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— राजीव शर्मा (कोलसिया) —

इस चेहरे को गौर से देखिए। किसी मामूली का आदमी चेहरा मालूम होता है। इतना मामूली कि एक बार कोई देख भी ले तो शायद एक दिन या एक हफ्ते बाद याद ही न रहे, लेकिन इन्होंने हमारे देश के लिए इतना बड़ा काम किया है जिसे जानने के बाद आप इन्हें जिंदगी भर याद रखना चाहेंगे।

इनका नाम मेमन अब्दुल हबीब यूसुफ मार्फानी है। ये एक विख्यात कारोबारी होने के साथ ही स्वतंत्रता सेनानी भी रहे हैं। इनका ताल्लुक गुजरात के सौराष्ट्र में स्थित धोराजी शहर से रहा है।
जब दूसरा महायुद्ध युद्ध छिड़ चुका था और नेताजी सुभाषचंद्र बोस आज़ाद हिंद फौज का नेतृत्व करते हुए भारत की स्वतंत्रता के लिए जंग लड़ रहे थे तब मार्फानी साहब ने उनकी बहुत मदद की।

नेताजी को फौज के लिए हथियार, राशन और जरूरी सामान खरीदने के लिए पैसों की सख्त जरूरत थी। बर्मा में उनके आह्वान पर हजारों भारतीयों ने फौज को आर्थिक सहयोग भी किया, पर जरूरत और थी। उस समय मार्फानी साहब ने फौज को एक करोड़ रुपए देकर सबको चौंका दिया।

यही नहीं, उन्होंने थाली भरकर अपनी बीवी के सभी गहने दानपात्र में डाल दिए। औरतों को अपने गहनों से कितना लगाव होता है, यह बताने की जरूरत नहीं। लेकिन मार्फानी साहब के इस फैसले से उनकी बीवी और पूरा परिवार बहुत खुश था।

नेताजी इस अनोखे दानवीर क्रांतिकारी से बहुत प्रभावित हुए और बोले — अब्दुल, जहां तुम जैसे लोग हों, उस मुल्क को आज़ाद होने से कोई नहीं रोक सकता। हिंदुस्तान आज़ाद होगा और बहुत जल्द होगा।

नेताजी सुभाष ने मार्फानी साहब को सेवक—ए हिंद मेडल से सम्मानित किया था। आज कुछ लोग जब देशभक्ति की मनमानी व विचित्र परिभाषाएं तैयार कर रहे हैं तो उन्हें पढ़ना चाहिए कि अब्दुल हबीब कौन थे। अपना घर फूंक कर दूसरों के घर में उजाला करने के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए।

इस चेहरे को एक बार फिर गौर से देखें और इसकी कहानी जमाने को बताएं। यही वे लोग हैं जिनकी बदौलत हम आज़ादी का सवेरा देख पाए।

भारत ज़िंदाबाद !! हमारी आज़ादी ज़िदाबाद !!

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