोपी टखनो से ऊपर पजामा बैठकर, पानी पीने मिसवाक तक महदूद है ? हुज़ूर की असल ज़िंदगी असल किरदार को कौन अपने अंदर उतारता है ? अपनी बीवियों से कितने मुसलमान मर्द अच्छे अख़लाक़ सलूक से पेश आते हैं ? कौन मुसलमान मर्द अपनी बीवीयों को गाली गफ्तार बकने से पाक़ साफ़ है ? कुछ ही हैं जो अपनी बीवियों से अख़लाक़ से पेश आते हैं उन्हें गालीयाँ नहीं देते।

वरना हक़ीक़त यह है कि दीनी दुनयवी ताअलीम याफता मुसलमान मर्द भी अपनी बीवियों से अख़लाक़ से पेश नहीं आते उन्हें गालियाँ बकते हैं, 50% मुसलमान शराब-जुवे की लत में मुब्तिला हैं, पैसा अपनी बीवी के हाथ में देना उन्हें घरेलु पारिवारिक मश्विरा में शामिल करना अपनी मर्दानगी अपनी अना के ख़िलाफ़ समझते हैं। 70% मुसलमान और गाली गलोच भी करते हैं। अपनी बीवियों को मारपीट भी करते हैं, अपने परिवार की औरतों को उपेक्षित भी करते हैं। कोई अपने परिवार के सामने अपनी बीवी को अहमियत नहीं देता तो कोई अपनी बीवी के सामने अपने भाई बहन माँ – बाप को अहमियत नहीं। कितने मुसलमान बाप हैं भाई हैं जो अपनी बेटियों को बहनों को उनकी पसंद का शरीक़ेहयात चुनने की इजाज़त देते हैं। उनकी पसंद नापसंद का ख़्याल रखते हैं ? दीनी ताअलीम और दुनयावी ताअलीम हासिल करने के बाद भी परिवार के सदस्यों के बीच बेलेंस बनाना नहीं जानते 70% मुसलमान मर्द।

बड़े-बड़े उलमा भी अपनी दुल्हनें ससुराल से मय साजोसामान के साथ लाते हैं, मुफ्ती लोग भी अपनी बेटियों को बहनों को उनका हक़ नहीं बल्कि बर्तन कपड़े ज़ेवरात फर्नीचर इलेक्ट्रॉनिक सामान (दहेज़) देकर रुख़सत करते हैं। ये जो औरतों बहनों बेटियों की हक़-हक़ूक की बातें हैं क़ुर्आन की आयतें हैं। न इन्हें मुसलमान मर्द और दानिश्वर सिर्फ़ दस्तावेज़ में महफूज़ रखते हैं, जब किसी दूसरे मज़ाहिब के लोगों पर तंज करना होता है, जब दूसरे मज़ाहिब के लोगों को फेमिनिज़्म की बहस में टीवी फेसबुक या डिबेट में अपने मज़हब से निचा दिखाना होता है। तब जुमले टिप्पणी विश्लेषण के तौर पर इस्तेमाल करते हैं,सिर्फ़ थियोरी है।

यह प्रेक्टिकल कभी नहीं होता इन बातों का, हर जगह मुसलमान मर्द मदरसों में फेसबुक पर बहसो में अपनी तक़रीर में कहते हैं कि दूसरे मज़ाहिब में औरतों को उनके हक़ नहीं दिये हैं। बराबरी नहीं दी है, सिर्फ़ इस्लाम में ऐसा है कि इस्लाम मज़हब में औरतों को बराबर का दर्ज़ा दिया है। उन्हें उनके हक़ देने की बात कही है शरीक़े हयात चुनने तक की आज़ादी है, मगर अपने घरों में इन बातों पर अमल नहीं करते।

यह लेखिका के निजी विचार है।

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