Tuesday, August 3, 2021

 

 

 

पुण्य प्रसून बाजपेयी: 2019 में इंतजार पंचतंत्र के बच्चे का है, जो कहेगा राजा……..?

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क्या मीडिया किसी देश को चला सकता है । क्या सूचना तंत्र के आसरे किसी देश को विकसित किया जा सकता है । क्या तकनालाजी का विस्तार देश का विस्तार होता है । क्या विकास का मतलब किसी देश में मुनाफा बनाने का माडल हो सकता है । क्य़ा प्रकृति से खिलावाड आधुनिक होने की छूट दे देती है । क्या ताकत दिखाना ही सत्ता का प्रतिक है । या फिर सत्ता का मतलब ही विशेषाधिकार पा कर समूचे देश को निजी जागीर मान लेना है । और 21 वी सदी के भारत में समूची होड ही इसे पाने या समेटने की हो चली है । यह सारे सवाल आने वाले वक्त में भारत की चौखट पर दस्तक देगें और कुछ तो दे रहे है , इंकार इससे किया नहीं जा सकता है । सिलसिला कही से भी शुरु हो सकता है ।

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भं । मीडिया हाथ में होगी तो सच किसी तक पहुंचेगा ही नही । सत्ता ये सोच सकती है और इसे हकीकत का जामा पहुंचा सकती है । मौजूदा वक्त इसे अपने में समेट चुका है । सवाल सिर्फ जस्टिस लोया या पत्रकार गौरी लंकेश या फिर सामाजिक कार्यकत्ता दाभोलकर की हत्या के बाद एक अनंत खामोशी भ का नहीं है । बल्कि रोज ब रोज दो चार होती जिन्दगी के सामने जो सवाल सरकार की नीतियो के आसरे उभरते है उसका सच भी कैसे छुपा लिया जाता है या फिर बताया ही नहीं जाता । ये सवाल सत्ता के सिंकदर को हमेशा अच्छा लगता है कि उसकी नीतियां शानदार है । चमकदार है ।मावनवीय है । लेकिन जमीनी सच अगर इसके उलट है तो फिर सरकारी नीतियो की खाल कौन उघाडेगा । या फिर सच है क्या इसे कौन बतायेगा और कौन जानेगा । अगर मीडिया-तकनालाजी का हर चेहरा खामोशी बरतेगा या राजा को खुश करने के लिये नीतियो की बढाई ही करेगा तो होगा क्य़ा या फिर हो क्या रहा है । दरअसल जनधन खुला । और जनधन के तहत बैक दर बैक खाता खुलवाने वाले आज करोडो की तादाद में होकर भी अकेले है । क्योकि जनधन के प्रचारित-प्रसारित आंकडे लोक लुभावन तो है लेकिन उसके भीतर के सच को कोई बताने-दिखाने की स्थिति में नहीं है । या फिर बताने की हिम्मत ही नहीं दिखाता कि जनधन का खाता खोल कर बैठे करोडो लोगो या परिवार दो जून की रोटी के लिये कैसे तरसते है । और बैक कैसे सिर्फ कागजो के आसरे आंकडो को बढाते है । अठन्नी भी किसी की जेब या हथेली तक पहुंच नहीं पायी है । पर कहे कौन ।

पन्नो को एक एक कर पलटे । और सोचे 2014 में दो करोड रोजगार हर बरस देने का वायदा किने किया था । और वादा जब लापता है तो फिर लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ वादा तो दूर बेरोजगारी तले आक्रोष की भट्टी पर बैठे देश के भीतर के मवाद को सामने लाने से कतरा क्यो रहे है । कौन कहेगा कि कि 18 बरस की उम्र लोट देने के काबिल बना देती है । लेकिन 18 बरस होते ही जिन्दगी जिन हालातो से रुबरु करा रही है उससे बेफिक्र सत्तानंशी युवा भारत  को एक ऐसे अंधेरे में धकेल रहे है जहा का एकाकीपन करोडो युवाओ को अकेला कर मौत की तरफ घकेल रहा है । एमसीआपबी के आंकडे ही बताते है कि देश में जितने किसान खुदकुशी करते है उससे दोगुना युवा-छात्र-बेरोजगार खुदकुशी करते है । पर कहेगा कौन ।

2015 में सर्जिकल स्ट्रइक के जरीये देशभक्ति और राष्ट्रवाद की अनोखी लकीर भी खिंची गई । लेकिन 2015 के बाद जवानो के शहीद होने का सिलसिला पुराने तमाम आंकडो को पार क्यो कर गया । और ये अब भी जारी क्यो है । पाकिस्तान तो दूर की गोटी है आंतक को मुंह को पकडने की बात भी दूर की कौडी हो गई । उल्टे कश्मीर की वादियो को ही आंतक का पनाहगार बनाने के दिशा में बढ गये । पर कहेगा कौन कि ना कश्मीरी पंडितो को घर मिला ना कश्मीरी मुस्लिमो को सुकुन मिला । उल्टे दिल्ली की सियासत ने जम्मू और कश्मीर में बिखरे हिन्दु-मुस्लिम कश्मीरियो को पाठ पढा दिया कि सियासत से ज्यादा खतरनाक कुछ भी नहीं । चाहे वह लोकतंत्र का राग गाते रहे । पर कहेगा कौन ।

