Monday, September 27, 2021

 

 

 

ललित गर्ग: ‘पर्रिकर थे ताजी हवा के झोंकों का अहसास’

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गोवा के मुख्यमंत्री एवं पूर्व केन्द्रीय रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर पैंक्रियाटिक कैंसर से एक वर्ष तक जूझने के बाद देह से विदेह हो जाना  न केवल गोवा बल्कि भाजपा एवं भारतीय राजनीति के लिए दुखद एवं गहरा आघात है। उनका असमय  निधन हो जाना सभी के लिए संसार की क्षणभंगुरता, नश्वरता, अनित्यता, अशाश्वता का बोधपाठ है। उनका निधन राजनीति में चारित्रिक एवं नैतिक मूल्यों के एक युग की समाप्ति है। भाजपा के लिये एक बड़ा आघात है, अपूरणीय क्षति है। आज भाजपा जिस मुकाम पर है, उसे इस मुकाम पर पहुंचाने में जिन लोगों का योगदान है, उनमें मनोहर पर्रीकर अग्रणी है।
मनोहर गोपालकृष्ण प्रभु पर्रिकर का जन्म 13 दिसम्बर, 1955 को हुआ। वे राज्य के पारा गांव के कारोबारी परिवार से ताल्लुक रखते थे। वे उत्तर प्रदेश से राज्य सभा सांसद थे। उन्होंने सन 1978 मे आई.आई.टी. मुम्बई से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करी। भारत के किसी राज्य के मुख्यमंत्री बनने वाले वह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने आई.आई.टी. से स्नातक किया। 1994 में उन्हें गोआ की द्वितीय व्यवस्थापिका के लिये चयनित किया गया था। जून 1999 से नवम्बर 1999 तक वह विरोधी पार्टी के नेता रहे। 24 अक्टूबर 2000 को वे गोआ के मुख्यमन्त्री बने किंतु उनकी सरकार 27 फरवरी 2002 तक ही चल पाई। जून 2002 में वह पुनः सभा के सदस्य बने तथा 5 जून, 2002 को पुनः गोआ के मुख्यमन्त्री पद के लिये चयनित हुए। 13 मार्च 2017 को पर्रिकर ने छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से चैथी बार गोवा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, राजभवन में आयोजित समारोह में राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। प्लानिंग कमीशन ऑफ इन्डिया तथा इंडिया टुडे के द्वारा किय गए सर्वेक्षण के अनुसार उनके कार्यकाल में गोआ लगातार तीन साल तक भारत का सर्वश्रेष्ठ शासित प्रदेश रहा। कार्यशील तथा सिद्धांतवादी श्री पर्रीकर को गोआ में मि. क्लीन के नाम से जाना जाता है।
मनोहर पर्रीकर भारतीय राजनीति के जुझारू एवं जीवट वाले नेता थे, यह सच है कि वे गोआ के थे यह भी सच है कि वे भारतीय जनता पार्टी के थे किन्तु इससे भी बड़ा सच यह है कि वे राष्ट्र के थे, राष्ट्रनायक थे। देश की वर्तमान राजनीति में वे दुर्लभ व्यक्तित्व थे। टैक्नोलोजी के धनी, उच्च शिक्षा और कुशल प्रशासक के रूप में उन्होंने देश के गौरव को बढ़ाया। उदात्त संस्कार, लोकजीवन से इतनी निकटता, इतनी सादगी, सरलता और इतनी सचाई ने उनके व्यक्तित्व को बहुत और बहुत ऊँचा बना दिया है। वे तो कर्मयोगी थे, अन्तिम साँस तक देश की सेवा करते रहे। पर्रीकर का निधन एक राष्ट्रवादी सोच की राजनीति का अंत है। वे सिद्धांतों एवं आदर्शों पर जीने वाले व्यक्तियों की शंृखला के प्रतीक थे। उनके निधन को राजनैतिक जीवन में शुद्धता की, मूल्यों की, राजनीति की, आदर्श के सामने राजसत्ता को छोटा गिनने की या सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने की समाप्ति समझा जा सकता है। हो सकता है ऐसे कई व्यक्ति अभी भी विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे हों। पर ऐसे व्यक्ति जब भी रोशनी में आते हैं तो जगजाहिर है- शोर उठता है। पर्रीकर ने तीन दशक तक सक्रिय राजनीति की, अनेक पदों पर रहे, पर वे सदा दूसरों से भिन्न रहे। घाल-मेल से दूर। भ्रष्ट राजनीति में बेदाग। विचारों में निडर। टूटते मूल्यों में अडिग। घेरे तोड़कर निकलती भीड़ में मर्यादित। उनके जीवन से जुड़ी विधायक धारणा और यथार्थपरक सोच ऐसे शक्तिशाली हथियार थे जिसका वार कभी खाली नहीं गया।
