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राघवेंद्र दुबे

संघ शिक्षा वर्ग (आफिसर ट्रेनिंग कोर्स) से प्रशिक्षण लेकर पूर्णकालिक प्रचारक होकर निकलने वाले स्वयंसेवकों को संबोधित करने पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी 7 जून को संघ मुख्यालय नागपुर जाएंगे । राष्ट्रपति होने से पहले संप्रग सरकार में वित्त और रक्षा मंत्री रह चुके प्रणव मुखर्जी का संघ मुख्यालय का आमंत्रण स्वीकार कर लेने  को लेकर कई अटकलें हैं । यह संघ के माथे मोरपंख की तरह है, उसका आत्मगौरव और इतिहास के अब तक के सबसे शक्तिशाली समय में अपने चेहरे की रंग- रोगन की कोशिश भी ।

यानी संघ को अभी भी सामाजिक मान्यता की जरूरत है । प्रचंड बहुमत की नरेंद्र मोदी सरकार के होते हुए भी । और यह सब तब ,जब कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगातार हमलावर हैं और भारी दुष्प्रचार और छवि हनन के जरिये उन्हें अपरिपक्व और नासमझ साबित करने का अभियान भी अबतक जारी है ।

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कहीं झूठ कहीं साजिश से भी सामाजिक मान्यता हासिल करने के लिए देश के बड़े नेताओं के उपयोग का संघ का पुराना इतिहास है । 1934 में जबकि संघ की स्थापना के अभी 9 साल ही बीते थे, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने कांग्रेस जनों के लिए हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग और राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ का सदस्य होने की कड़ी मनाही कर दी थी । उसी साल महात्मा गांधी को वर्धा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कैंप देखने का आमंत्रण मिला । गांधी जी के वहां जाने के अगले दिन हेडगेवार उनसे मिलने आये । उसके बाद यह प्रचार कर दिया गया कि वर्धा में संघ का कैंप देखने की इच्छा खुद गांधी जी ने ही व्यक्त की थी । यह भी कि गांधी जी ने इस संगठन की बहुत तारीफ की । जबकि संघ के बारे में गांधी जी की क्या राय थी, इसका बहुत स्पष्ट उल्लेख प्यारेलाल ने  ‘ महात्मा गांधी : द लास्ट फेज ‘ में किया है —

‘….गांधी जी की टोली के एक आदमी ने उन्हें टोक कर कहा कि संघ के लोगों ने शरणार्थी कैम्प में बहुत अच्छा काम किया है। उन्होंने अनुशासन, साहस और कठिन श्रम का परिचय दिया है । गांधी जी ने उत्तर दिया था -लेकिन भूलो मत कि हिटलर के नाजी और मुसोलिनी के फासिस्ट भी ऐसे ही थे। उन्होनें संघ को निरंकुश दृष्टि वाला साम्प्रदायिक संगठन कहा। ‘

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‘….संघ में यह व्यवस्थित कानाफूसी चलती रहती थी और इसे मैं भी जानता था कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस इस संगठन के प्रशंसक थे । एक बार ट्रेन से नागपुर होकर वर्धा जाते हुए , उन्होंने खिड़की से संघ की शाखा-परेड देखी और जिज्ञासा प्रकट की। संघ ने यह फैला दिया कि उन्होंने संगठन की प्रशंसा की, कहा देश को ऐसे संगठन की जरूरत है ..।’

( राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : देशराज गोयल की पुस्तक में उद्धृत जी.एम हुद्दर का 7 अक्टूबर 1979 को इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रकाशित लेख – आर.एस.एस एंड नेताजी )

संघ, लोकनायक जय प्रकाश नारायण और प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई के पीछे भी किस तरह खड़ा हुआ यह फिर कभी । फिलहाल 2 मार्च 1979 को लोकनायक का प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई को लिखा पत्र देखें —

‘ ….मुझे आर .एस. एस के जनता पार्टी से संबंद्ध होने पर कोई आपत्ति नहीं किंतु उसे अपना रूप बदलना पड़ेगा और पूर्णतःधर्म निरपेक्ष होना होगा। अगर वह ऐसा नहीं करता तो उसे राजनीति से अलग हो जाना चाहिए और जनता पार्टी के प्रत्येक घटक से अपना सम्बन्ध तोड़ लेना चाहिए। फिर भी प्रधानमंत्री होने की हैसियत से आपका कर्तव्य है कि आप संघ को सुधारने की कोशिश करें। सभी विचारवान व्यक्तियों को चाहिए कि वे भारतीय राष्ट्र और राज्य के धर्म निरपेक्ष आधार को नष्ट करने वाली इसकी कोशिश को नाकाम करें …’

(साप्ताहिक दिनमान अप्रैल 8-14, 1979 )

अगर आज संघ को पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की जरूरत पड़ गयी है तो यह सोचना लाजिमी है कि आखिर संघ और क्या चाहता है । जब प्रचंड बहुमत की केंद्र सरकार उसके साथ है । उसे क्या और पाना बाकी रह गया है। मुझे पूर्व राष्ट्रपति की लोकतांत्रिक और सेक्यूलर आस्था में रत्ती भर शक नहीं है।आज शाम ही एक स्वयंसेवक मित्र जो वकील भी हैं, उन्होंने फोन करके कहा – 7 जून को हम बड़ा धमाका करने जा रहे हैं । यानी संघ ने या तो फिर अपने लिए तमगे का इंतजाम कर लिया या फिर नेहरू– इंदिरा के खिलाफ कोई मुहिम । प्रणव दादा बेशक विद्वान राजनेता और कुशल प्रशासक रहे हैं, इसलिये 7 जून का इंतजार रहेगा ।

(राघवेंद्र दुबे उर्फ भाऊ वरिष्ठ पत्रकार हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में दशकों तक काम करने के बाद अब स्वतंत्र रूप से लेखन कर रहे हैं। यह टिप्पणी उनकी फ़ेसबुक पोस्ट का एक अंश है। साभार प्रकाशित। )

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