किसी नाम को बिगाड़ने की प्रथा उतनी ही पुरानी है जितनी कि नाम रखने की परंपरा। इधर नाम रखा नहीं कि उसमें तब्दीली शुरू हो जाती है। सबसे पहले नाम की काट-छांट घर से शुरू होती है। फिर वही नाम मौहल्ले में मशहूर हो जाता है।

हमें अक्ल आने तक बहुत देर हो चुकी होती है और सिवाय अफसोस के कुछ हाथ नहीं लगता। कभी-कभी बिगड़ा हुआ नाम असल नाम पर भारी पड़ जाता है। कुछ ऐसी ही कहानी मेमराज की है जो चौथी क्लास में मेरा सहपाठी था। उस समय उसकी उम्र कोई बीस-बाइस साल थी। चौथी क्लास से उसे ऐसा इश्क हुआ कि तीन साल उसी में लगा दिए।

यही हाल तीसरी और दूसरी क्लास का भी था। सिर्फ खुदा जानता है कि वहां उसने कितने बरस कुर्बान किए। उसे पास होने की कोई जल्दी भी नहीं थी, क्योंकि जिस स्कूल में वह पढ़ाई करता था, उसी की मालकिन के यहां नौकर था। लिहाजा पूरी फीस माफ थी।

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वह हमेशा आखिरी लाइन में और सबसे आखिर में बैठता था। अक्सर खामोश रहता। स्कूल में उससे ज्यादा उम्र का कोई विद्यार्थी नहीं था। दो-तीन टीचर तो उससे उम्र में छोटी थीं।

इन सभी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए स्कूल के बच्चों ने मेमराज का नाम बिगाड़ दिया। उसे नया नाम दिया गया- मेम साहब। कोई-कोई उसे बूढ़ी मेम भी कहता था। हालांकि मैंने उसे हमेशा असल नाम से ही पुकारा। एक-दो बार मेरा भी दिल किया कि उसे मेम साहब के नाम से पुकारूं, लेकिन मैंने नहीं पुकारा।

क्लास में बैठने की व्यवस्था ऐसी थी कि सबसे आगे मैं बैठता। मुझसे ही लाइन की शुरुआत होती और सबसे आखिर में मेमराज महाशय विराजमान रहते। उन्हीं से लाइन का समापन होता।

एक दिन हमारी टीचर ने कहा- देखो राजीव, यह मेमराज एक ही क्लास में तीन-तीन साल पड़ा रहता है। इस उम्र में तो मैं पढ़ाने लगी थी। मैं नहीं चाहती कि इस बार यह फिर फेल हो जाए, इसलिए कभी-कभी गणित और अंग्रेजी में इसकी मदद कर दिया करो। बाकी विषय में तो किसी तरह पास हो जाएगा।

मैं उसी दिन से इस मुहिम में जुट गया। कभी गणित के सवाल देता तो कभी अंग्रेजी का अनुवाद, मगर मेमराज को कुछ भी सिखाना ऊंट को टैक्सी में बैठाने जैसा था। वह बहुत मुश्किल से कोई बात समझ पाता, लेकिन धीरे-धीरे हालात बदलते गए। उसे काफी बातें समझ में आने लगीं।

अब तक उसे भी मालूम हो चुका था कि मुझे पढ़ने का बहुत शौक है लेकिन किताबें ज्यादा मिल नहीं पातीं। किताबों के नाम पर सिर्फ कोर्स की पोथियां थीं। अखबार-पत्रिकाएं नदारद। कभी कागज का कोई टुकड़ा मिल जाता तो उसे घंटों तक पढ़ता रहता। उस जमाने में बच्चों द्वारा बड़ों की पत्रिकाएं पढ़ना अच्छा नहीं माना जाता था। बड़े-बुजुर्गों का कहना था कि इससे बच्चे बिगड़ जाते हैं।

खैर… एक अच्छी खबर मेरा इंतजार कर रही थी। एक दिन मेमराज ने बताया कि मालकिन ने उसे जो कमरा दे रखा है, उसमें काफी तादाद में किताबें और पत्रिकाएं रखी हैं। कोई उन्हें नहीं पढ़ता। बरसों से उन पर धूल जमी है।

फिर क्या था, मुझे तो मुंहमांगा खजाना मिल गया! इधर मेमराज को सवाल बताता और हुक्म देता कि कल कोई अच्छी-सी किताब या पत्रिका लेकर आए।

दूसरे दिन ऐसा ही होता। मैंने इसी तरह कई किताबें, पत्रिकाएं पढ़ डालीं। धर्म, राजनीति, ज्योतिष, साहित्य, यात्रा वृत्तांत- सबकुछ पूरी तबीयत से पढ़ता। जब पढ़ने बैठता तो कई घंटों तक बैठा रहता। फिर चाहे कोई नजदीक आकर बाजा बजाए या कहीं फौजदारी हो जाए, मुझे फर्क नहीं पड़ता।

एक बार में सिर्फ एक किताब मंगवाता। पढ़कर उसे लौटा देता और तुरंत दूसरी हाजिर हो जाती। कभी-कभी अपनी किस्मत पर गर्व होता कि खुदा ने किस तरह मेरे लिए दौलत का खजाना खोल दिया! यह सिलसिला पूरा एक साल चला, क्योंकि उसके बाद मैं हरियाणा से राजस्थान आ गया।

