muslim people praying
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– ग़ुलाम मुस्तफ़ा नईमी

इन दिनों के राजस्थान में असैंबली के लिए 2018 की इंतिख़ाबी गहमागहमी ज़ोरों पर है। हर सियासी पार्टी अपने अपने कील कांटे दुरुस्त करके इंतिख़ाबी रन में मद्दे मुक़ाबिल को ज़ेर करने के लिए उतर चुकी है। लेकिन दस्तूर के मुताबिक़ मुस्लमान इस बार भी इंतिख़ाबी चर्चा से मुकम्मल आउट नज़र आ रहे हैं, ना ही किसी सियासी पार्टी के एजंडे में मुस्लिम मसाइल का ज़िक्र है, ना इनकी फ़लाह-ओ-बहबूद का तज़किरा!! राजस्थान में असल मुक़ाबला कांग्रेस और बी जे पी के दरमयान है। लेकिन दोनों ही पार्टीयों के मंशूर में मुस्लमान दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रहा है।

मुस्लिम आबादी और नुमाइंदगी:

2011 की मर्दुम-शुमारी के मुताबिक़ राजस्थान में क़रीब 11.4 फ़ीसद मुस्लिम आबादी है। पहले मुस्लिम अक्सरीयती जिलों की एक मुख़्तसर फ़हरिस्त मुलाहज़ा फ़रमाएं:
बाड़मेर: 17.72 फ़ीसद।
नागौर: 12.84 फ़ीसद।
अलवर: 12.80 फ़ीसद।
भरतपुर: 12.59 फ़ीसद।
कोटा: 11.71 फ़ीसद।
सीकर: 11.44 फ़ीसद।
अजमेर शरीफ़: 11.20 फ़ीसद
चूरू: 10.93 फ़ीसद।
जोधपुर: 10.74 फ़ीसद।
सवाई माधोपुर:10.74 फ़ीसद।
झुंझुनूं:10.34 फ़ीसद।

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इन जिलों की आबादी देख कर आप यक़ीनन सोच रहे होंगे कि इन मक़ामात पर मुस्लिम नुमाइंदगी बेहतर नहीं तो ठीक-ठाक ज़रूर होगी, मगर अफ़सोस!! आपकी उम्मीदें ग़लत हैं क्योंकि इतनी बड़ी आबादी के बावजूद राजस्थान में आज़ादी के बाद से अब तक सिर्फ एक ही मुस्लमान मेंबर आफ पार्लीमैंट मुंतख़ब हुआ है। 1984 में झुंझुनूं से अय्यूब ख़ां ने पहली मर्तबा राजस्थान से मुस्लिम नुमाइंदगी का खाता खोला, उस के बाद अय्यूब ख़ां 1991 में भी इसी इलाक़े से एम पी मुंतख़ब हुए लेकिन उसके बाद से आज तक राजस्थान की ज़मीन मुस्लिम एम पी से मुसलसल महरूम है।

गुजिशता 70 सालों में कांग्रेस जैसी सैकूलर पार्टी ने केवल आठ उम्मीदवारों को टिकट दिया। इस में भी 1952 से 1980 तक सिर्फ जोधपुर में मुस्लिम उम्मीदवार उतारा गया बाकी पूरे सूबे में किसी ज़िले से मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट के लायक़ समझा ही नहीं गया। रहा बीजेपी का मसअला! तो इस पार्टी में मुस्लमानों के लिए पहले ही से नौ ऐन्ट्री का बोर्ड लगा है इस लिए यह पार्टी मुस्लमानों को टिकट देने का “पाप” किस तरह कर सकती है?

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असैंबली में मुस्लिम नुमाइंदगी:

राजस्थान में कुल 200 असैंबली हलक़े हैं। आज़ादी के बाद से ही मुस्लमान कभी भी अपनी आबादी के तनासुब में असैंबली में नहीं पहुंच पाए। इस की सबसे बड़ी वजह यही रही कि किसी भी पार्टी ने उन्हें आबादी के तनासुब में टिकट नहीं दिए। इस दरमयान कांग्रेस से लेकर जनता पार्टी और बी जे पी तक को मुस्लमानों ने आज़माया लेकिन कोई भी पार्टी मुस्लमानों के लिए फ़राख़-दिली नहीं दिखा सकी जिसकी वजह से मुस्लमान मुनासिब तादाद में कभी असैंबली नहीं पहुंच सके। 1952 में होने वाले पहले इलैक्शन में सिर्फ 3 मुस्लमान असैंबली तक पहुंचे। इस के बाद यह तादाद चार से सात के दरमयान डोलती रही लेकिन हक़ीक़ी नुमाइंदगी कभी नहीं मिली। 1998 में पहली मर्तबा मुस्लमानों की तादाद ने दहाई का अदद पार किया और कुल 12 मेंबरान असैंबली मुंतख़ब हुए, हालाँकि यह तादाद भी कुल आबादी का आधा ही थी। इस के बाद 2008 में एक-बार फिर मुस्लिम ऐम ऐल एज की तादाद 12 तक पहुंची लेकिन पिछले इलैक्शन [2013] में एक बार फिर तशवीशनाक हद तक गिरावट आई और इस वक़्त मौजूदा असैंबली में कुल दो मुस्लिम ऐम एल ए (MLA) मौजूद हैं जबकि सूबे में अपनी तादाद के मुताबिक़ कम से कम 22 मेंबर होने चाहिए थे लेकिन यह सियासी पार्टीयों की “पुरफ़रेब सियासत” का शानदार नमूना है।

मुस्लमानों के वोटों की आस सभी को है लेकिन उन्हें नुमाइंदगी देने में हर पार्टी को तकलीफ़ होती है। जब मुस्लमानों को उनकी तादाद के मुताबिक़ टिकट ही नहीं दिए जाते तो वो असैंबली में किस तरह आएं?  मौजूदा इंतिख़ाबी जंग में कांग्रेस ने केवल 14 टिकट दिए गए हैं जो आबादी के तनासुब से काफ़ी कम है और बी जे पी ने बिलकुल आख़िरी वक़्त में “नज़र-ए-बद” से बचने की कोशिश करते हुए सिर्फ एक ही उम्मीदवार को टिकट दिया है। मान लिया जाए कि ये सारे उम्मीदवार जीत भी जाएं तो भी कुल तादाद 15 तक पहुँचेगी जबकि सूबे की आबादी के मुताबिक़ मुस्लिम ऐम ऐल एज़ 22 से 23 होने चाहिए लेकिन ऐसा होते देखना किसी सियासी पार्टी को पसंद नहीं है।

कम नुमाइंदगी के अस्बाब:

सूबे में कई कौमें हैं जो मुस्लमानों से कम तादाद में होने के बावजूद हुकूमत और इक़्तिदार पर मज़बूत पकड़ रखती हैं।राजपूत बिरादरी की तादाद केवल 5.6 फ़ीसद है मगर ये क़ौम हमेशा ही सुबाई सियासत पर अपनी पकड़ बनाए रखती है, मौजूदा वज़ीर-ए-आला वसुनधरा राजे भी इसी क़ौम से तअल्लुक़ रखती हैं।साबिक़ वज़ीर-ए-आला अशोक गहलोत “माली बिरादरी” से तअल्लुक़ रखते हैं जिसकी आबादी पूरे सूबे में केवल 5 फ़ीसद है मगर उस के बावजूद इस क़ौम ने सूबे को वज़ीर-ए-आला दिया। पिछले 20 साल से सूबे में अदल बदल कर उन्हें दो बिरादरीयों के लीडर वज़ारत आला के मन्सब पर पहुंचे हैं। कम आबादी के बावजूद इन क़ौमों ने अपने सयासी शऊर और ज़हनी पुख़्तगी का बेहतरीन सबूत दिया है। दूसरी तरफ़ मुस्लिम क़ौम है जिसकी आबादी क़रीब 12 फ़ीसद है लेकिन यह क़ौम आज तक अपनी सियासी पहचान के लिए जिद्द-ओ-जोहद करने और दूसरों की मिन्नत समाजत करने पर मजबूर है। अगर हम घटती हुई नुमाइंदगी पर ग़ौर करते हैं, कई सारे अस्बाब नज़र आते हैं जिनमें से चंद अहम ये हैं

