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प्रशांत टंडन

राजीव गांधी जब तक सत्ता में रहे उन्हे बेहद नापसंद किया – कई वजह थीं. नापसंदगी की शुरुआत सिखों के नरसंहार पर उनके “बड़ा पेड़ गिरता है तो ज़मीन हिलती है” बयान से ही हो गई थी.

उसके बाद अरुण नेहरू और अरुण सिंह जैसों की पैराशूट से राजनीति में उतरी चौकड़ी आँखों में अखरती थी. जब वो पोस्टल बिल लेकर आये तो उनके प्रति रहा सहा विश्वास भी जाता रहा. इसी के चलते उनके राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह से रिश्ते भी तल्ख हुये जिन्होने नागरिकों की निजता में सरकार के दखल देने वाले उस बिल को मजूरी नहीं दी. (पोस्टल बिल आज भी राष्ट्रपति भवन में ही है).

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फिर वीपी सिंह नें एचडीडब्लू पनडुप्पी और बोफोर्स तोपों की खरीद में दलाली के आरोप लगाकर सरकार से बाहर निकले तब मैं राजीव गांधी का मुखर विरोधी हो चुका था. उनके तकिया कलाम “हमे देखना है” का मज़ाक भी बनाता था.

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श्रीलंका में भारतीय शांति सेना को भेजने का फैसला ठीक नहीं था. जिसकी कीमत उन्हे अपने जान गंवाने से चुकानी पड़ी. उस हादसे के बाद उनसे सहानुभूति होने लगी. अब पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो राजीव गांधी अपने कार्यकाल में कुछ बड़े काम कर गये जिसका प्रत्यक्ष फायदा आज भी देश को मिल रहा है.

सबसे बड़ा काम उन्होने पंचायती राज को संस्थागत कर के किया जिस वजह से लोकतंत्र की जड़े सबसे निचले पायदान तक पहुंची और विकास कार्यों में ग्राम पंचायत की भागीदारी हो पाई. आज भी मानरेगा, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना जैसी बड़ी सरकारी योजनायें उन्ही संस्थाओं से चलती हैं.

कंप्यूटर और आईटी में अगर आज हम दुनिया में विकसित देशों के साथ खड़े होने लायक हैं तो राजीव गांधी की ही वजह से. पंजाब और असम समझौते भी राजनीति और शांति कायम करने के लिहाज से दूरगामी साबित हुये. आज हालांकि असम समझौते का खुला उलंघन हो रहा है सिटीजन रजिस्टर और बिल के जरिये.

1985 में दबदल कानून राजीव गांधी ही लेकर आये थे और संविधान संसोधन कर के 10वी अनुसूची जोड़ी गई थी. बिल कितना उपयोगी था इसका ताजा उदाहरण दो दिन पहले कर्नाटक के विश्वास मत दौरान देख ही चुके हैं. उन्होने 21वी सदी के भारत का सपना देखा था और आगे की सरकारे उसी विज़न से आगे बढ़ी और जो नया भारत हम देख रहे हैं वो खून में राजीव गांधी ने भरा ही था.

414 के बहुमत के बाद भी राजीव गांधी की लोकतंत्र की संस्थायों के प्रति आस्था डिगी नहीं थी और वो सहजता बनाये रहे. तमाम कमियों के बाद भी राजीव गांधी की नीयत साफ थी इसीलिये शायद वो इतना कुछ दे गये.