मुझे जोधपुर में कोई याद नहीं करता लेकिन मैं जोधपुर को बहुत याद करता हूं। मैंने सिर्फ एक बार यहां का सफर किया था और उस दौरान मैंने वह सबक सीखा जो ताउम्र याद रखूंगा। वह 2006 का साल था (उम्मीद करता हूं कि मेरी याददाश्त सही है!) और मैं एयरफोर्स का टेस्ट देने जोधपुर गया था। मेरा बहुत पुराना खाब था कि सेना में जाऊं।
सबसे पहले हमें एक बहुत बड़े हॉल में ले जाया गया। वहां सेना के कई अधिकारी घूम रहे थे। फिर हमें प्रश्न पत्र बांटे गए। मुझे पेपर बहुत आसान लगा। ज्यादातर सवाल अंग्रेजी और गणित से थे। मैंने तय समय से पहले पेपर हल कर दिया। कुछ घंटे बाद उसका रिजल्ट सुनाया गया। मैं पास हो गया।
वहां कई और उम्मीदवार थे जिन्होंने टेस्ट पास कर लिया था। हम सबको सेना के ट्रकों में बैठाया गया और परीक्षा स्थल से दूर ले गए। वहां सेना के एक डॉक्टर साहब भी तैनात थे। मुझे उनकी जो बात सबसे अच्छी लगी वो यह कि उनका रवैया बहुत अच्छा था। वे दौड़ में शामिल लड़कों का हौसला बढ़ा रहे थे।
सेना के एक अधिकारी ने हमें दौड़ने का हुक्म दिया। उस वक्त खेतों में दौड़ने का अनुभव मेरे काम आया। जब कभी आवारा नीलगायें और ऊंट खेतों में घुस जाते थे, मैं उन्हें बाहर निकालकर आता था। एयर फोर्स की वह दौड़ भी मेरे लिए मुश्किल नहीं थी। मैं उसमें कामयाब रहा।
फिर बारी थी मेडिकल टेस्ट की। वहां वे ही डॉक्टर साहब तैनात थे जो दौड़ के वक्त हमारा हौसला बढ़ा रहे थे। जब मेरी बारी आई तो उन्होंने आंख, कान और जुबान की जांच की। इसी दौरान उनकी नजर मेरे पेट की ओर गई। वहां ऑपरेशन के निशान थे।
उन्होंने मुझसे पूछा, क्या तुम्हारा ऑपरेशन हुआ था?
मैंने कहा, जी हां।
पूछा, कब?
जवाब दिया, पिछले साल एक्सीडेंट हो गया था जिससे मुझे पेट पर चोट लगी थी। उसी का ऑपरेशन हुआ।
मेरा जवाब सुनकर वे बहुत खुश हुए। बोले, वाह! ऑपरेशन के बावजूद तुमने दौड़ पूरी कर ली। क्या तुम्हें कहीं कोई तकलीफ हुई?
मैंने कहा, कोई तकलीफ नहीं हुई। मैंने लिखित टेस्ट और दौड़ दोनों बिना किसी परेशानी के पास की हैं।
इसके बाद उन्होंने दो-चार सवाल और पूछे जो निजी जिंदगी से थे। आखिरकार उन्होंने मुझे कहा, देखो बेटा, मैं तुम्हारे हौसले की कद्र करता हूं लेकिन मेरी बात मानो, तुम एयर फोर्स में जाने का इरादा बदल दो।
मैंने झिझकते हुए इसकी वजह पूछी। उन्होंने बताया, तुम पूरी तरह से स्वस्थ हो और ऑपरेशन की वजह से तुम्हें कभी दिक्कत नहीं होगी लेकिन सेना की जिंदगी आसान नहीं होती। इसकी ट्रेनिंग बहुत सख्त होती है। वहां तुम्हें कुछ दिक्कत हो सकती है। अगर युद्ध के हालात हों तो किसी भी सैनिक को कोई रियायत नहीं दी जाती। इसलिए मैं तुम्हें सलाह दूंगा कि एयर फोर्स के बजाय अपनी पसंद का कोई और क्षेत्र चुनो और वहां मेहनत करो।
यह कहकर उन्होंने मुझे दूसरे कमरे में जाकर बैठने के लिए कह दिया। वहां मेरी उम्र के कुछ और लड़के बैठे थे। काफी देर बाद वे डॉक्टर साहब वहां आए। उन्होंने हमें एक छोटी-सी कहानी सुनाई। बोले- तुम्हारी ही उम्र का एक लड़का बहुत साल पहले एयर फोर्स में पायलट बनने आया था। उसके कई साथियों का भी सपना था कि वे पायलट बनें और लड़ाकू विमान उड़ाएं।
