Wednesday, December 8, 2021

‘मोदी जी के प्रिय साबरमती आश्रम में भी है जिन्ना की तस्वीर’

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डॉ.पंकज श्रीवास्तव

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रसंघ भवन पर 1938 में लगी जिन्ना की तस्वीर पर विवाद भड़काने का मक़सद चुनावी लाभ के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराना है, यह समझने के लिए राजनीति का पंडित होने की ज़रूरत नहीं है। मीडिया एएमयू के आंदोलनरत छात्रों को ‘जिन्ना प्रेमी गैंग’ बताने का अपराध कर रहा है और यह उसी डिज़ायन का हिस्सा है, यह बात ज़रूर उन्हें सदमा पहुँचा सकती है जो आज भी मीडिया से किसी तरह की तटस्थता की उम्मीद करते हैं।

लेकिन इस पर बात करने से पहले ज़रा गुजरात चलते हैं। साबरमती आश्रम।

अहमदाबाद का साबरमती आश्रम माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का प्रिय स्थान है। चीन के राष्ट्रपति और जापान, इज़रायल के प्रधानमंत्रियों को वे गुजरात घुमाने ले गए तो इस आश्रम में उनके साथ काफ़ी वक़्त गुज़ारा। गाँधी स्मृति का इससे पवित्र प्रतीक कोई दूसरा है भी नहीं। इस आश्रम की वजह से ही गाँधी साबरमती के संत कहलाए जिन्होंने ‘बिना खड्ग और ढाल’ के अंग्रेज़ों से लड़कर आज़ादी दिलाई और फिर सावरकर शिष्य गोडसे की गोली खाकर शहीद हो गए।

तो मोदी जी इस आश्रम में जब विदेशी राष्ट्रप्रमुखों को घुमाते हैं तो यहाँ लगी तस्वीरों में एक तस्वीर में गाँधी जी के साथ पाकिस्तान के जन्मदाता मोहम्मद अली जिन्ना मुस्कराते हुए नज़र आते हैं। वैसे तो जिन्ना सावरकर के प्रति आभारी थे कि उन्होंने हिंदू और मुसलमानों को ‘दो राष्ट्र’ होने का सिद्धांत दिया लेकिन वे महात्मा गाँधी के महत्व को समझते थे और अगर उन्हें वक़्त पर यह पता चल जाता कि महात्मा गाँधी, भारत विभाजन रोकने के लिए उन्हें प्रधानमंत्री बनाने तक पर विचार कर रहे हैं तो शायद इतिहास कुछ और होता।

बहरहाल, इतिहास तो इतिहास है। उसे आप बदल नहीं सकते। इतिहास की गैलरी में सबके लिए जगह होती है। ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के जीवन से सीख मिलती है। उनके अच्छे कामों को बढ़ाने और ग़लतियों को न दोहराने का सबक ही इतिहास का सबक है। इस लिहाज़ से इसमें कुछ ग़लत भी नहीं है कि साबरमती आश्रम में बापू और जिन्ना की तस्वीर लगी है। इतिहास का एक क्षण वह भी था जब दोनों मुंबई में ठठाकर हँस पड़े थे यह हँसी किसी कैमरे में क़ैद हो गई थी। ऐसी न जाने कितनी तस्वीरें इतिहास की किताबों में हैं। जिन्ना की तस्वीरों को रखने का मतलब नहीं कि जिन्ना के विचारों को बुलंद किया जा रहा है।

मोदी जी ने करीब 13 साल गुजरात में शासन किया, लेकिन इस तस्वीर पर आँच नहीं आई। यह सवाल तक नहीं उठा कि जिन्ना की तस्वीर साबरमती आश्रम में क्या कर रही है। हो सकता है कि बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने साबरमती आश्रम की सँभाल के लिए कुछ योगदान भी दिया हो। बतौर प्रधानमंत्री भी साबरमती आश्रम जाने से पहले उन्होंने इस तस्वीर को हटाने का कोई निर्देश नहीं दिया, भले ही वे जिन्ना के आलोचक और सावरकर के शिष्य हों।

(जस्टिस जीवन लाल कपूर कमीशन ने साफ़तौर पर सावरकर को गाँधी जी की हत्या का प्रमुख साज़िशकर्ता माना था। फिर भी पिछली एनडीए सरकर में उनकी तस्वीर संसद में लगाई गई। तमाम होहल्ले का कोई असर नहीं हुआ। तस्वीर आज भी लगी हुई है।)