  • तालीमी कमज़ोरी: कहने के लिए सूबे में कई बड़े मदारिस और कालेजज़ हैं लेकिन मुस्लमानों की तालीमी शरह दूसरी कौमों से काफ़ी कम है।
  • मुख़्तलिफ़ पार्टीयों से वाबस्तगी: सैकूलरिजम के नाम पर मुस्लमान कई सियासी पार्टीयों में तक़सीम हैं जिसकी वजह से मुस्लमानों का वोट मुंतशिर हो जाता है । सभी सियासी पार्टीज़ मुस्लमानों के वोट लेने की हद तक अपनाईयत का मुज़ाहरा करती हैं लेकिन जब हक़ीक़ी नुमाइंदगी देने की बात आती है तो सभी को साँप सूंघ जाता है।
  • क़यादत से महरूमी: सूबे में हर छोटी बड़ी क़ौम का अपना एक लीडर है जिस पर मुकम्मल नहीं तो अक्सरियत भरोसा करती है, जिसकी बुनियाद पर ये कौमें हर सियासी पार्टी से अपने क़ौमी मफ़ादात की डील करने में कामयाब होती हैं लेकिन मुस्लमानों में ऐसा कोई लीडर नहीं है जिस पर अक्सरियत तो क्या अक़ल्लियत भी भरोसा करती हो!!  जो लोग भी क़ाइद के नाम पर नज़र आते हैं उनकी क़यादत का दाइरा उनके मुहल्ले से शहर तक ही महदूद है, जिसके बाइस कोई सियासी पार्टी क़ौमे मुस्लिम के मुतालबात पर ज़रा भी कान धरने को तैयार नहीं होती। क़ौमे मुस्लिम को समझना चाहिए कि क़ाइद आसमान से नाज़िल नहीं होते बल्कि अपने ही दरमयान से किसी को क़ाइद बनाना पड़ता है। दूसरी क़ौमों के क़ाइद भी फ़िरिश्ता सिफ़त नहीं हैं इस लिए अपने क़ाइदों में फ़रिश्तों की सिफ़ात तलाश करना बड़ी नादानी है जिसका ख़मयाज़ा पिछले 70 साल से हमें भुगतना पड़ रहा है।
  • मज़हबी क़यादत की बे-तवज्जुही:
    यूं तो सूबे में आस्ताना ए ग़रीब नवाज़ जैसा मज़हबी मर्कज़ मौजूद है लेकिन इस मर्कज़ में सिवाए नयाज़ फ़ातिहा के कोई अहम काम अंजाम नहीं दिया जाता।आस्ताना ए ग़रीब नवाज़ अफ़रादी और माली एतबार से इंतिहाई मज़बूत मर्कज़ है, अगर यहां से मुस्लमानों के मिल्ली और सियासी मफ़ाद के लिए कोई तवील मुद्दती (Long term) प्लान बनाया जाता तो यक़ीनन सूबे के मुस्लमानों की हालत काफ़ी बेहतर होती लेकिन अफ़सोस!! मरकजित के बावजूद यहां ऐसा कोई प्लेटफार्म नहीं बनाया गया जिससे मुस्लमानों का तालीमी या सियासी ग्राफ़ बलंद किया जा सकता। सूबे में मुख़्तलिफ़ मकातिबे फ़िक्र के कई बड़े इदारे मौजूद हैं, मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में उलमा व मशाइख़ का अच्छा ख़ासा असर व रूसूख़ है लेकिन मदारिस और उलमा व मशाइख़ भी अपने असर व रुसूख़ का इस्तिमाल करके ऐसा कोई नज़म नहीं बना पाए जो मुस्लमानों की सियासी हालत में बेहतरी का बाइस बन सकता।

आख़िरी बात

किसी भी जमहूरी मुल्क में आपकी ताक़त “सियासी ताक़त” से ही तस्लीम की जाती है। पिछले कुछ वक़्त से हमारे मज़हबी मुआमलात में दख़ल अंदाज़ी का एक बड़ा सबब हमारी सियासी कमज़ोरी भी बनी है। अगर आप इस मुल्क में इज़्ज़त के साथ जीना चाहते हैं, आज़ादी के साथ अपने मज़हब पर अमल करना चाहते हैं तो ख़ूब याद रखें इज़्ज़त की ज़िंदगी और मज़हब की आज़ादी के लिए आपको अपनी सियासी ताकत भी बढ़ाना पड़ेगी। सियासी ताकत के बग़ैर कोई आपकी आवाज़ नहीं सुनेगा। इस लिए उलमा व मशाइख़, क़ौम के दानिशवर और समाज के हर तबक़े को अपनी सियासी ताकत को मुत्तहिद और यकजा करना ही पड़ेगा तभी हमारी इज़्ज़त और मज़हबी आज़ादी बाक़ी रहेगी।
मुत्तहिद होगे तो कहलाओगे मोमिन, ग़ाज़ी
मुंतशिर होगे तो क़िस्तों में सफ़ाया होगा।

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