दैनिक जागरण का एक पत्रकार अवनीन्द्र कमल कैराना पहुंचा. लौटकर अपने हिसाब से ‘बेहतरीन’ रिपोर्ताज लिखा. शीर्षक है- ”फिलहाल कलेजा थामकर बैठा है कैराना”. यह रिपोर्ताज जागरण के 20 जून के शामली संस्करण में प्रकाशित भी हो गया. अब जरा इन महोदय की लफ्फाजी देखिये…

”दोपहर की चिलचिलाती धूप में पानीपत रोड पर लकड़ी की गुमटी में अपने कुतुबखाने के सामने बैठे मियां मुस्तकीम मुकद्दस रमजान महीने में रोजे से हैं। पलायन प्रकरण को लेकर उनके जेहन में खदबदाहट है। चाय की चुस्कियों में रह-रहकर चिंताएं घुल रही हैं, मुस्तकीम की।”

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यह रिपोर्ट पूरी तरह फर्जी प्रतीत हो रही है क्योंकि मुस्तकीम मियां को जागरण संवाददाता ने रोजे की हालत में चाय की चुस्की लेते हुए बता दिया है. कैराना मामले में पलायन की खबरों में उतनी ही सच्चाई है जितनी जागरण के संवाददाता ने मुस्तकीम को रोजे की हालत में चाय की चुस्की लेते हुए बताया है. बात का बतंगड़ बनाकर पेश करने वाले जागरण के पत्रकार इस कदर बेसुध हैं कि उन्हें मालूम ही नहीं कि रोजे में खान पान पूरी तरह से प्रतिबंधित रहता है. सह कहा जाता है कि हिन्दी पत्रकारिता वेंटीलेटर पर है.

Wasim Akram Tyagi लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।

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