chandan

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सवाल सिर्फ़ चंदन के मौत का नहीं है, चंदन की जिसने भी हत्या की है उसको सज़ा मिलनी चाहिए पर…….

असल सवाल उस गंदी ज़हनियत से है जो आज़ादी के सत्तर साल बीत जाने के बाद भी अल्पसंख्यक समुदाय को देशद्रोही कहती आ रही है जबकि सच्चाई यही है कि अगर देश का अल्पसंख्यक समुदाय देशभक्त एवं सच्चा भारतीय नहीं है तो फिर देश का कोई भी समुदाय देशभक्त नहीं है। मुस्लिम बाक़ी के समुदाय से दोगुना देशभक्त हैं, दूसरे सभी समुदाय बाई-डिफ़ॉल्ट भारतीय हैं तो मुस्लिम बाई-च्वाइस भारतीय हैं।

अब असल सवाल उन दंगाईयों से है जो तिरंगा यात्रा का नाम देकर भगवा यात्रा निकालते हैं, क्या इस देश का बहुसंख्यक समाज इस बात पर शर्मिंदा महसूस करेगा कि कुछ गुंडे “मुल्लों का दो स्थान… पाकिस्तान या क़ब्रिस्तान” “हिंदुस्तान में रहना है तो फ़लाँ-फ़लाँ कहना है” का नारा लगाकर एक समुदाय को बरसों से आतंकित करते आए हैं। क्या देश का बहुसंख्यक वर्ग इस दर्द को कभी बर्दाश्त कर सकेगा जो बरसों से अल्पसंख्यक समुदाय सुनते आ रही है?

कासगंज में क्या हुआ और क्या नहीं हुआ… ये सब जाँच परिणाम आने के बाद पता चलेगा पर एक चीज़ साफ़ दिख रही है वो ये जो कुछ हुआ है वैसा हमेशा से होता आया है, पर अब स्ट्रैटेजी में थोड़ा बदलाव आया है।

अब दंगों की फ़सल राष्ट्रवाद के नाम पर खड़ी की जाती है। नाम तिरंगा यात्रा का देकर भगवा यात्रा निकाला जाता है, अल्पसंख्यकों के बीच जाकर उनकी राष्ट्रीयता को गाली दी जाती है। वे अगर तिरंगा फहरा कर गणतंत्र का जश्न मनाते हैं तो वहाँ संघी ब्रिगेड जाकर उनसे भगवा झंडा फहराने की बात करते हैं। उनके साथ गाली-गलौज, मार-पीट किया जाता है ताकि ये लोग भी उग्र हों। फिर पूरे शहर में अल्पसंख्यकों के दुकान-मकान उनकी धार्मिक स्थान सब को आग लगाके ख़त्म किया जा सके, और फिर इससे सियासत अपनी राजनीति की दुकान चला सके।

कासगंज में जले हुये दुकान-मकान-इबादतगाहों का नेमप्लेट देखिए, उनके नाम का पता कीजिए और पता कीजिए कि ये सब व्यवसाय किसका था? ये भी पता कीजिए कि ऐसे माहौल में प्रशासन का क्या रोल रहा है?

कुछ भी नया नहीं है… आप जयपुर से लेकर मेरठ, मुरादाबाद, असम, अलीगढ़, भागलपुर, गुजरात से लेकर मुज़फ़्फ़रनगर तक का तारीख़ देख लीजिए। सब में समानता मिल जाएगी। इनका मक़सद एक ही है, अल्पसंख्यकों का रोज़गार-व्यवसाय सब कुछ ख़त्म कर देना।

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लेखाक: प्रोफ़ेसर माजिद मजाज

कल से ही दुखी मन से बशीर बद्र साहब का शेर ज़हन में चल रहा है,

“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में 
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में….”

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