साबरमती आश्रम में जिन्ना की तस्वीर उतनी ही स्वाभाविक है, जैसे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रसंघ में कैराना और कर्नाटक की चुनावी गर्माहट शुरू होने के पहले थी। कुछ दिन पहले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद एएमयू गए थे, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कई बार वहाँ गए, बीजेपी के न जाने कितने मंत्री और मुख्यमंत्री वहाँ गए, कभी किसी को आपत्ति नहीं हुई। छात्रसंघ ने जिन्ना को मानद सदस्यता 1938 में दी थी जिस वजह से यह तस्वीर वहाँ है। यह वह दौर था जब जिन्ना भगत सिंह का मुकदमा लड़कर नौजवानों में काफ़ी मशहूर हुए थे। पाकिस्तान का मामला भी नहीं उठा था। ज़ाहिर है यह तस्वीर भी इतिहास के किसी ख़ुशनुमा क्षण की याद है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में न जिन्ना की जयंती मनाई जाती है और न उनके निधन की तारीख़ पर शोक मनाया जाता है। हाँ, गाँधी जयंती और 30 जनवरी का शहादत दिवस ज़रूर मनाया जाता है। यह समझ आम है कि जिन्हें जिन्ना के विचारों से प्यार था, वे पाकिस्तान चले गए। भारत मे रहने वाले मुसलमानों ने जिन्ना के सपने पर ठोकर मार दी थी। उनके पास चुनाव का विकल्प था और उन्होंने हिंदुस्तान को चुना, न कि पाकिस्तान।

एएमयू में इस समय आंदोलन जिन्ना को लेकर नहीं चल रहा है। यह एएमयू पर गुंडों के सहयोग से पुलिसिया हमले के ख़िलाफ़ नाराज़गी है। यह गुस्सा पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर हमले के ख़िलाफ़ है जिनकी जान लेने की योजना दस साल पहले सार्वजनिक हो चुकी है जिस पर मीडिया विजिल में हालिया छपी रपट आप यहाँ पढ़ सकते हैं। ज़ाहिर है, छात्रों को पूरा हक़ है कि वे जिन्ना के नाम पर उन पर हुए हमले का शांतिपूर्ण प्रतिवाद करें।

लेकिन मीडिया के लिए यह जिन्ना प्रेमी गैंग है। वे लगातार जिन्ना पर कार्यक्रम चलाते हुए एएमयू के छात्रों के बहाने आम मुसलमानों की देशभक्ति पर संदेह जताते हुए चीख़-पुकार कर रहे हैं। आज़ाद भारत में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को लेकर मीडिया की ऐसी बेशर्म कोशिश भी इतिहास में शर्मिंदगी के साथ यद की जाएगी।

बहरहाल, यह सवाल तो उठता ही है कि अगर मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते जिन्ना की तस्वीर की सम्हाल कर सकते हैं तो योगी जी एएमयू की तस्वीर के ख़िलाफ़ क्यों गरज-बरस रहे हैं? क्या यूपी के लोगों की बुद्धि पर उन्हें संदेह है। या फिर वे यही ‘बौद्धिक’ देने के लिए यूपी के मुख्यमंत्री बनाए गए हैं।

उम्मीद है कि चुनावी गर्मी उतरते ही, जिन्ना का भूत कम से कम 2019 के आम चुनाव तक तो उतर ही जाएगा। वैसे, जिन्ना को इसमें शायद ही तक़लीफ़ हो। पाकिस्तान ‘मुस्लिम राष्ट्र’ और भारत ‘हिंदू राष्ट्र’ बने, जिन्ना यही तो चाहते थे। लेकिन भारत के महान नेताओं ने सहअस्तित्व के आदर्श की बड़ी संवैधानिक लकीर खींचकर सावरकर और जिन्ना के सपनों को तोड़ दिया। बाँग्लादेश बनने के साथ धर्म के राष्ट्रीयता का आधार होने का सिद्धांत भी मिट्टी में मिल गया।

यह हास्यास्पद ही है कि जिन्ना की तस्वीर पर तूफ़ान खड़ा करने वाले जिन्ना के सपनों को ही पूरा कर रहे हैं।

(डॉ.पंकज श्रीवास्तव मीडिया विजिल के संस्थापक संपादक और इतिहास के शोधार्थी हैं।)

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