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– राजीव शर्मा (कोलसिया) –

गांव-देहात में जब से होली पर कपड़े फाड़ने और कीचड़ लगाने की रस्म शुरू हुई है, दिवाली मेरा प्रिय त्यौहार बन गया है। यूं तो दिवाली पर मुझे सबसे ज्यादा मिठाइयां ही आकर्षित करती थीं, लेकिन कई वर्षों तक मेरी सबसे बड़ी मनोकामना यही रही कि मैं भी खूब पटाखे चलाऊं। जैसे कि हमारे बड़े भाई साहब चलाते थे।

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मेरी यह मनोकामना मेरे दादा ने कभी पूर्ण नहीं होने दी। वे चाहते थे कि मैं छोटे वाले पटाखों और फुलझड़ी में ही खुश रहूं। जबकि मैं जोरदार धमाकों का हिमायती था।

एक बार संयोग ऐसा बना कि दिवाली पर ननिहाल चला गया। वहां दादाजी की तरह कोई सख्ती करने वाला नहीं था, मौज ही मौज थी। ननिहाल जाने से पहले भाई साहब के पटाखों पर हाथ साफ किया और थैले में छुपाकर ले गया। वहां खूब धमाके किए।

इसी उल्लास में जब एक ‘महाभयंकर’ पटाखे को चिन्गारी दिखा रहा था कि वह मेरे संभलने से पहले ही फट गया। उसके बाद तो संपूर्ण सृष्टि घूमती हुई नजर आने लगी। कुछ देर के लिए अपना नाम, गांव, पता-ठिकाना भूल-सा गया। बाद में समझ आया कि दादा की नसीहत ठीक थी।

उसके बाद पटाखों का ज्यादा मोह नहीं रहा। यूं भी उन दिनों गांवों में ज्यादा पटाखेबाजी नहीं होती थी। पटाखेबाजी का असली प्रकोप तब देखा जब मैं जयपुर आ गया। मैं जिस मौहल्ले में रहता था, वहां दिवाली से चार दिन पहले ही पटाखा प्रेमियों ने हाहाकार मचाना शुरू कर दिया। शाम ढलते ही कानफोड़ू धमाके शुरू हो जाते। वातावरण में बारूद की गंध से सांस लेना भी बहुत मुश्किल हो जाता। आंखों में जलन होती।

दूसरे दिन सड़कों पर पटाखों का कचरा फैला रहता। यह माहौल एक हफ्ते से ज्यादा दिनों तक रहता। हमारे पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग दमा के मरीज थे, उन्हें बहुत तकलीफ होती।

इन बातों का जिक्र मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि हाल में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में पटाखों की बिक्री पर जो पाबंदी लगाई है, उसके बाद काफी लोग इस फैसले को गलत बता रहे हैं। इस फैसले पर मेरी टिप्पणी यह है कि जज साहब ने बहुत अच्छा फैसला दिया है और न केवल दिल्ली, बल्कि सभी छोटे-बड़े शहरों में पटाखों की बिक्री पर पाबंदी लगा देनी चाहिए।

हमारे देश में वायु प्रदूषण इस स्तर तक पहुंच गया है कि अब ध्यान न दिया तो आने वाले कुछ ही वर्षों में हालात बेकाबू हो जाएंगे। आखिर हमें कहीं से तो शुरुआत करनी होगी।

हमें हमारे पड़ोसी देश चीन से सबक लेना चाहिए, जहां वायु प्रदूषण के मद्देनजर सरकार बहुत सख्ती बरत रही है। मुझे इस बात पर हैरानी होती है कि पटाखों की बिक्री पर पाबंदी के फैसले के बाद कई लोग कह रहे हैं कि यह हिंदू धर्म के खिलाफ है। माफ कीजिए, मेरा हिंदू धर्म इतना कमजोर नहीं है कि एक दिन पटाखे न चलाने से ही उस पर संकट आ जाए। उसकी ताकत तो श्रीराम के आदर्शों में है। जब वे लंका विजय के बाद अयोध्या आए तो सबने घी के दीपक जलाए थे। ये पटाखे तो कुछ दशक पहले चलन में आए हैं।

किसी भी शास्त्र में दिवाली पर पटाखे चलाने की अनिवार्यता नहीं बताई गई है। अगर इनके शोर और धुएं से वातावरण दूषित होता है तो यह पूरी तरह से वाजिब है कि इनके इस्तेमाल पर अब पाबंदी लगा देनी चाहिए। त्यौहार खुशियां बांटने के लिए हैं, किसी को सताने या हवाओं में जहर घोलने के लिए नहीं हैं।

मैं सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का तहेदिल से स्वागत करता हूं। मगर उन लोगों को सुप्रीम कोर्ट तो क्या भगवान भी नहीं समझा सकता जिन्हें हर अच्छे बदलाव में खोट नजर आता है। अगर आज जज साहब इन्सानियत के नाते कह दें कि कुएं में कूदना बुरी बात है तो वे लोग नहीं मानेंगे, बल्कि यह कहकर कुएं में छलांग लगा देंगे कि इसमें कूदना तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

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