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प्रिय भाइयों और उनकी बहनों मैं सेक्युलरिज़्म का विरोधी नहीं हूँ । मैं सेकुलरिज्म का हामी हूँ क्यूँ कि कुरान में लिखा है “लकुम दीनुकुम वालियादीन” (तुम्हारा दीन तुम्हारे लिए मेरा दीन मेरे लिए) और मेरा उस पर पूरा ईमान है । मैं भी सेकुलरिज्म का अर्थ यही समझता हूँ कि तुम्हारा दीन तुम्हारे लिए मेरा दीन मेरे लिए । न मैं किसी के मजहब को गाली देता हूँ और अपने मजहब के लिए सुन भी नहीं सकता हूँ । मेरे सेकुलरिज्म के दायरे में अल्लाह के नबी का वह कौल भी आता है कि “जिसका पड़ोसी भूखा सो जाए वह मुसलमान नहीं है” पड़ोसी का अर्थ मुसलमान नहीं होता पड़ोसी का मतलब सिर्फ पड़ोसी होता है । पड़ोसी हिंदू भी हो सकता है इसाई भी हो सकता है यहूदी भी हो सकता है या काफिर भी हो सकता है मेरे नबी का फरमान है अगर तुम खाना खा रहे हो तो तुम्हारा पड़ोसी भूखा नहीं सोना चाहिए अगर वह भूखा है तो तुम्हें भी नींद नहीं आनी चाहिए ।

अल्लाह का हुक्म भलाई के लिए है अल्लाह का हुक्म सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं है इंसानियत के लिए जिसके दायरे में चरिंद परिंद भी आते हैं । फिर मैं मुसलमान होकर कम्युनल कैसे हो सकता हूँ सिर्फ मुसलमानों की बात कैसे कर सकता हूँ । मेरा मानना है सिर्फ मुसलमानों के हक की बात करना इस्लाम नहीं है । सिर्फ मुसलमानों के लिए दुआ करना इस्लाम नहीं है । सिर्फ मुस्लिम ब्रदरहुड की बात करना इस्लाम नहीं है । मेरा मानना है सारी इंसानियत की बात करना इंसानों के हुक़ूक़ की बात करना इस्लाम है । मेरा मानना है जो इंसान सेकुलर नहीं है वह मुसलमान हो ही नहीं सकता फिर ऐसे में मैं कम्युनल कैसे हो सकता हूँ । अगर आप ऐसा समझते हैं तो शायद मैं अपनी बातें आज तक आप लोगों को समझाने में नाकाम रहा हूँ या आप लोग मुझे समझने में नाकाम रहे हैं या ऐसा भी हो सकता है कि हमारे बीच कोई कम्युनिकेशन गैप रहा हो जिसने एक दूसरे को समझने में मुश्किलें पैदा की

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हाँ मुझ में बहुत तल्खी है मेरी जुबान बहुत कड़वी है मैं हमेशा सेकुलरिज्म से सवाल करता हूँ । आपको जानना होगा इसके पीछे वजह क्या है …… आखिर सवाल करने के लिए मैं भारतीय जनता पार्टी, आरएसएस के पास तो नहीं जाऊंगा, सवाल करने में कम्युनल बजरंग दल विहिप के पास तो नहीं जाऊंगा । क्योंकि उन से उम्मीदें नहीं हैं । मेरी उम्मीदें सेकुलरिज्म से हैं मेरी आस्था सेकुलरिज्म में है तो मैं सवाल भी सेक्युलरिज्म से ही पूछूंगा इसका मुझे हक है । मेरी कड़वाहट का मतलब मेरा कम्युनल होना नहीं है मेरी कड़वाहट का मतलब है भारत में सेकुलरिज्म का फेल होना मेरी कड़वाहट का मतलब है भारतीय सेकुलरों का शातिर और अवसरवादी होना मेरी तल्ख़ी का कारण सेकुलरिज्म नहीं बल्कि सेकुलरिज्म की खाल में छुपे कम्युनल भेड़िये हैं ।

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सेकुलरिज्म पर सवाल खड़े करना सेकुलरिज्म का हिसाब मांगना अपराध नहीं है यह हमारा आपका कर्तव्य है लोकतंत्र के लिए आवश्यक है । सेकुलरिज्म के खिलाफ मेरी तल्खी अकारण नहीं है पिछले 70 सालों में लोकतंत्र के सेकुलर पुरोधाओं ने देश की बहुसंख्यक आबादी को कम्युनल बना दिया । इन्हीं तथाकथित सेकुलरों अल्पसंख्यकों को बिना कुछ किए अपराधी बना दिया तो मैं आंख मूंद कर किसी पर विश्वास कैसे कर लूँ ? मैं सेकुलरिज्म के ठेकेदारों से सवाल क्यों ना करूं ? आखिर हम पिछले 70 सालों से सेकुलरिज्म के नाम पर कभी कांग्रेस को कभी सपा को कभी बसपा को कभी किसी को कभी किसी को बाल पाल-पोस रहे हैं मगर नतीज़ा ढाक के वही तीन पात हैं । मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर हो गई मुसलमान दोयम दर्जे का नागरिक बन गया मुसलमान मुख्यधारा से पूरी तरह कट चुका है दलितों को आरक्षण का लाभ मिला ज़रूर है मगर उनके भी हालात पिछले 70 सालों में बदले नहीं है । न्यायपालिका हो कार्यपालिका हो विधायिका हो या पत्रकारिता हो हर जगह कथित सेकुलरों का बोल बाला है उसके बावजूद कहीं किसी को आतंकवादी बना कर जेल में डाल दिया जाता है तो कभी किसी को फर्जी एनकाउंटर में मार दिया जाता है और अब मॉब लिंचिंग का एक नया तरीका भी ईजाद किया गया है ।

