मुददस्सीर अहमद क़ासमी

अन्य चार राज्यों के साथ साथ उत्तर प्रदेश में भी चुनाव की गहमागहमी है। सभी पार्टियों ने जनसमर्थन हासिल करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना शुरू कर दिया है। प्रत्येक खीमा से दूसरे खीमा पर आरोपों की बारिश हो रही है और हर मोर्चा को स्टेज शो के लिए अभिनेता से लेकर तमाशबीन तक उपलब्ध हैं और साथ ही साथ वहां की इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया ने विशेष रूप से अपना अपना रंग दिखाने की प्रक्रिया भी जारी कर रखा है।

विडंबना यह है कि भारत के अन्य राज्यों की तरह यहां भी लोग आमतौर पर विकास के बजाय धर्म और जाति के नाम पर वोट डालते हैं, जिसका लाभ यहां की पार्टियां भी पूरी तरह से प्राप्त करने की कोशिश करती हैं। खास बात यह है कि इस बार सभी बड़ी पार्टियां अपने सहयोगियों के साथ सरकार बनाने का सपना देख रही हैं। लेकिन यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि किस पार्टी का सपना पूरा होता है।

चूंकि मुसलमान यूपी की सरकार बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए वहां के मुसलमानों की स्थिति को समझना चाहिए। उत्तर प्रदेश में कई अन्य प्रांतों की तरह एक बड़ी संख्या में मुसलमान रहते हैं जो राज्य में पूरी आबादी का लगभग 20 / प्रतिशत हैं। यह विडंबना है कि विकास के सभी दावों के बावजूद इतनी बड़ी संख्या के साथ हमेशा से सौतेला व्यवहार अपनाया जाता रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहां भी मुसलमानों को परेशान करने और भय से ग्रस्त रखने का एक लंबा इतिहास है जिसके परिणामस्वरूप आजादी के 70 / वर्ष बाद भी यहां के मुसलमान डर की स्थिति से बाहर नहीं आ पाए हैं।

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महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वर्तमान और पूर्व की सरकारों के मुसलमानों के लिए विकास कार्य करने के दावों के बावजूद अंत अब तक इतनी बड़ी संख्या में मुसलमानों की बस्तियां शहर, गांव, मुहल्ले और शहर दरिद्रता, गरीबी और अज्ञान की तस्वीर क्यों बने हुए हैं? अंत यहाँ की सरकारें मुसलमानों की बस्तियों में जरूरत के अनुसार स्कूल, कॉलेज, बैंक, सरकारी संस्थान और अस्पताल जैसी सुविधाएं शुरू करने से क्यों कतरा रही हैं। एक ओर राजनीतिक दल जनता से बड़े-बड़े राजमार्गों, बंदरगाहों, हवाई अड्डे, औद्योगिक क्षेत्र और वाणिज्यिक केन्द्रों, मेडिकल कालेजों और विश्वविद्यालयों के निर्माण के वादे कर रही हैं और दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्र हो या शहरी हर जगह गरीबी से त्रस्त आबादी में मुसलमानों की भारी बहुमत बदलते यूपी के विकास के रूपक का हिस्सा नहीं बन सकी है। मुसलमानों के विकास और भय की यह तस्वीर भी शोषण की एक पूरी कहानी है।

ऊपर सूचीबद्ध तथ्यों की रोशनी में यह कहना सच हो जाएगा कि अब तक वहां की सरकारों की उदासीनता ने वहां के मुसलमानों के ज़ख़्मों पर नश्तर लगाने का काम किया है। आश्चर्य की बात यह है कि अतीत में जिनके ताक़त के सहयोग से कभी समाजवादी पार्टी और कभी बहुजन समाजवादी पार्टी सत्ता की कुर्सी पर काबिज रहने में सफल रही है, उन्हीं को न्याय दिलाने और विकास के रास्ते पर लाने में यह सरकारें लापरवाही करती रही हैं। हालांकि छोटे रूप में कुछ विकास कार्य भी हुए हैं लेकिन उसका ग्राफ शोषण के मुकाबले बेहद कम है।

