वरिष्ट पत्रकार, रवीश कुमार

मलेशिया के चुनावों में जिस पार्टी पकतन हरपन गठबंधन को बहुमत मिला है, उसका वादा था कि सत्ता में आते ही जीएसटी की दर 6 प्रतिशत से 4 प्रतिशत कर देंगे और साल भर के भीतर जीएसटी समाप्त कर देंगे। कहीं कहीं सौ दिन भी लिखा है। मलेशिया के चुनावों में जीएसटी भी एक बड़ा मुद्दा था। मलेशिया के राजस्व का 40 फीसदी हिस्सा तेल से आता था मगर तेल के दाम गिरने से यह घटकर 14 फीसदी हो गया। इस वक्त राजस्व का 18 फीसदी जीएसटी से आता है।

मलेशिया की सरकार ने जीएसटी लागू किया तो वो लोग भी टैक्स देने लगे तो अभी तक इसके दायरे से बाहर थे। ऐसे लोगों की आमदनी तो बढ़ी नहीं मगर जीएसटी ने उनकी कमाई पर हमला कर दिया। इससे महंगाई भी बढ़ी और सरकार से अपेक्षा भी कि जब हर बात पर टैक्स दे रहे हैं तो सुविधाएं कहां हैं। नतीजा वहां की नजीब सरकार चुनाव हार गई है और 92 साल के महातिर मोहम्मद प्रधानमंत्री बनने की राह पर हैं।

माना जाता है कि जो सरकार जीएसटी लागू करती है वो चुनाव हार जाती है। मलेशिया में ऐसा हुआ लेकिन भारत में ऐसा नहीं हुआ है। भारत में जीएसटी लागू होने के तुरंत बाद गुजरात चुनाव हुआ था। सूरत के व्यापारी जीएसटी के कारण बर्बादी का रोना रो रहे थे। आज भी रो रहे हैं मगर उन्होंने वोट बीजेपी को ही दिया। आगे भी देते रहेंगे। सूरत वीरान हो गया है। शुरू में बीजेपी आधारऔर जीएसटी का विरोध करती थी, आज वह इन दोनों की सबसे बड़ी प्रचारक है। राहुल गांधी गुजरात में जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स कहते रहे, कर्नाटक में भी कहते हैं। गुजरात की जनता ने बीजेपी को ही चुना। क्या राहुल गांधी जीएसटी की दरें कम करने और साल भर के भीतर हटा देने का साहस दिखा पाएंगे? राहुल की तो आधार पर भी लाइन समझ नहीं आती। कभी ठीक से ज़ाहिर भी नहीं किया है।

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भारत में जीएसटी की दर 12 फीसदी है। किसी किसी आइटम पर तो 20 फीसदी से भी ज़्यादा है। जीएसटी का मतलब टैक्स की एक दर है। भारत में जीएसटी की कई दरें हैं। चार दरें हैं। मलेशिया में 6 प्रतिशत है। हम यहां जीएसटी की समस्या को सिर्फ व्यापारियों की समस्या समझते हैं। समस्या है भी मगर व्यापारी वर्ग भाजपा के साथ ही है। वह इस समस्या से एडजस्ट हो चुका है। इसलिए भारत के चुनावों में जीएसटी का सरकार विरोधी असर होगा, अभी देखना और समझना बाकी है। भारत के राजनीतिक दलों ने लोगों पर जीएसटी का असर नहीं देखा या उनके बीच इस मुद्दे को उठाकर नहीं देखा है कि जनता क्या करती है।

भारत में इस वक्त कई शहरों में पेट्रोल 80 रुपये प्रति लीटर मिल रहा है। लोगों में कोई असंतोष नहीं है। बल्कि व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी में चल रहा है कि 200 रुपये लीटर पेट्रोल ख़रीदेंगे लेकिन वोट मोदी को देंगे। जीएसटी के कारण तबाही भी है। नोटबंदी के नाम पर देश के साथ फ्राड भी हुआ लेकिन दोनों प्रयोगों या कुप्रयोगों का असर चुनावी नतीजों पर नहीं पड़ा। एक खास दायरे के बाहर इस पर चर्चा तक नहीं है। जीएसटी से व्यापारियों को दिक्कत भी होगी तो वे बोलते नहीं हैं। इसलिए मलेशिया के अनुभव को भारत से जोड़ने से पहले भारत के अनुभवों और यहां की राजनीति को समझना होगा।

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