अगर हमने अपनी जाति अपने धर्म का नेता नहीं चुना है अगर हमने पिछले 70 सालों में सेकुलरिज्म की हिमायत की है तो हमारा फर्ज बनता है कि हम उनसे हिसाब भी पूछे हम उनसे पूछे कि एक आतंकवादी संगठन आज सत्ता के शिखर पर कैसे पहुंच गया ? हम उनसे पूछें उस आतंकवादी संगठन से जुड़े लोग सेना में उच्च पदों तक कैसे पहुंच गए ? हम उनसे पूछें कि जुडिशरी में उस आतंकवादी संगठन के लोग किसकी शह पर पहुंचे ? अगर देश में सेकुलरिज्म था, अगर सेकुलर संविधान का पालन पूर्णतः हो रहा था तो देश कम्युनल कैसे हो गया ? जब तक हम किसी की जवाबदेही नहीं तय करेंगे तब तक सेकुलरिज्म की आड़ में हमारे साथ इसी तरह छल-कपट होता रहेगा । अगर हम सेकुलरिज्म के नाम पर ऐसे ही हर किसी ऐरे गैरे को लोकसभा, विधानसभा में पहुंचाते रहेंगे तो हमारा हाल इसी तरह बद से बदतर होता रहेगा । सेकुलरिज्म पर सवाल खड़े कीजिए आप ने जिसे सेकुलर जानकर के चुना है नेता बनाया है उससे सवाल पूछिए वरना सेकुलरिज्म निरंकुश हो जाएगा वरना जैसे केजरीवाल ने कहा मुसलमानों का क्या है वह कहां जाएंगे केजरीवाल की बात सार्वजनिक हो गई मगर यह सच है कि हर पार्टी यही सोचती है हर नेता यही सोचता है जानता है कि मुसलमान भाजपा के डर से और सेकुलरिज्म के नाम पर वोट उन्हीं को देगा उन्हीं के पास आएगा

हाँ यह सच है आज मैं हर किसी को शक की निगाह से देखता हूँ आज मुझे जल्दी किसी पर विश्वास नहीं होता । मगर इसका मतलब यह नहीं है कि मैं ईमान से फिर गया हूँ मुझे सेकुलरिज्म पर विश्वास नहीं है । बिल्कुल है । मगर मेरे शक के पीछे कथित सेकुलर लोगों का चाल चलन और चरित्र है पिछले 70 सालों का इतिहास है । सेकुलरिज्म किसी पार्टी का नाम नहीं है सेकुलरिज्म किसी नेता की बपौती नहीं है सेकुलरिज्म एक विचारधारा है इसलिए हमें परखना होगा कि कौन है जो सेकुलरिज्म पर खरा उतर रहा है कौन है जो हमें सेकुलरिज्म के नाम पर ठग रहा है हमें उन ठगों से शिकायत है हमें उन ठगों से हिसाब मांगना होगा । हमें पहचाना होगा हमारे आपके बीच कितने मदन तिवारी, कितने सुमंत भट्टाचार्य हैं, कितने नितिन ठाकुर, कितने शुक्षित कपूर हैं जो सेकुलर बने बैठे हैं ।

जब भी चुनाव आता है हम संघियों से डर जाते हैं जिन्हें चुनकर भेजा होता है उनसे हिसाब नहीं पूछते उनसे सवाल नहीं करते सेकुलरिज्म के नाम पर और संघियों से डरकर उन्हीं को दुबारा चुन लेते हैं, उन्हीं को सिरमाथे चढ़ा लेते हैं उन्हीं की चाटुकारिता करने लगते हैं । और फिर अंजाम यह होता है कि जो काम खुलेआम कम्युनलिज्म के नाम पर होना होता है वह सेक्युलरिज़्म की आड़ में होता है वह सेकुलरिज्म की छांव में होता है और हमारा आपका चुना हुआ नेता खुशी खुशी तुष्टीकरण का आरोप स्वीकार करके गदगद हो जाता है मगर हमें आपको मिलता क्या है ???

अबरार खान की कलम से उनके निजी विचार….

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