quran

मेरे गांव कोलसिया (झुंझुनूं) में घर से कुछ ही दूरी पर एक कुआं है। मैं इसी कुएं का पानी पीते हुए बड़ा हुआ हूं। जब मुझे इस कुएं का इतिहास मालूम हुआ तो मेरे मन में उन लोगों के प्रति आदर का भाव और ज्यादा गहरा हो गया जिन्होंने कड़ी मेहनत से इसकी खुदाई की थी। कुएं से बहते पानी के पीछे कई लोगों का खून-पसीना है।

यह रेगिस्तानी इलाका था। कभी यहां रेत के ऊंचे-ऊंचे टीले रहे होंगे। जब मेरे गांव के बुजुर्गों ने यहां कुआं खोदने का इरादा किया तो संसाधन बहुत कम थे। लोगों ने तपती धूप में तगारियां उठाईं, रस्सी खींची और इस कुएं का निर्माण किया।

इसी कुएं से मैंने एक बात और सीखी। एक बहुत बड़ा सबक जो या तो कुआं सिखाता है या पवित्र कुरआन।

गर्मी की छुट्टियों में जब हम दोपहर का वक्त खेलकूद में बिताते, तब चुपके से कुएं की ओर चले जाते। हम उसमें झांक कर अजीब-अजीब किस्म की बातें दोहराते। कोई कहता- तुम कौन हो? कुएं से आवाज आती- तुम कौन हो?

दूसरा चिल्लाता- ओय पागल! कुआं भी कहता- ओय पागल! तीसरा कहता- सुनते हो क्या? कुआं भी हमसे पूछता- सुनते हो क्या?

हम जितना जोर से चिल्लाते, कुआं भी उसी आवाज में वही बात दोहराता। अगर अच्छी बात बोलते तो कुआं भी और जोर से अच्छी बात दोहराता। अगर कोई कुछ गलत बोलता तो कुआं वैसा ही जवाब देने से नहीं चूकता।

कुआं एक शिक्षक है। बहुत बड़ा सबक सिखाता है पर समझने और अमल करने वाले लोग बहुत कम हैं। कुआं तो निर्जीव है। जब हम उसमें कुछ अच्छा या बुरा बोलते हैं तो वह उसी अंदाज में जवाब देता है। अगर वही बात हम किसी जिंदा इन्सान को कहेंगे तो वह क्यों नहीं वैसा ही जवाब देगा!

आज मैंने कुरआन में एक आयत पढ़ी तो मेरी निगाहें वहीं ठहर गईं। बचपन की वे यादें फिर ताजा हो गईं और मेरे दिल में एक ठंडी लहर-सी दौड़ गई। वह आयत ये है-

और अल्लाह के अतिरिक्त जिनको ये लोग पुकारते हैं, उन्हें कदापि अपशब्द न कहो, अन्यथा ये लोग सीमा से गुजरकर अज्ञान के कारण अल्लाह को अपशब्द कहने लगेंगे …। (कुरआन, 6:108)

इस आयत में रब साफ और सख्त निर्देश देता है कि कोई दूसरा किस धर्म या किस खुदा को मानता है, उसे बुरा-भला कहने का हमें कोई अधिकार नहीं है।

उसका खुदा झूठा है या सच्चा, यह तय करने में हम अपना माथा न खपाएं। वह जहन्नुम में जाएगा या जन्नत में, इसकी फिक्र आप या मैं न करें।

उसे इबादत के लिए पूर्व की ओर मुंह करना चाहिए या पश्चिम की ओर, इसकी चिंता हमें नहीं होनी चाहिए। उसे दिन में पांच बार इबादत करनी चाहिए या पचास बार, इस गम में आप खाना-पीना न छोड़ें, यह आपका काम नहीं है।

वह इबादत के लिए जंगल में जाता है या श्मशान में, इस उलझन में आप न फंसें। उसे दाढ़ी रखनी चाहिए या पूरे चेहरे पर राख मलनी चाहिए, यह आप उसी पर छोड़ दें, कृपया अपनी टांग न अड़ाएं।

वह मूर्ति को पूजे या निराकार को माने, किताब के सामने सर झुकाए या नास्तिक बन जाए, आपको उसके दीन में मीन-मेख निकालने का कोई अधिकार नहीं है। बेहतर होगा कि आप और मैं पहले खुद को देखें। पहले खुद को तो सुधार लें। आपके और मेरे कर्म रब के हवाले तथा उसके कर्म भी रब के हवाले। हम अपनी करनी की फिक्र करें। अपनी करनी हम भोगेंगे, उसकी करनी वह भोगेगा।

हम अपना मामला देखें क्योंकि हम सिर्फ उसी के जिम्मेदार हैं जो हम कर चुके हैं। जो हमने किया ही नहीं उसके लिए फिक्रमंद होने की जरूरत नहीं है। आप और मैं सिर्फ मामूली इन्सान हैं। अगर इस जिंदगी में खुद का थोड़ा सुधार कर लिया तो यही एक बड़ी उपलब्धि होगी।

मैं कितना भी सच्चा हूं, कितना भी अच्छा हूं, मेरा खुदा कितना भी सच्चा क्यों न हो, लेकिन अगर मैं किसी और के खुदा, किसी और के मजहब को बुरा कहूंगा तो क्या होगा? निश्चित रूप से वह शख्स पलटवार करेगा और मेरे खुदा को जी भरकर गालियां देगा। इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार कौन है? निश्चित रूप से मैं, क्योंकि मैं जानता हूं कि कुरआन में इसकी सख्त मनाही है। जानने के बावजूद जो किसी को बुरा कहेगा तो रब के सामने उसे गुनहगार होने से कोई नहीं रोक सकता।

मैं फिर इस बात को दोहराना चाहूंगा कि एक बेजुबान कुआं मेरे शब्दों को सुनकर उसी अंदाज में जवाब दे सकता है तो एक जिंदा और जुबान वाला इन्सान जवाब क्यों नहीं देगा! जरूर देगा, सौ फीसद देगा।

इसलिए दुनिया में कहां कौन किस खुदा की इबादत करता है, कैसे कपड़े पहनता है, क्या पीता है, कौनसी किताब पढ़ता है, कृपया इसमें अपना अनमोल समय बर्बाद न करें। अपना मामला देखें।

दुनिया में कुरआन जैसा कोई और ग्रंथ नहीं जो इतनी स्पष्टता, सादगी से दूसरों के धर्म की इज्जत करने का आदेश देता है। यहां तक कि किसी के झूठे खुदा को भी झूठा न कहने की नसीहत देता है। यह कहना बहुत बड़ा गुनाह बताता है। जो यह नसीहत पढ़कर भी न माने तो उससे बड़ा बदकिस्मत कोई और नहीं।

– राजीव शर्मा –


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