Saturday, November 27, 2021

पुण्य प्रसून बाजपेयी: ‘ना सिल्वर स्क्रीन पर नायक ना राजनीति में स्टेट्समैन’

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जब आधी दुनिया सो रही थी, तब नेहरु आजाद भारत के सपनो को हकीकत की जमी दे रहे थे । आजाद भारत के पहले नायक नेहरु थे । पर दूसरी तरफ महात्मा गांधी आजादी के जश्न से दूर कोलकत्ता के बेलियाघाट के अंधेरे कमरे में बैठे थे । पर नेहरु की सत्ता के चमक भी महात्मा गांधी के सामने फीकी थी । इसीलिये महात्मा गांधी महानायक थे। और आजाद भारत में नायकत्व का ये कल्ट सिनेमाई पर्दे पर मिर्जा गालिब से शुरु तो हुआ । पर गांधी ना रहे तो फिर सिनेमाई पर्दे पर ही गालिब की भी मौत हो गई। और सिल्वर स्क्रीन  कैसे नेहरु दौर में समाता चला गया इसका एहसास सबसे पहले राजकपूर ने ही कराया । और अपने नायकत्व को आवारा के जरीये गढा । “आवारा” कुलीनता के फार्मूले में कैद उस घारणा को तोडती है कि अच्छा आदमी बनाया नहीं जा सकता। वह पैदा होता है । और इसे गीत में राजकपूर पिरोते भी है । “बादल की तरह आवारा थे हम / हंसते भी रहे रोते भी रहे …” और नेहरु के नायकत्व से टकराता राजकपूर का नायकत्व सिल्वर स्क्रीन पर नेहरु के सोशलिज्म को  चोचलिज्म कहने भी भी कतराता और सामाजवादी राष्ट्रवाद को नये तरीके सेगढता भी है। “ मेरा जूता है जापानी, पतलून इंग्लिशस्तानी, सर पर लाल टोपी रुसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी “ । तो सियासत में नेहरु और सिल्वर स्क्रीन पर राजकपूर के नायकत्व को कोई चुनौती नहीं थी । पर इस दौर में नायकत्व के सामानांतर लकीर खींचने के लिये खांटी समाजवादी राम मनमोहर लोहिया राजनीति के मैदान में थे । जो आजादी के 10 बरस बाद ही  सत्ता की रईसी और जनता की दरिद्रगी पर संसद में बहस करने के लिये तीन आना बनाम 16 आना की चुनौती नेहरु को ही दे रहे थे । तो सिल्वर स्क्रीन पर राजकपूर के नायकत्व को चुनौती देने के लिये दिलीप कुमार थे । और इस चेहरे का दूसरा रुप नेहरु की ही थ्योरी को सिल्वर स्क्रीन पर उतारने के लिये फिल्म नया दौर आई । मानव श्रम को चुनौती देती टेकनालाजी । पर ये दौर तो ऐसा था कि देश समाज और सिल्वर स्क्रीन भी नये नये नायको को खोज रहा था । 62 के युद्द ने नेहरु के औरे को खत्म कर दिया तो उससे पहले ही आजाद भारत में आधी रात को देखे गये नेहरु के सपनो के हिन्दुस्तान को गुरुदत्त ने सिल्वर स्क्रिन पर निराशा से देखा । और ये कहने से नहीं चूके ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ….. ।

