साल 1996 यानी आज से करीब बीस साल पहले का वक्त। मैं हमारे नजदीकी कस्बे के एक स्कूल का छात्र था। स्कूल ने हाॅस्टल शुरू किया और मेरा दाखिला वहां करवा दिया गया। इस फैसले का मैंने घोर विरोध किया। घर में जो मजे और जैसी खुराफातों के मौके आसानी से उपलब्ध होते हैं, वे हाॅस्टल में कहां! वहां तो हर वक्त कोई डंडा लेकर सर पर सवार होता है।
मैंने मां-पिताजी को बहुत मनाने की कोशिश की, पर वे नहीं माने। बाहरी तौर पर मुझे बताया गया कि हाॅस्टल में भर्ती करवाने का फैसला इसलिए लिया गया है ताकि मैं सुधर जाऊं, क्योंकि आए दिन मेरी शरारतें बढ़ती जा रही हैं। बाद में मुझे मालूम हुआ कि यह फैसला इसलिए लिया गया ताकि मैं पूरा ध्यान पढ़ाई पर दे सकूं।
दूरी थोड़ी ही क्यों न हो, उसे आप जुदाई के अलावा और क्या नाम देंगे। एक दिन पिताजी ने मेरा सामान पैक किया और मुझे हाॅस्टल छोड़ आए। वहां दो-तीन दिन तो माहौल कुछ बोझिल लगा लेकिन बाद में सबकुछ सहज हो गया। हमारे स्कूल के प्रधानाध्यापक, हाॅस्टल इंजार्च सभी बहुत अच्छे थे।
वक्त गुजरता जा रहा था। मैंने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई की ओर लगा दिया। सर्दियों के दिन थे। कभी-कभी हम शाम को स्कूल के बाहर खेल के मैदान में जाते तो वहां एक मजदूर मिलता। हम उससे बातें करते। उसकी उम्र करीब 50 साल रही होगी।
वह पास ही किसी जगह काम करता था। शायद एक गोदाम में जहां अनाज की ढुलाई और सफाई होती थी। वह मामूली कपड़े पहनता। अब सर्दियां आ चुकीं तो स्वेटर पहनने लगा था। साथ में एक मामूली-सा कंबल भी लाता ताकि शाम को घर जाते वक्त ओढ़ सके। बस पांव में जूते नहीं थे।
एक दिन मैंने बहुत संकोच के साथ पूछा- इतनी सर्दी पड़ रही है, आप जूते क्यों नहीं पहनते? उसने जवाब दिया- घर के खर्चों के बाद इतने पैसे ही नहीं बचते कि जूते खरीद सकूं।
मैं खेल के मैदान से हाॅस्टल लौट आया। मेरे दिल में एक दर्द-सा था कि मैं उस शख्स को अपने जूते नहीं दे सका क्योंकि मेरे पांव बहुत छोटे थे। उसे मेरे नाप के जूते फिट नहीं आते। मैं उसके लिए कुछ नहीं कर सकता था। पहली बार मुझे मेरी लाचारी का अहसास हुआ कि दुनिया में किताबों से बाहर भी एक दुनिया है।
अब मैं अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं की तैयारी में जुट गया। बस एक कमी थी जो मुझे परेशान किए जा रही थी। हमारी अंग्रेजी की टीचर बहुत गुस्सा करती थीं। उनका बहुत खौफ था। इसलिए मैं उनसे दूर रहना ही पसंद करता था। कहा जाता है कि वे बहुत कम नंबर देती थीं। बच्चों को फेल कर देने में भी उन्हें कोई झिझक नहीं थी।
मैंने उनके बारे में कई भयानक किस्से सुने थे। पता नहीं वे सच्चे थे या झूठे। अब वे रात को मेरे सपनों में भी आने लगीं। मुझे पक्का यकीन हो चला था कि वे मुझे बहुत कम नंबर देंगी। उनके विषय की तैयारी के लिए मुझे अंग्रेजी की ग्रामर चाहिए थी जो उस समय बाजार में उपलब्ध नहीं थी। तब छोटी कक्षाओं की ज्यादातर किताबें सत्र की शुरुआत में ही उपलब्ध होती थीं और ग्रामर वगैरह छोटे शहरों में आसानी से नहीं मिलती थीं।