इस शताब्दी के भारत के ‘राजनीति के महान् सपूतों’ की सूची में कुछ नाम हैं जो अंगुलियों पर गिने जा सकते हंै। मनोहर पर्रीकर का नाम प्रथम पंक्ति में होगा। पर्रीकर को अलविदा नहीं कहा जा सकता, उन्हें खुदा हाफिज़ भी नहीं कहा जा सकता, उन्हें श्रद्धांजलि भी नहीं दी जा सकती। ऐसे व्यक्ति मरते नहीं। वे हमंे अनेक मोड़ों पर राजनीति में नैतिकता का संदेश देते रहेंगे कि घाल-मेल से अलग रहकर भी जीवन जिया जा सकता है। निडरता से, शुद्धता से, स्वाभिमान से। उन्हें आधुनिक गोवा का निर्माता माना जाता है, मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने गोवा को एक नई पहचान दी। केन्द्र में वे नरेन्द्र मोदी सरकार में एक सशक्त एवं कद्दावर मंत्री थे। रक्षामंत्री के अपने कार्यकाल के दौरान, पाकिस्तान को कड़ा सन्देश दिया, कई नए अभिनव दृष्टिकोण, राजनैतिक सोच और कई योजनाओं की शुरुआत की तथा विभिन्न विकास परियोजनाओं के माध्यम से लाखों लोगों के जीवन में सुधार किया, उनमें जीवन में आशा का संचार किया। उरी हमले के बाद पाक में आतंकियों के शिविरों को नेस्तनाबूद करने वाली सर्जिकल स्ट्राइक में पर्रिकर की अहम भूमिका रही। इसने सादगी के लिए मशहूर पर्रिकर की कुशल प्रशासक की छवि को पुख्ता किया। उन्होंने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भारतीय सेना के सर्जिकल हमले का श्रेय भी संघ की शिक्षा को दिया था।
अपनी सादगी एवं सरलता से उन्होंने राजनीति को एक नया दिशाबोध दिया। आधी बाजू की कमीज और लेदर सैंडल उनकी पहचान थी। मुख्यमंत्री हो या केन्द्रीय मंत्री या अन्य उच्च पदों पर होने के बाद भी पर्रिकर ने अपने रहन-सहन में जरा भी बदलाव नहीं किया। कहा जाता है कि वे अपने राज्य की विधानसभा खुद स्कूटर चलाकर जाया करते थे। इतना ही नहीं उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अपने घर को नहीं छोड़ा और सरकार द्वारा दिए गए घर में नहीं गए। गोवा के मुख्यमंत्री रहते हुए एक दफा उन्होंने अपने जन्मदिन पर खर्च होने वाले पैसे को चेन्नई रिलीफ फंड में भेजने की अपील की थी। वे सोशल मीडिया के जरिए भी लोगों से जुड़े रहते थे और उनकी मदद करते थे। पर्रिकर ने बहुत छोटी उम्र से आरएसएस से रिश्ता जोड़ लिया था। वह स्कूल के अंतिम दिनों में आरएसएस के मुख्य शिक्षक बन गए थे। संघ के साथ अपने जुड़ाव को लेकर कभी भी किसी तरह की हिचकिचाहट उन्होंने नहीं दिखाई। आईआईटी बांबे से इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद भी संघ के लिए काम जारी रखा और पढ़ाई पूरी करने के बाद वह 26 साल की उम्र में मापुसा में संघचालक बन गए। टेक्नोक्रेट पर्रिकर अक्सर संघ के गणवेश और हाथ में लाठी लिए नजर आते थे। पर्रिकर की शख्सियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बेहद बीमार होने के बाद भी गोवा में 2019-20 का बजट पेश करने विधानसभा पहुंचे। इस दौरान उन्होंने बेहद आत्मविश्वास से कहा था, ‘मैं जोश में भी हूं और होश में भी हूं।’ उनके इस जोश पर सत्ता पक्ष ही नहीं विपक्ष ने भी खड़े होकर अभिवादन किया।
वे गोवा के लिए अपनी आवाज उठाने और उसके हक में लड़ने वाले विशिष्ट नेताओं में से एक थे। वे भाजपा संगठन के लिए एक धरोहर थे। उन्होंने भाजपा को गोवा में मजबूत करने के लिए कठोर परिश्रम किया। वह अपने क्षेत्र की जनता के लिए हमेशा सुलभ रहते थे। वे युवावस्था में ही सार्वजनिक जीवन में आये और काफी लगन और सेवा भाव से समाज की सेवा की। भारतीय राजनीति की वास्तविकता है कि इसमें आने वाले लोग घुमावदार रास्ते से लोगों के जीवन में आते हैं वरना आसान रास्ता है- दिल तक पहुंचने का। हां, पर उस रास्ते पर नंगे पांव चलना पड़ता है। पर्रीकर इसी तरह नंगे पांव चलने वाले एवं लोगों के दिलों पर राज करने वाले राजनेता थे, उनके दिलो-दिमाग में गोवा एवं वहां की जनता हर समय बसी रहती थी। काश! सत्ता के मद, करप्शन के कद, व अहंकार के जद्द में जकड़े-अकड़े रहने वाले राजनेता उनसे एवं उनके निधन से बोधपाठ लें। निराशा, अकर्मण्यता, असफलता और उदासीनता के अंधकार को उन्होंने अपने आत्मविश्वास और जीवन के आशा भरे दीपों से पराजित किया।
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ललित गर्ग

