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आज पहली बार देश के प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख रहा हूँ… रोआँ – रोआँ खड़ा हो गया है खुशी और गौरव से। लेकिन दु:ख इसी बात का है कि आप इस पत्र को पढ़ ही नहीं पाएँगे, क्योंकि हमेशा की तरह आप अंतरराष्ट्रीय संबंधों तथा कूटनीतिक मामलों में “अखण्ड भारत” की स्थिति मज़बूत करने के लिए देश – दर – देश बिना खाए-पिए चक्कर काट रहे होंगे।

मैं बिना किसी भूमिका के अपनी बात रखूँगा। पहले यह बता दूँ कि ‘मलिकार’ क्यों लिखा आपको! मलिकार घर का मालिक होता है जो दुआर पर खटिया बिछा कर लेटा रहता है और हर आने-जाने वाले पड़ोसियों से अपने बावन बीघा पुदिने की हरियाली का बखान करता रहता है। बात बे बात खुद के विश्व गुरु और विश्व शक्ति होने की बातें भी करता रहता है। जबकि भीतर घर की औरतें दाने – दाने को तरसती रहतीं हैं… दुध मुँहे बच्चे थोड़े से दूध के लिए तरसते रहते हैं… अन्य भाइयों की धोती में ‘छप्पन इंच’ की चकत्ती सटी रहती है लेकिन मलिकार की नीलहिया धोती दूर से ही लाइट मारती है।

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मलिकार! मैं कह रहा था कि मैं जाति से ब्राह्मण हूँ और लाखों वर्षों तक दलितों का शोषण करने के बाद भी इतनी औकात नहीं हो पाई कि एक टीवी खरीद सकूँ। इसलिए आपका वो पकौड़े बेचने वाला साक्षात्कार अब देख पाया हूँ। और दावे के साथ कहूँगा कि आपने एकदम सही सवाल किया था कि – जी न्यूज़ चैनल के सामने पकौड़े बेच रहे व्यक्ति को रोजगार की श्रेणी में रखा जाएगा या नहीं?

मलिकार! वो पता नहीं कौन सा पत्रकार था जो इतने आसान से सवाल का जवाब नहीं दे पाया। मैं जवाब दूँगा लेकिन पहले “अखण्ड भारत” की भी चर्चा कर लूँ क्योंकि आजकल राजनीति के बाजार में अखण्ड भारत और वंदेमातरम् ही देश भक्ति का होलमार्क बन चुका है। मैंने सुना है कि कोई कन्हैया कुमार था जिसने ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ टाईप नारे लगाए थे किसी स्कूल में। मैंने उसे देखा था किसी इंटरव्यू के दौरान जब वो ऐलान कर रहा था कि भाई अगर मैंने ऐसा कुछ कहा है तो मुझे जेल भेजो न! और वो पत्रकार (माफ़ करें दलाल ठीक है) इधर-उधर की बातें करने लगता है। मैं कन्हैया को नहीं जानता। उसने क्या कहा क्यों कहा मुझे नहीं पता। लेकिन सच बताऊँ तो जब भी कोई “अखण्ड भारत” कहता है तो हँसी रोकनी मुश्किल हो जाती है इसलिए कि वो चू… (बेवकूफ़) जानते हैं कि महाराष्ट्र में बिहारियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जाता है… वो जानते हैं कि झारखंड की अध्यापक भर्ती में आंदोलन चल रहा है “बाहरियों को भगाओ”….वो जानते हैं कि छत्तीसगढ़ से सिपाही का फार्म आया है जो बस छत्तीसगढ़ के मूल निवासियों के लिए ही है… वो जानते हैं कि भारत के टुकड़े हो चुके हैं महाराष्ट्र के रूप में झारखंड के रूप में छत्तीसगढ़ के रूप में। फिर भी “अखण्ड भारत- अखण्ड भारत’ चिल्लाते हैं। उन्हें यह पता ही नहीं कि संविधान की प्रस्तावना में भारत गणराज्य का मतलब क्या है?