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2016 में नोटबंदी तले एलान जो भी हुये हो । लेकिन हर दिन लाइन में लगे मौत का आंकडा जब सौ पार कर ग्या तो चौराहे का जिक्र हुआ । लेकिन तब पचास दिन मांगे गये थे अब तो हजार दिन होने को आ रहे है लेकिन मौत के बाद तिल तिल मरते ग्रमीण भारत के किसान मजदूर और असंगठित क्षेत्र में नोटबंदी के बाद सबकुछ गंवाने वाले 35 करोड भारतीयो के पेटे के घाव के लिये कोई मलहम तो दूर सिर्फ कहने की हिम्मत भी मीडिया क्यो नहीं जुटा पाता है । और लाल दिवारो में कैद राजा ठहाके लगाकर बार बार ये कहने से नहीं कतराता कि नोटबंदी ने मौत नहीं जिन्दगी दी है । पर कहे कौन और मिटी की दिवारो या खपरैल की छतो के भीतर जाकर झाके कौन और जो दिखायी दे उसे बताये कौन कि हर सरकारी निर्ाणय के बाद भारत और घायल क्यो हो रहा है ।

2017 में जीएसटी तो दूसरी आजादी का प्रतिक बना दिया गया था । पर आजादी किससे मिली ये क्या किसी घंघेवाले या धंधे से जुडे मजदूर या हुनुरमंद कारीगरो से जाकर किसी ने पूछा । नौ करोड खुदरा व्यापारी मुनाफा कमा रहे था जीएसटी ने मुनाफे की लूट खत्म कर दी । लाल दिवारो के भीतर मैसेज तो यही दिया गया । ठीक वौसे ही जैसे नोटबंदी के वक्त मैसेज था , रईस फंस गये और रईसो के फंसने पर गरीब खुश हो गया । कमाल की सोच है । और इस कमाल को राजा खुले तौर पर मंच दर मंच से नाटकीय अंदाज में कहने से नहीं चुकता । यानी सही होने का भरोसा किस तरह लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ ने जगा कर रखा है, और अपनी ही बनायी दुनिया के अपने ही मीडिया को भरोसा जगाने वाला मान कर राजा भी भरोसे से सराबोर हो चला है ये भी खुल्लम खुल्ला है । पर कहे कौन कि जीएसटी ने सिसटम को और ज्यादा भ्रष्टर बना दिया । टैक्स और एक्साइज की वसूली वाले नये थानेदार है । और व्यापारियो की बंद होती दुकानो के बीच बाबूओ की दुकान चल पडी है । पर कहे कौन ।

वाकई कौन कह सकता है कि नाम बदलने से कुछ नहीं होता । पर 2018 का चलन तो नाम बदलने का ऐसा चल पडा कि बदलते नाम के जरीये इतिहास के पन्नो को टटोलने का काम लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ करता रहा । लेकिन ये कहने बताने की हिम्मत किसी में नहीं रही तकि नाम बदलने के एलान के बाद सरकारी दस्तावेजो से लेकर सार्वजनिक जगहो पर भी बदले हुये नाम की पट्टी लगाने का जो खर्च और वक्त व्यर्थ होता है उससे पीठ औप पेट होते शहरो को दो जून की रोटी देकर सिसटम ठीक करने की दिशा में बढा जा सकता है । सवाल ये नहीं है कि गव्रनेंस गायब है सवाल है कि गवर्नेंस बगैर गेरुआधारी होकर सत्ता चलाने का सुकुन राम राज्य की कल्पना में ले जा सकता है , इसका खुला इजहार हो रहा है । पर कहे कौन ।

इस फेरहिस्त तले सत्ता के सांसद हो या मंत्री । संवैधानिक संस्थान हो या स्वयत्त संस्था । या फिर देश का सबसे पडा सत्ताधारी परिवार यानी संघ परिवार ही क्यों ना हो , सभी मीडिया, टेकनालाजी, सूचना तंत्र की आगोश में इस तरह आ चुके है कि सभी तो कुद को कुछ समझते नहीं या फिर राजा के तंत्र के आगे ,सबी नतमस्तक होकर सत्ता सुख को ही जिन्दगी का आखरी सच मान चुके है । यानी सवाल यह नहीं है कि राजा के सामने बोले कौन । सवाल तो यह भी है कि तंत्र की जो घुट्टी लगातार परोसी जा रही है उसमें नैतिक बल गायब हो चला है । इमानदारी बेमानी सी लगने लगी है । अपने पैरो पर खडा कर कुछ कह पाने की हिम्मत के लिये राजा के पांव ही देखे जा रहे है । तो संभले कौन और संभाले कौन । जब देश में नीतियो का बोलबाला हो । मन की बात संविधान हो । पंसदीदा को इंटरव्यू देना लोकतंत्र का जीना हो । और खुद ही सवाल बताकर कुद ही जवाब देने का प्रचलन आजादी का प्रतिक हो तो क्लपना किजिये 2019 में इंतजार चुनाव का करें या इंतजार लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की हकीकत बयानी का करें या इंतजार उस बच्चे का करें ,जो राजा के सामने खडा हो भोलेपन में पंचतंत्र की कहानी की तर्ज पर कह दें , राजा तो नंगा है ।

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