सैय्यद ज़ैगम मुर्तज़ा

रेप जघन्य अपराध है। क़ानून के मुताबिक़ परिस्थिति, धर्म और सामाजिक हालात बदलने से इस अपराध की प्रकृति, पीड़िता पर असर और अपराधी की सज़ा में बदलाव नहीं होता लेकिन मीडिया और समाज का नज़रिया क़ानून से अलग है। रेप के मामलो में मीडिया और समाज की प्रतिक्रिया पीड़िता की सामाजिक स्थिति, उसकी जाति और धर्म तय कर रहे हैं।

मीडिया और सामाजिक उबाल के लिए ज़रूरी है कि पीड़िता शहरी मध्यम/उच्च मध्यम वर्ग, हिंदू सवर्ण हो। अपराधी अगर विधर्मी या दलित है तो अपराध को लेकर राष्ट्रीय चेतना सातवें आसमान पर होती है। ऐसे मामलों में अदालत पर बिना ट्रायल जल्द से जल्द अधिकतम सज़ा देने का दबाव बनाया जाता है। भीड़ के न्याय और मध्यकालीन बर्बर इंसाफ से लेकर इस्लामी न्याय व्यवस्था तक आम विमर्श मे आ जाते हैं। इसके ठीक उलट दलित महिला के आत्मसम्मान की छोड़िए ग़रीब हिंदू सवर्ण अपनी रिपोर्ट तक लिखाने को भटकती हैं।

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दलित महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार टीवी की ख़बर नहीं है और अख़बार के अंदर किसी कोने में दो सेंटीमीटर के एक काॅलम में खो जाने वाला साधारण समाचार है। इस से भी आगे बढ़कर समाज ने मान लिया है कि बलात्कार करना सैनिक और अर्धसैनिक बलों का नैतिक अधिकार है। राष्ट्रवाद की चाशनी में डूबा मध्यम वर्ग इस पर चर्चा को ही अनैतिक मानता है। पीड़िता अगर विधर्मी है तो क़ुठित मानसिकता विजयघोष करने लगती है और मीडिया उसे मौन स्वीकृति देता है। ये मान लिया गया है कि ग़रीब, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक महिलाएं भोग्य हैं और इन्हें आवाज़ उठाने का भी अधिकार नहीं है। इनके अलावा घर, परिवार और रिश्तों में निपट जाने वाली वो सैकड़ों महिलाएं और बच्चियां भी हैं जो मध्यम/उच्च मध्यम वर्ग की कथित इज़्ज़त का बोझ ढोने को अभिशप्त हैं।

इनकी आवाज़ मीडिया विमर्श छोड़िए समाज की नुक्कड़ चर्चा भी नहीं बनती है। बहरहाल महिला विमर्श के केंद्र में हैं। उनके अधिकारों पर सेमिनार हो रहे हैं। मीडिया उनकी मुक्ति के नारे लगा रहा है। मगर इस विमर्श को एक ख़ास वर्ग तक सीमित किया जा रहा है। इस विमर्श में भी समाज कम राजनीति और टीआरपी की गणना साफ दिखती है। महिलाएं प्रोडक्ट हैं और टीवी अपनी सहूलियत के हिसाब से ब्रांड और टारगेट चुन रहा है।

लेखक राज्यसभा टीवी से जुड़े है 

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