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क्या किसी इन्सान को उसके कर्मों का फल मिलता है, खासतौर से बुरे कर्मों का? आपका इस पर क्या जवाब होगा, मैं नहीं जानता, पर मेरा जवाब है- हां, मिलता है और सौ फीसदी मिलता है।

इसमें कितना वक्त लगेगा, मैं नहीं कह सकता लेकिन फल मिलता जरूर है। ऐसा मेरा अनुभव है। आज मैं आपको मेरे साथ हुई एक सत्य घटना बताऊंगा जब मुझे और मेरे एक दोस्त को अपने कर्मों का फल मिला तथा विचित्र तरीके से मिला।

यह घटना वर्ष 1997 की है। मैं और मेरा एक दोस्त (जिसका नाम मैं नहीं बताऊंगा) किसी सामाजिक कार्यक्रम में शामिल हुए। हम दोनों बहुत उत्पाती थे। रोज नए-नए कांड रचते, नई खुराफातों को अंजाम देते।

उस कार्यक्रम में मेरे दोस्त की नजर खास चप्पलों की ओर गई। बहुत सुंदर व बिल्कुल नई चप्पलें थीं। दोस्त का उन पर दिल आ गया। वह बोला- यार ये चप्पलें तो मुझे चाहिए। मैंने उसे मना कर दिया। मुझे कोई और शरारत पसंद आ जाती लेकिन चप्पल चोरी जैसा तुच्छ कार्य अच्छा नहीं लगा।

मैं ना-ना करता रहा, उधर नई चप्पलें देखकर उसका मन ऐसा डोला कि खुद को रोके रखना उसके बूते से बाहर था। आखिरकार मैंने कह दिया, मुझे नहीं पता, तुम्हें जो अच्छा लगे वह करो।

इतना कहना था कि उसने मेरे इन शब्दों को इजाजत समझ लिया। वह चप्पलें लेकर भाग गया। कुछ देर बाद एक लड़की रोती हुई आई। मालूम हुआ कि कोई बदमाश उसकी चप्पलें ले गया।

मेरा मन हुआ कि उसे सच बता दूं। फिर खयाल आया कि दोस्त के साथ मेरी भी फजीहत होगी। ठुकाई के साथ बदनामी होगी वो अलग, इसलिए मैं चुप ही रहा। वह रोती हुई अपने घर चली गई। पता चला कि घर जाते ही उसकी मां ने उसे खूब पीटा। उसे सुबह ही नई चप्पलें दिलाई थीं।

दो-चार दिन बाद यह बात आई-गई हो गई। उन्हीं दिनों एक ढाणी में कोई सामाजिक भोज था। हमारे घरों में निमंत्रण आया था। गर्मियों के दिन थे, इसलिए दोनों दोस्त सुबह की ठंडक में ही रवाना हो गए। जिन्हें ढाणी का मतलब नहीं मालूम उन्हें बता दूं कि राजस्थान में ढाणी ऐसे स्थान को कहा जाता है जो गांव-शहर से बाहर हो तथा वहां बहुत कम बसावट हो।

हमने भोज में स्वादिष्ट पकवानों का लुत्फ उठाया। वापसी के वक्त तक तीन बज चुके थे। आसमान से सूरज आग बरसा रहा था। रेतीले टीले तवे की तरह तप रहे थे।

जब हमने लौटने का इरादा किया तो मालूम हुआ कि मेरा दोस्त जो नई-नवेली चप्पलें पहनकर आया था, कोई अनजान शख्स उन्हें ले गया। बुरा हो शैतान का! कोई ऐसे मौके पर भी चप्पल हरण करता है! कहां तो पकवान उड़ाकर खुशी महसूस कर रहे थे, अब अरमानों पर पानी फिर गया। वाह री किस्मत!

जो हुआ सो हुआ, अब इस तपते रेगिस्तान को पार कैसे करें? करीब चार किमी की दूरी है। सोचते ही रोंगटे खड़े हो जाते। जरूर किसी खोटे मुहूर्त में यहां आए। आग लगे ऐसे भोज को।

फिर हम दोनों में एक समझौता हुआ। चूंकि मेरी चप्पलें चोरी नहीं हुई थीं, इसलिए दोनों ने तय किया कि आधे रास्ते एक मित्र चप्पल पहनकर चलेगा, आधे रास्ते दूसरा।

दोनों घर की ओर चले। कभी वह चप्पल पहनता और मैं दौड़ लगाकर किसी पेड़ की छाया ढूंढ़ता, कभी वह नंगे पांव सरपट दौड़ लगाता। पूरे रास्ते उस अनजान शख्स को कोसते आए।

हमने किसी तरह रास्ता तय किया, घर पहुंचे, पानी में पांव डुबोए। पूरी रात पैरों में जलन हुई। अगली सुबह मुझे उस लड़की का खयाल आया जिसकी चप्पलें हमने चुराई थीं। उसे भी उतना ही दुख हुआ होगा जितना कि हमें।

हालांकि मैं चप्पल चोरी के सख्त खिलाफ था, पर मैंने मित्र को रोका भी नहीं, चुप्पी साधे रहा। गुनाह से न रोकना, चुप रहना भी गुनाह होता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस कांड में मेरी बराबर भूमिका रही।

जो चोर के लिए सीढ़ी पकड़े, वह भी चोर ही कहलाता है। हम दोनों को उस गुनाह की बराबर सजा मिली, हम उसी के हकदार थे। वह मेरी पहली चोरी थी, दुआ कीजिए कि वही आखिरी हो।

चलते-चलते

अगर गर्मी का मौसम हो तो अब गांव-ढाणियों के भोज में जाने का मन नहीं करता। अलबत्ता बरेली घूमने का बहुत मन है। कहते हैं कि वहां के बाजार में झुमका गिरा था। अगर मुझे मिला तो उसकी मालकिन को लौटा दूंगा।

– राजीव शर्मा (कोलसिया) –

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