Sunday, January 23, 2022

रवीश कुमार: ह्यूस्टन में प्रधानमंत्री अमरीका की महानता भी तारीफ़ करें और सीखें

- Advertisement -

अमरीका के शहर ह्यूस्टन में आज प्रधानमंत्री की रैली है। उसके बहाने आप अमरीका को भी समझने का प्रयास करें। उस मुल्क के समाज में इतना लोकतंत्र तो है कि आप दूसरे देशों से जाकर बस सकते हैं, नागरिकता ले सकते हैं और चुनाव लड़कर वहाँ की संसद में पहुँच सकते हैं। अन्य संस्थाओं में आराम से प्रतिभा के दम पर जगह पा सकते हैं। वहाँ रहने वाले लाखों भारतीयों का एक हिस्सा ह्यूस्टन के स्टेडियम में पहुँचेगा तो अमरीकी उनकी निष्ठा या राष्ट्र भक्ति पर संदेह नहीं करेंगे। बल्कि हो सकता है कि वे भी सुनने चले जाएँ।

इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन माइग्रेशन और एच वन बी वन वीज़ा को लेकर आक्रामक रवैया रखता है तब भी वहाँ बस चुके भारतीयों ने कभी असुरक्षित महसूस नहीं किया। उन्हें डर नहीं लगा कि अमरीकी एक दिन कहेंगे कि जो दूसरे देश का है वो हमेशा दूसरे देश का होता है। मातृ भूमि और पुण्य भूमि का बोगस सिद्धांत लेकर शक नहीं करेंगे। नहीं कहेंगे कि ये भारतीय हमारे संसाधन पर बोझ हैं। चार जुलाई को रैलियों में नहीं आते हैं। इसलिए इनकी जाँच हो और एक नेशनल रजिस्टर बने। तब क्या होता? हम रोज़ इस बात का जश्न मनाते हैं कि रूस में कोई भारत का विधायक हो गया। आस्ट्रेलिया में सांसद हो गया। अमरीका और ब्रिटेन से तो ऐसी ख़बरें आम हो चुकी हैं। लेकिन भारत में क्या होता ? क्या हुआ वो भी याद करें ?

आज़ादी के बाद भारत के किस शहर में दूसरे शहर में आकर लोग बसे? जिनकी तुलना आप न्यूयार्क के न्यू जर्सी या ब्रिटेन के साउथ हॉल से कर सकते हैं। अमरीका के कितने ही मोहल्ले हैं जो भारतीयों के गढ़ के रूप में पहचाने जाते हैं बल्कि वहाँ भारतीय आराम से अमरीकी लोगों के बीच में रहते हैं। दुकानें हैं। उनकी कंपनियाँ हैं। बिल्कुल सुरक्षित जीवन जी रहे हैं। वहाँ जाते ही सब सिस्टम की बड़ाई करने लगते हैं। उनकी बातों से आपको एक बार नहीं लगेगा कि अमरीका की पुलिस मदद नहीं करती या आती है तो रिश्वत लेकर चली जाती है या उन्हें फ़र्ज़ी केस में फँसा देने का डर है। बल्कि मैंने देखा है कि भारत से ज़्यादा वहाँ जाकर लोग सिस्टम और समाज को लेकर सुरक्षित महसूस करते हैं। इसलिए तरक़्क़ी भी ख़ूब करते हैं।

आज भारत में दस लाख अमरीकी आकर बस गए होते, फ्रांस या ब्रिटेन से आकर बसे होते तो रोज़ यही भारतीय उनकी राष्ट्र भक्ति को लेकर संदेह कर रहे होते। उनके मताधिकार छीन लेने की बात करते और कहते कि भारत में रहें, दुकान चलाएँ मगर वे मंत्री या प्रधानमंत्री नहीं बन सकते हैं। हम रोज़ उन्हें शक की निगाह से देखते। बल्कि अमरीका में रहने वाले भारतीय ही भारत में इस तरह की बातों को बढ़ावा देते। ऐसी बात करने वाले संगठनों को चंदा देते। समर्थन देते। नेताओं के रोज़ बयान आते कि आप पैदा अमरीका में हुए, इसलिए भारत की नागरिकता नहीं मिल सकती क्योंकि आपकी निष्ठा भारत के प्रति हो ही नहीं सकती। हमारी संसद अमरीका के सामने कितनी कम लोकतांत्रिक नज़र आती है। आप ख़ुद तुलना करें।

अब इसी संदर्भ में आप केंद्र सरकार के नागरिक क़ानून के प्रस्ताव को देखिए। अभी पास नहीं हुआ है। उसमें है कि सिर्फ हिन्दू सिख पारसी विस्थापितों को नागरिकता दी जाएगी। जो बांग्लादेश से लेकर अफ़ग़ानिस्तान में सताए गए हैं। इसमें मुसलमान नहीं है। नागरिकता का धर्म के आधार पर विभाजन किया गया है। आज अगर अमरीका इसी तरह का क़ानून बना दे तब क्या होगा? ह्यूस्टन के स्टेडियम में प्रधानमंत्री अकेले खड़े होकर भाषण दे रहे होते। वो भारत के गर्व की बात करेंगे ही लेकिन आप ज़रा इस नज़र से वहाँ आई भीड़ को देखिए। क्या यही भीड़ इस बात का समर्थन करती कि पुणे में बस चुके दस लाख अमरीकी भारतीयों को ट्रंप संबोधित करेंगे। पहले तो हम बसने के सवाल पर ही दंगा करा देते और अगर बस भी जाते तो ट्रंप की रैली के वक्त एंकर चीख़ रहे होते कि ये भारत से ग़द्दारी है। कोई आबादी पर लेक्चर देने के बहाने निशाना बना रहा होता

भारत का विशाल देश है मगर कई बार लगता है कि हमारा आत्मविश्वास कमज़ोर है। दिल छोटा है।भारत को उदार और विशाल बनाना है। यह काम नागरिकों से होगा। नेताओं से नहीं। अगर दुनिया कुटुंब है तो दुनिया को भी बुलाओ। सिर्फ उनके घर का मत खाओ। अपने घर में भी खिलाओ। जैसा इस महान भूमि ने अतीत में किया है।

- Advertisement -

[wptelegram-join-channel]

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot Topics

Related Articles