पर निराशा के इस दौर से लाल बहादुर शास्त्री ने “जय जवान जय किसान “ जरीये उभारा । इस नारे ने शास्त्री के ननायकत्व को राजनीति में कुछ इस तरह गढा कि समूचा देश ही राष्ट्रवाद की उस परिभाषा में समा गया जहा इंडिया फर्स्ट था । और सिल्वर स्क्रीन पर मनोज कुमार ने नायकत्व के इस धागे को बाखूबी पकडा । नायकत्व की परिभाषा बदल रही थी । पर हमारे पास नायक थे । शास्त्री के बाद इंदिरा गांधी की छवि तो दुनिया के नायको के कद से भी बड़ी हो गई । 1971 के युद्द ने इंदिरा को जिस रुप में गढा वह दुर्गा का भी था । और अमेरिका जैसे ताकतवर देश के सातवे बेडे को चुनौती देते हुये ताकतवर राष्ट्रध्यक्ष का भी था । पर 71 के बाद इंदिरा का नायकत्व फेल होता दिखा क्योकि करप्शन और सत्ता की चापलूसी के लिये बना दिये गये वैधानिक संस्थानो के विरोध में एक नये नायक जेपी का जन्म हुआ । जेपी सत्ता से टकराते थे । और इमरजेन्सी में भी 72 बरस के बूढे को लेकर धर्मवीर भारती ने जब “ मुनादी “ कविता लिखी तो ईमानदार संघर्ष की इस तस्वीर को सिल्वर स्क्रीन पर सलीम-जावेद की जोडी ने अमिताभ बच्चन को गढ़ा । सिल्वर स्क्रीन पर अमिताभ एक ऐसा नायक बना जो अपने बूते संघर्ष करता । न्याय दिलाने के लिये किसी हद तक जाता । और देखने वालो की शिराओ में दौ़डने लगता । और राजनीतिक हालात से पैदा होती सामाजिक – आर्थिक त्रासदियों को भोगती जनता को लगता वह खुद ही इंसाफ कर सकती है । क्योकि भ्रम तो कालेज छोड़ जेपी के पीछे निकले युवाओं का भी टूटा । और झटके में नायकत्व को जीने वाले देवआंनद से लेकर राजेश खन्ना युवाओ के जहन से गायब
हो गये ।

पर इसके बाद कि सामाजिक-राजनीतिक निराशा ने नायको की लोकप्रियता खत्म की । असर ये हुआ कि एक तरफ भारतीय राजनीति में गठबंधन की सरकारो को सत्ता दिलायी  तो सिल्वर स्क्रीन पर भी मल्टी स्टार यानी जोडी नायकों का खेल हो गया । याद कीजिये शोले , दोस्ताना ,काला पत्थर । और शायद यही वह दौर था जब राजनीति में क्षत्रपों का उदय हुआ तो दूसरी तरफ नायकी मिजाज सिल्वर स्क्रीन पर भी बदलता नजर आया । तो एक तरफ सिल्वर स्क्रीन के नायक सलमान/आमिर/शाहरुख/अजय देवगन/अक्षय कुमार /रितिक है तो दूसरी तरफ राजनीतिक मैदान में लालू /मायावती/मुलायम / नीतिश / चन्द्रबाबू /ममता नायक के तौर पर उभरे । ये वो चेहरे है जो अपने अपने वक्त के नायक रहे हैं । फिल्मी नायको की इस कतार ने अगर तीन पीढी की नायिकाओं के साथ काम लिया है।