जहां तक भाजपा का सवाल है तो अब इस पार्टी के लिए देश में 2014 जैसे हालात नहीं रहे क्योंकि उनके अक्सर वादे वादे ही रह गए और देश में असहिष्णुता (गैर रवादरी) ने तो भाजपा की कलई ही खोल दी है। जहां तक हर तरह की महंगाई के आसामान छूने की बात है तो इस सरकार ने पिछले सभी रकाड तोड़ दिए हैं। इसी लिये विकास के नारों पर न जीत पाने के डर से यूपी में भाजपा के कुछ नेताओं ने भड़काऔ भाषण के द्वारा मुसलमानों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है, जिसका एकमात्र उद्देश्य हिंदू वोट को एकजुट करना है।

अगर मुस्लिम, दलित और धर्मनिरपेक्ष हिंदू इस बाजीगरी को समझने में सफल हो गए तो यूपी में बिहार की तरह भाजपा की उम्मीदों का दम तोड़ना तय है। इसके अलावा जहां तक यूपी में ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन के आगमन का सवाल है तो उम्मीद है कि कुछ क्षेत्रों में इसका असर होगा, यह अलग बात है कि प्रभाव नकारात्मक होता है या सकारात्मक यह भी वहां के मतदाताओं के समझ समझ पर निर्धारित है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल अभी भी बरकरार है कि जब अक्सर पार्टियों का प्रदर्शन मुसलमानों के संदर्भ में संतोषजनक नहीं है तो फिर मुसलमान किसे वोट दे? इस सवाल के जवाब में एक सिद्धांत का उल्लेख करना होगा। नियम है कि जब दो हानिकारक चीजों में से किसी एक का चयन आवश्यक हो तो दोनो में से जो कम हानिकारक होता है उसका चयन किया जाता है। इसलिए अब यह बुद्धिमानों को तय करना है कि कम हानिकारक कौन है जिस से कुछ लाभ भी हो सकता है और आम जनता को उनके फैसले पर मुहर लगा ना है।

सबसे महत्वपूर्ण और जरूरी काम जो यूपी के लोगों को करना है वह अपने आप को संगठित करना है। सौभाग्य की बात यह है कि उत्तर प्रदेश में विभिन्न मुस्लिम संगठनों और दलों को अपने-अपने क्षेत्रों में मज़बूती प्राप्त है लेकिन दुर्भाग्य की वजह से हर एक की वफादारी किसी विशेष राजनीतिक पार्टी से है। यह तय है कि अगर क्रांति लाना है तो अलग अलग राजनीतिक खेमों में बंटे लोगों को एकजुट करना होगा और यह जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश के उलमा, विद्वानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को निभानी होगी।

भारतीय संदर्भ में यह बात सच है कि महज धर्म के नाम पर कोई राजनीति भी यहां देर पा साबित नहीं हो सकती, क्योंकि गंगा जमुनी तहज़ीब ही यहां की पहचान है और इसे नजरअंदाज करके कोई भी असली सफलता की मंजिल को नहीं पहुंच सकता। इस संदर्भ में यूपी की राजनीति में धर्मनिरपेक्ष छवि रखने वाली पार्टियों की संभावना उज्जवल हो सकते हैं लेकिन शर्त यह है कि मुसलमानों और अन्य पिछड़े वर्गों का विश्वास प्राप्त किया जाए। कहा जाता है कि राजनीति में कोई दोस्त और दुश्मन नहीं होता इसलिए यूपी के मुसलमानों के लिए यह जरूरी है कि अपने हितों को सामने रख कर हर विधानसभा क्षेत्र के लिए अपना कार्य योजना तैयार करैं और अपनी मांगों के हिसाब से एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी और उम्मीदवार से समझौता करें।

एक ऐसे समय में जब कि विकास के लिए प्रत्येक के सहयोग की जरूरत है, एक छोटी सी भूल भी उज्जवल भविष्य की उम्मीदों को नुकसान पहुँचाने के लिए काफी है। यह वह समय है जब अतीत की विफलताओं को ख़तम करने के लिए धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व को एकता की ताकत से मजबूती प्रदान की जाए। लेकिन यह सब तभी संभव हो पाएगा जब वह संगठन और व्यक्तित्व, जिनके पीछे उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की भीड़ है दिल बड़ा करते हुए मुसलमान, दलित, सभी कमज़ोर वर्ग और देश के हित के लिए एक मंच पे आ जाएं।

(लेखक मरकज़ुल मआरिफ़ एजुकेशन एंड रिसर्च सेण्टर मुम्बई मैं लेक्चरर और ‘ईस्टर्न क्रिसेंट’ मैगज़ीन के असिस्टेंट एडिटर हैं। [email protected])

नोट – उपरोक्त लेखक के निजी विचार है 

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