मैंने एक-दो दुकानदारों से पूछताछ की तो उन्होंने कोई पुरानी-सी किताब लाकर रख दी जो अब प्रचलन में नहीं थी और कीमत भी बहुत ज्यादा मांग रहे थे। मैं बाजार से खाली हाथ लौट आया। लग रहा था कि परीक्षा के बाद अंग्रेजी वाली टीचर के हाथों जरूर पिटूंगा।
अब मैं सिर्फ दुआ कर सकता था। जब परजेंट टेंस पढ़ता तो फ्यूचर टेंस भूल जाता और जब फ्यूचर टेंस पढ़ता तो पास्ट टेंस मेरे दिमाग से साफ हो जाता। अजीब दिक्कत थी। मैं तीन दिन से दुआ कर रहा था। मेरे रब, एक बार तो सुन ले। उस जालिम से मुझे बचा ले, मगर मेरी दुआओं का कोई असर नहीं हो रहा था।
एक दिन मैं फिर खेल के मैदान में गया। वह मजदूर घर जाने की तैयारी कर रहा था। उसके पांवों में अभी तक पुरानी चप्पलें थीं जो बहुत जल्द टूटने वाली थीं।
आज रात को मैंने सबसे पहले उस मजदूर के लिए दुआ की। मैं चाहता था कि इस सर्द मौसम में उसे एक जोड़ी जूते मिल जाएं। फिर मैं पढ़ाई कर सो गया। दो दिन तक मैं खेल के मैदान में नहीं गया लेकिन इस दौरान उस मजदूर के लिए दुआ करता रहा कि उसके पांवों को जूते मिल जाएं।
तीसरे दिन मैं शाम को उससे मिला। आज उसने चमड़े से बने काले रंग के जूते पहन रखे थे। मैंने उससे पूछा, आपने जूते कब खरीदे? उसने जवाब दिया- कहीं से नहीं। आज ही सेठजी का बड़ा लड़का कलकत्ता से आया है। ये जूते वह परिवार के किसी सदस्य के लिए लाया था लेकिन उसे रंग पसंद नहीं आया। इसलिए सेठजी ने मुझे दे दिए।
उसका जवाब सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई। रात को ही मैंने रब का शुक्रिया अदा किया। मैं बहुत खुश था। अगले दिन मैं स्कूल गया। तभी चपरासी आॅफिस में आया। उसने कहा – राजीव शर्मा, तुम्हें अंग्रेजी वाली टीचर ने आॅफिस में बुलाया है। मेरे साथ चलो।
मैं सन्न रह गया। आखिर उस गुस्सैल औरत को मुझसे क्या काम! मैं डरते-डरते चपरासी के साथ चला गया। टीचर आॅफिस में बैठी थीं। उन्होंने कहा, आज मैं सब बच्चों की काॅपियां चेक रही थी। तुमने सबसे अच्छा होमवर्क किया है और तुम्हारी लिखावट तो बहुत ही खूबसूरत है। लो, इसके बदले मैं तुम्हें एक इनाम देती हूं।
यह कहकर उन्होंने अंग्रेजी की नई ग्रामर मुझे थमा दी। वाह! इसी चीज का तो मैं इंतजार कर रहा था। टीचर ने कहा- जाओ और मन लगाकर पढ़ाई करो।
छुट्टी के बाद मैं हाॅस्टल लौट आया। रात को मैंने मेरे रब का शुक्रिया अदा किया कि उसने इस तरह मेरी दुआ कबूल की। जब मैंने मेरे लिए कुछ मांगा तो कुछ भी नहीं मिला लेकिन जब दूसरों के लिए मांगा तो वह मिल गया जिसकी उम्मीद भी नहीं थी।
अर्द्धवार्षिक परीक्षा अपने समय पर हुई जिसमें मेरे बहुत अच्छे नंबर आए। वार्षिक परीक्षाओं में भी मेरे बहुत अच्छे नंबर थे। मालूम हुआ कि उस साल मेरे नंबर सबसे ज्यादा अच्छे थे। मैं क्लास में ही नहीं पूरे स्कूल में पहले स्थान पर रहा था।
सबक
– दूसरों के लिए दुआ कीजिए, इससे आपकी दुआएं बहुत जल्द कबूल हो जाएंगी। चाहे उसका दीन-मजहब या जाति कुछ भी हो। रब हमारा दिल देखता है, दीन नहीं।
– दुनिया में शिक्षक और मां-बाप ही वे लोग हैं जो हमेशा आपको खुद से आगे देखना चाहते हैं। अगर वे सख्ती भी करते हैं, तो इसमें हमारी भलाई छुपी होती है।

शादीे करने के इच्छुक है तो अभी फोटो देखकर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें 

Loading...

कोहराम न्यूज़ की एंड्राइड ऐप इनस्टॉल करें