पर्रीकर भाजपा के एक रत्न थे। उनका सम्पूर्ण जीवन अभ्यास की प्रयोगशाला थी। उनके मन में यह बात घर कर गयी थी कि अभ्यास, प्रयोग एवं संवेदना के बिना किसी भी काम में सफलता नहीं मिलेगी। उन्होंने अभ्यास किया, दृष्टि साफ होती गयी और विवेक जाग गया। उन्होंने हमेशा अच्छे मकसद के लिए काम किया, तारीफ पाने के लिए नहीं। खुद को जाहिर करने के लिए जीवन जीया, दूसरों को खुश करने के लिए नहीं। उनके जीवन की कोशिश रही कि लोग उनके होने को महसूस ना करें। बल्कि उन्होंने काम इस तरह किया कि लोग तब याद करें, जब वे उनके बीच में ना हों। इस तरह उन्होंने अपने जीवन को एक नया आयाम दिया और जनता के दिनों पर छाये रहे। उनका व्यक्तित्व एक ऐसा आदर्श राजनीतिक व्यक्तित्व हैं जिन्हें सेवा और सुधारवाद का अक्षय कोश कहा जा सकता है। उनका आम व्यक्ति से सीधा संपर्क रहा। यही कारण है कि आपके जीवन की दिशाएं विविध एवं बहुआयामी रही हैं। आपके जीवन की धारा एक दिशा में प्रवाहित नहीं हुई, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं का स्पर्श किया। यही कारण है कि कोई भी महत्त्वपूर्ण क्षेत्र आपके जीवन से अछूता रहा हो, संभव नहीं लगता। आपके जीवन की खिड़कियाँ राष्ट्र एवं समाज को नई दृष्टि देने के लिए सदैव खुली रही। इन्हीं खुली खिड़कियों से आती ताजी हवा के झोंकों का अहसास भारत की जनता सुदीर्घ काल तक करती रहेगी।

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