ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि एक चुना हुआ मुख्यमंत्री धरने पर बैठा हो. 2006 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुये नर्मदा मुद्दे पर धरने पर बैठे थे. ऐयर कंडीशन, सरकारी गाड़ियां, वाटर कूलर सब लगाया गया था सरकारी पैसे से उस फाइव स्टार धरने में.

पूरा सरकारी अमला झोंक दिया गया था और अफसरों की ड्यूटी लगी थी धरना स्थल पर. उस वक़्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो किसी अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की थी.

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मुख्यमंत्री अगर सड़क पर धरने पर बैठा है तो उसका प्रोटोकॉल खत्म नहीं हो जाता है. सरकारी अफसर और खासकर पुलिस और सुरक्षा अधिकारियों की मुख्यमंत्री के इर्द गिर्द मौजूदगी का मतलब ये नहीं होता है कि वो धरने में शामिल हो गये. क्या ये पुलिस अधिकारी मोदी के खिलाफ नारे लगा रहे थे?

एक ऑडियो टेप सामने आया है जिसमे बीजेपी के प.बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय और तृणमूल कांग्रेस से बीजेपी में आए मुकुल रॉय की बातचीत बताई जा रही है. इस टेप में मुकुल रॉय ये कहते हुये सुनाई दे रहे हैं कि कुछ आईपीएस अधिकारियों के पीछे सीबीआई लगाई जाएगी तभी बाकी अधिकारी काबू में आएंगे.

ऐसा लग रहा है कि कोलकाता में चल रहे इस ड्रामे की स्क्रिप्ट कैलाश विजयवर्गीय और मुकुल रॉय उसी कथित बातचीत के बाद लिखी गई है. इस तरफ के तानाशाही रवैया ब्यूरोक्रेसी और जनता के बीच और गुस्सा भडकाएगा और सरकार की हताशा को दर्शा रहा है.

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