open letter to yashika datt from dilip c mandal

प्रिय याशिका दत्त,

BBC के जरिए तुम्हारी कहानी सारा देश और दुनिया पढ़ रही है. तुम अब न्यूयॉर्क में हो और भारतीय जाति व्यवस्था को लेकर तुम्हारे बेहद कड़वे अनुभव हैं. इसीलिए तुमने अब तक अपनी दलित पहचान को छिपाया.

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तुम्हें यह जानकर खुशी होगी कि अब भारत में बहुजन लोगों ने अपनी पहचान से डरना बंद कर दिया है. हर कैंपस में फुले, बिरसा और आंबेडकर के नाम पर छात्र संगठन और प्रोफेसरों के संगठन चल रहे हैं. जाति को एक समस्या के तौर पर स्वीकार करना, जाति मुक्ति की दिशा में पहला कदम है. पंजाब में तो एक करोड़ की कार के पीछे लोग ठाठ से संत रविदास की फोटो लगा रहे हैं.

तुमने जाति छिपाई, इससे समस्या कहां खत्म हुई. ये TB के समय होने वाले बुखार के समय क्रोसिन लेने वाली बात है. तुम्हारा जाति छिपाना एक निजी फैसला था, जिससे देश और समाज को कुछ नहीं मिला.

आज लोग तुम्हें इसलिये जान रहे हैं कि तुम अपनी पहचान के साथ सबके बीच हो. वरना, पहचान छिपाए लोग कब मर जाते हैं, किसी को पता नहीं चलता. उनके लिए सिर्फ परिवार रोता है. वहीं देखो, रोहित वेमुला के साथ देश रो रहा है. रोहित वेमुला की फुले, आंबेडकरी पहचान है. वह कमजोरी नही, ताकत है.

फिर छुपाना क्यों? तुम इस देश की सबसे मेहनतकश बिरादरी से हो. तुम्हारे पुरखों ने यह देश बनाया है. तुम मालकिन हो. शर्म से मुंह छिपाएं निठल्ले लोग. तुम बुद्ध, कबीर, रैदास, फुले, सावित्रीबाई, बाबा साहेब की परंपरा की संतान हो. जिस परंपरा ने देश को सबसे बड़े विद्वान दिए.

उम्मीद है कि तुम यह समझ पा रही हो.

एक भारतीय नागरिक

दिलीप सी मंडल की फेसबुक वाल से 

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