जब वार्षिक परीक्षा के नतीजे आए तो सबसे ज्यादा आश्चर्य मेमराज को हुआ। मैं क्लास में अव्वल आया था लेकिन वह भी बहुत अच्छे नंबरों से पास हो गया।

वह साल मुझे हमेशा याद रहा। उस क्लास की शुरुआत मुझसे हुई थी और समापन मेमराज से। हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन चुके थे। मैंने उसे जो सिखाया, वह उस साल उसके काम आया, मगर मैंने उसकी मदद से जो सीखा, वह आज तक काम आ रहा है और जब तक जिंदा हूं, काम आता रहेगा।

आज हजारों लोग मेरी लिखावट देखकर जो इज्ज्त बख्शते हैं, उसका असल हकदार मैं नहीं कोई और है। उस घटना से मैंने सीखा, अगर शुरुआत अच्छी हो और समापन बेहतरीन हो, दोनों में मेलजोल हो, दोनों की ताकत जुड़ जाए, दोनों एक हो जाएं तो ऐसी कोई मंजिल नहीं जो हासिल न की जा सके।

चलते-चलते

यह इत्तेफाक है या खुदा का इशारा कि उसने दुनिया की सबसे पहली किताब (वेद) हिंदुओं को दी और सबसे आखिरी (कुरआन) मुसलमानों को। हिंदू धर्म कहता है- ब्रह्म एक है, दूसरा कोई नहीं। इस्लाम कहता है- अल्लाह के अलावा कोई और उपास्य नहीं, मुहम्मद उसके रसूल हैं।

सोचिए, खुदा ने शुरुआत और समापन के लिए हम दोनों को ही क्यों चुना? मेरा मानना है कि उसने हम दोनों पर औरों से ज्यादा भरोसा जताया है, औरों से ज्यादा हमें जिम्मेदारियां दी हैं।

अगर हम हिंदू और मुसलमान खुदा के इस इशारे को समझें और बेमतलब के बखेड़ों पर मिट्टी डाल एक बार वर्तमान पर ध्यान दें तो कोई आश्चर्य नहीं कि पूरी दुनिया के फैसले हमारी मर्जी से होने लगें।

आप यह भी समझ लें कि खुदा के उस हुक्म को भूलने की सजा हमें मिल रही है और साथ-साथ मिल रही है। हम करोड़ों की तादाद में हैं। चाहें तो क्या नहीं कर सकते! लेकिन हमने कभी एक-दूसरे से सच्ची हमदर्दी, सच्ची मुहब्बत की ही नहीं। यही वजह थी कि मुट्ठी भर अंग्रेज करोड़ों हिंदुओं और करोड़ों मुसलमानों पर राज करते रहे। हम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाए। हम आज भी सुधरे नहीं हैं। एक-दूसरे की मदद करने के संस्कार लगभग लुप्त हो चुके हैं।

आज मिस्टर ट्रंप हमारे लिए दरवाजे क्यों न बंद करें, दुनिया क्यों न हमसे नफरत करे, क्योंकि हिंदुओं और मुसलमानों ने अपने दिलों के दरवाजे एक-दूसरे के लिए बंद कर रखे हैं। अगर दुनिया हमें नापसंद करती है, दूसरे मुल्कों के हुक्मरान हमारे लिए दरवाजे बंद करते हैं तो इसके जिम्मेदार सिर्फ हम हैं। मगर हमारी बेशर्मी की हद देखिए, इन सबके बावजूद जबरन उन्हीं के मेहमान बनना चाहते हैं। खुद का घर ठीक करने की इच्छा हमारे दिलों में दफन हो चुकी है।

हिंदुओं और मुसलमानों के ये हालात देखकर मुझे कहना पड़ रहा है कि खुदा के इन बंदों के लिए कयामत आ चुकी है। ये दुनिया में कहीं भी चले जाएं, कोई इनकी कद्र नहीं करेगा, क्योंकि ये खुद एक-दूसरे की कद्र नहीं करते। इन्होंने हालात ऐसे बना दिए कि जब कोई बाहर से आकर मुसलमान की दाढ़ी खींचता है तो हिंदुओं में ऐसे झुंड के झुंड हैं जो बहुत खुश होते हैं। कहते हैं- अच्छा हुआ मुल्ले के साथ। अगर वही शख्स किसी हिंदू की चोटी खींचता है तो मुसलमानों में ऐसी कई टोलियां हैं जिनके मन में लड्डू फूटते हैं। कहते हैं- मरने दे काफिर को।

ऐसे बदतर हालात के लिए कौन जिम्मेदार है? साफ तौर पर आप और मैं। हम सदियों से साथ रह रहे हैं लेकिन अभी तक जिंदगी का सलीका नहीं सीखा। हमने पूरी बुद्धि राजनेताओं के यहां गिरवी रख छोड़ी है।

हममें से कितने हैं जो इस मुल्क के लिए सपना देखते हैं? मैं इस मुल्क के लिए ऐसा सपना देखता हूं, जब कोई मुस्लिम मर्द मेरे घर आए तो वह बेहिचक मेरे साथ एक ही थाली में खाना खाए। जब कोई मुस्लिम औरत मेरे घर आए तो वह अपने मां-बाप के घर से ज्यादा खुद को महफूज समझे।

– राजीव शर्मा (कोलसिया) –

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