वरिष्ट पत्रकार, पुण्य प्रसून बाजपेयी

तो राजनीति के मैदान में बीते तीन दशक से ये चेहरे अपने अपनी बिसात पर नायक रहे हैं । इन नायकों में आपसी प्रतिस्पर्धा भी खूब रही है । सलमान-आमिर और शाहरुख की प्रतिस्पर्धा कौन भूल सकता है । और राजनीति में मुलायम मायावती , लालू नीतिश की प्रतिस्पर्धा कौन भूला सकता है । फिर अजय देवगन और अक्षय कुमार का कैनवास उतना व्यापक नहीं है । एक्शन को केन्द्र में रखकर संवाद कौशल से ही इन दोनो ने जगह बनायी । ठीक इसी तरह ,ममता बनर्जी और चन्द्रबाबू नायडू का भी कैनवास व्यापक नहीं रहा । दोनों ने अपनी राजनीतिक जमीन केन्द्र से टकराते हुये  क्षत्रपों के तौर पर गढी । एक लिहाज से नायको की कतार यही आकर थम जाती है । क्योकि इन चेहरो के आसरे सिनेमाघर में हाउस फूल होता रहा । और राजनीति के नायक क्षत्रपो के सामने राष्ट्रीय राजनीतिक दल काग्रेस या बीजेपी भी टिक नहीं पाये । पर ये नायकों का आखिरी दौर था । क्योकि इसके बाद की कतार में आकार्षण है पर नायक नहीं । मसलन , सिल्वर स्क्रिन पर  रणवीर कपूर /रणबीर सिंह / वरुण धवन /टाइगर श्राफ है तो राजनीतिक मैदान में अखिलेश यादव/तेजस्वी यादव /केजरीवाल/उद्दव ठाकरे / उमर अब्दुल्ला है । पर नायक नहीं है । तो क्या मौजूदा दौर में नायक गायब है । आकर्षण है । पर इनमें नायकत्व नहीं है जिसके आसरे कोई फिल्म हाउस फुल देदें । या फिर जिस नेता के आसरे देश में विकल्प नजर आने लगे । क्योकि इन तमाम चेहरो को देखिये और इनकी फिल्मो को याद किजिये तो सभी अचानक तेजी से चमके फिर गिरावट आ गई । आज फिर सभी संघर्ष के रास्ते पर है । यानी संघर्ष के आसरे सिल्वर स्क्रिन पर रणवीर कपूर या रणवीर सिंह या वरुण धवन सफल दिखायी दे सकते है । लेकिन सितारा आकर्षण इनके साथ अभी भी जुडा नहीं है। और यही हालत नये नेताओं की है । ये भी सफल होते है जैसे केजरीवाल तेजी से निकले पर नायक के तौर पर नहीं बल्कि संघर्ष करते हुये ठीक वैसे ही  जैसे फिल्मों के लिये अच्छी कहानी , सधा हुआ निर्देशन चाहिये । वैसे ही इन नेताओं को भी राजनीति गढने के लिये मुद्दा चाहिये । उसे सफल बनाने के लिये प्रचार-प्रसार और कैडर की मेहनत चाहिये । और सफल होने के लिये अखिलेश सरीखे नेता को भी पुरानी पीढी की सफल मायावती के साथ जुड़ना पडता है । यानी मौजूदा वक्त में नायक की कमी कैसे राजनीति की कमान संभालने वालो से लेकर सिल्वर स्क्रीन तक पर है, ये भी साफ है । या फिर ये कहा जाये कि मौजूदा वक्त ने नायक की परिभाषा ही बदल दी है । क्योकि सिल्वर स्क्रीन पर बाहुबली और देश में पीएम मोदी ने नायकत्व को नई परिभाषा तो दी है । बाहुबली का डायलाग “मेरा वचन ही मेरा शासन है “ संभवत नौजूदा राजनीतिक सत्ता की कहानी भी कहता है । तो क्या ये नये दौर के नायकत्व की पहचान है । एक तरफ बाहुबली बने प्रभाशहै ।

तो दूसरी तरफ गुजरात माडल लिये पीएम मोदी । बाहुबली के सामने बालीवुड के सितारे भी नहीं टिके । और मोदी के सामने उनकी अपनी पार्टी बीजेपी का ही कद छोटा हो गया । तो क्या ये बदलाव का दौर है । दक्षिण से बाहुबली जैसी फिल्म बनाकर कोई निर्देशक देश दुनिया में तहलका मचा सकता है । और बालीवुड का एक निर्देशक उसका वितरक बनकर ही खुश हो जाता है कि उसके करोडो के वारे न्यारे हो गये । तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय नेताओ की कतार से इतर ही नही बल्कि हिन्दी पट्टी से दूर गुजरात से एक शख्स निकल कर देश की समूची राजनीति को ना सिर्फ बदल देता है बल्कि लोकतंत्र को नई परिभाषा भी दे देता है । और विपक्ष की समूची राजनीति एकतत्र होकर उसे हराने में ही अपनी जीत मानती है । यानी नायकत्व समेटे हालात क्या सिल्वर स्किर से लेकर राजनीति तक में बदल चुके है । क्योकि एक वक्त वाजपेयी नायक थे पर राजधर्म का पाठ जिन्हे पढाया आज वही शख्स नायक है । और एक दौर में जो बालीवुड मुगले आजम बनाता था । आज वही बालीवुड दक्षिण की तरफ देखने को मजबूर है ।

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