मलिकार! आपसे निवेदन है कि अगर ‘अखण्ड भारत’ सच में है तो अभी आदेश दीजिए कि छत्तीसगढ़ की सिपाही भर्ती में संपूर्ण भारत के अभ्यर्थी शामिल होंगे। अभी आदेश दीजिए कि झारखंड में असित कुमार मिश्र भी ज्वॉइन करेगा और उसे उतना ही मान – सम्मान मिलेगा जितना उत्तर प्रदेश में मिलता।

अभी आदेश दीजिए कि महाराष्ट्र में मराठियों का जितना हक है उतना ही हक बिहारियों का भी है। क्योंकि भारत अखण्ड है … लेकिन मैं जानता हूँ कि ऐसा कुछ भी नहीं होगा। क्योंकि आप भी जानते हैं कि भारत के टुकड़े हो चुके हैं और वो भी भारतीय हत्यारों बलात्कारियों घोटालेबाजों (माफ़ करें नेताजी कहना नहीं आता) की सहमति से।

मलिकार! पकौड़े की बात पर आता हूँ। क्या आपको पता है कि मध्यप्रदेश में जो पकौड़े साॅरी पटवारी का फार्म आया था उसे कितने लोगों ने भरा था?

मैं ही बता देता हूँ – विश्व के तिहत्तरवें देश की पूरी आबादी ने। आया कुछ समझ में?
आप जानते हैं कि देश में तत्काल साढ़े चार लाख सिपाही की आवश्यकता है?
आप जानते हैं कि इन्कम टैक्स विभाग में बत्तीस हज़ार से अधिक पद रिक्त हैं?
आप जानते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं में बहत्तर हजार से अधिक चिकित्सक अभी चाहिए?
आप जानते हैं कि भारत में यह पोस्ट लिखते समय दस लाख अध्यापक के पद रिक्त हैं?
आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड ने दस साल में मात्र एक भर्ती क्लीयर (कुछ मामले अभी भी कोर्ट में) की है?

नहीं पता है आपको। लेकिन हम युवाओं को बखूबी पता है कि कैसे किसी भी राज्य सरकार की भर्ती में दस पांच सवाल जानबूझकर कर ग़लत पूछे जाते हैं ताकि एक भर्ती तीन साल तक चले। क्योंकि आपकी नीयत ठीक नहीं।क्योंकि कोई भी राज्य सरकारें चाहतीं ही नहीं कि नौकरी दी जाए क्योंकि संसद में बैठने वाले हत्यारोपियों बलात्कारियों और घोटालेबाजों के ऐश करने के लिए बजट कहाँ से आएगा?

मलिकार! कक्षा एक से एम ए, बीएड् तक सतत प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने के बाद भी विदेश के नाम पर नेपाल गया हूँ और वहाँ भी ललकार कर कह आया कि मैंने अपना प्रधानमंत्री उसे चुना है जिसने चाय बेची है देश नहीं बेचा…।

अब वो अलग बात है कि छह सौ करोड़ देशवासियों माफ़ कीजिये सवा सौ करोड़ देशवासियों में कोई सामने नहीं आया जिसे आपने चाय दी थी। फिर भी मुझे खुशी है कि एक जमीन से जुड़ा व्यक्ति हमारा मलिकार है।  लेकिन अब आप प्रधानमंत्री बन जाने के बाद चाय बेचते तो मुझे शर्म आती कि मेरा प्रधानमंत्री चाय बेचता है। क्यों?  क्योंकि एक प्रधानमंत्री का प्रोटोकॉल ग़वाही नहीं देता कि वो सड़क के किनारे खड़े होकर पकौड़े बेचे।

ठीक इसी तरह समझिए अगर अंगूठा छाप असित कुमार मिश्र पकौड़े बेचता है तो खुशी है कि वो स्वरोजगार कर रहा है। लेकिन अगर कोई ग्रेजुएट असित कुमार मिश्र पकौड़े बेच रहा है तो उसके प्रिंसिपल को, उसके कुलपति को, उसके शिक्षा मंत्री को, उसके प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को बीस जूते लगाकर बताना चाहिए कि भारत गणराज्य का एक ग्रेजुएट पकौड़े बेच रहा है तो उसे स्वरोजगार नहीं ‘राष्ट्रीय शर्म’ कहते हैं। क्योंकि किसी भी विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट का प्रोटोकॉल ग़वाही नहीं देता कि वो सड़क के किनारे खड़े होकर पकौड़े बेचे।इसलिए उस दिन “अखण्ड भारत” का झंडा झुक जाना चाहिए, क्योंकि एक ग्रेजुएट या एक प्रधानमंत्री पकौड़े बेचते पाया गया… हाँ मलिकार! आपका यह सवाल स्वरोजगार नहीं राष्ट्रीय शर्म है…

क्रमशः
असित कुमार मिश्र
बलिया

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