जब तमाम टेस्ट के नतीजे घोषित किए गए तो वह लड़का फेल हो गया और उसके साथी पास हो गए। उस वक्त वह लड़का बहुत दुखी हुआ लेकिन उसने हौसला नहीं छोड़ा। उसने आगे की राह पकड़ी। वहीं उसके साथियों ने एयर फोर्स जॉइन कर ली। कुछ वर्षों बाद वह लड़का तीनों सेनाओं का अध्यक्ष बन गया। इस तरह वह टेस्ट में फेल होकर भी उन साथियों का बाॅस बन गया जो उस दिन पास हुए थे।
उसका नाम डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम है। आज वे हमारे राष्ट्रपति हैं (2006 में कलाम साहब राष्ट्रपति थे) और तीनों सेनाओं के अध्यक्ष भी। इसलिए अगर किसी टेस्ट में सफलता नहीं मिली तो यह न समझें कि जिंदगी खत्म हो गई और आप किसी काम के काबिल नहीं, बल्कि यह समझें कि कोई और बेहतर विकल्प आपका इंतजार कर रहा है। उसके लिए खूब मेहनत करें।
वापसी के सफर में डॉक्टर साहब के ये शब्द मेरे कानों में गूंजते रहे। मैं आज तक उन शब्दों को भुला नहीं पाया हूं। जब पीछे मुड़कर कोहरे में छुपे उन दिनों की झलक देखने की कोशिश करता हूं तो महसूस करता हूं कि डॉक्टर साहब सौ फीसद सही थे। मैं मुल्क की सरहदों की हिफाजत करने वाला सिपाही नहीं बन सका, खुदा हमारे फौजी भाइयों को सलामत रखे लेकिन मैंने उसी दिन तय कर लिया था कि मैं बहुत अच्छा लेखक बनूंगा।
गांव से शुरू हुआ वह सफर आज तक जारी है। मैं मेरे मकसद में कितना कामयाब हुआ हूं, नहीं जानता। कभी-कभी मायूस भी हुआ हूं, मैंने एक वक्त खाना खाकर भी दिन गुजारे हैं, किराया बचाने के लिए बीस-बीस किलोमीटर पैदल चला हूं, लेकिन मैंने खुदा के अलावा किसी से कुछ नहीं मांगा और खुदा ने मेरी हर दुआ कबूल की है।
मैंने कुछ अखबारों और उनकी वेबसाइट्स के लिए काम किया है। मैं पूरे होश में कहता हूं कि दुनिया में बुरे लोग कम और अच्छे लोग ज्यादा हैं। मैं नहीं जानता कि यह मेरी खुशनसीबी थी या कुछ और, लेकिन मुझे अच्छे लोग ज्यादा मिले।
मैं आज एक वेबसाइट के लिए काम करता हूं और मुझे मेरे सभी साथियों पर गर्व है। मेरे स्कूल के बाद यह जगह मुझे दुनिया में सबसे ज्यादा पसंद है।
मैंने जहां भी काम किया, मुझे कई नौजवान मिले जो उम्र और इल्म में मुझसे कम थे लेकिन मैंने उन्हें कभी अपमानित नहीं किया। मुझे खुद से छोटों पर चीखना-चिल्लाना, उन्हें ताने मारना सख्त नापसंद है। मैं उन्हें कभी नहीं कहता कि तुम नाकारा हो। मैं उन्हें कभी मायूस नहीं करता। मेरा मानना है कि जो खुद से छोटों को मायूस नहीं करता, उसे खुदा कभी मायूस नहीं करता।
चलते-चलते
मुझे अब तक दो लोगों ने रिजेक्ट किया है मगर दिलचस्प यह रहा कि उनके इस फैसले के बाद मुझे और अच्छे मौकों में कामयाबी मिली। इसके लिए मैं सिर्फ उन्हीं लोगों का शुक्रगुजार नहीं हूं जिन्होंने मेरी काबिलियत पर भरोसा जताया, बल्कि मैं उन लोगों का भी दिल से अहसानमंद हूं जिन्होंने मुझे रिजेक्ट किया। आज भी मेरी उनसे मुलाकात होती है और मैं उनकी बहुत इज्जत करता हूं। इसलिए साथियों, कभी दिल छोटा न करो, कभी मायूसी को नजदीक न आने दो, कभी हार न मानो। जो लोग आपको रिजेक्ट करते हैं, वे आपके सच्चे दोस्त हैं क्योंकि वे जानते हैं कि आपको दूर तक जाना है। बहुत दूर तक ….।

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