Indian youths run in a field with their national flag as the country celebrates its 67th Independence Day in Kolkata on August 15, 2013. Premier Manmohan Singh warned Pakistan August 15 against using its soil for "anti-India activity", following a fresh escalation of tensions between the nuclear-armed neighbours over a deadly attack on Indian soldiers. AFP PHOTO/Dibyangshu SARKAR (Photo credit should read DIBYANGSHU SARKAR/AFP/Getty Images)
मोहम्मद अनस

2014 का लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी ने सांप्रदायिकता के आधार पर लड़ा और भारी बहुमत से जीत भी लिया। मोदी, मुसलमानों को लेकर गलतबयानी करते रहे, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से। एक तरफ शहरी मध्यम वर्ग को विकास का जादू देखना था तो दूसरी तरफ एक बड़े वर्ग को मुसलमानों को अलग थलग होते देखना था। मुसलमानों का सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक तौर पर तोड़ने, राजनैतिक हैसियत खत्म करने की चाहत रखने वाले संगठन का राजनैतिक अंग बहुत मामूली तौर पर इसमें कामयाब भी हुआ लेकिन जैसा हव्वा बना था कि ,’अब मोदी आ गया है, काम तमाम कर देगा तुम्हारा’ वैसा कुछ नहीं हुआ।

कामयाबी कहां मिली भाजपा को?
भाजपा कामयाब हुई तमिलनाडू से लेकर मध्य प्रदेश तक के किसानों को पेशाब पिलाने और गोली से उड़ाने तक।
भाजपा ने देश के मध्यम वर्ग से नकदी छीन कर बैंकों में जमा करा लिया। आखरी पायदान पर खड़ा गरीब दस बीस किमी चल कर सिर्फ दो नोट बदलवाने बैंकों तक आया। गठरी में चुमड़े कुर्ते की जेब में तह कर रखे बूढ़ी कौशल्या का पैसा छीन लिया सरकार ने।

बुलेट ट्रेन का वादा करके रेलवे स्टेशनों को बेच दिया भाजपा ने। दो करोड़ प्रतिवर्ष नौकरी का वादा करके, सरकारी नौकरियों पर रोक लगा दी भाजपा ने। छोटे खुदरा व्यापारियों, पटरी दुकानदारों को दुकाने बंद करने को मजबूर किया भाजपा ने। दलित हिंदुओं को चौराहों और मोहल्लों में पीटा भाजपा सरकारों ने।

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मुसलमानों का छोड़िए। उनका इतिहास संघर्ष, पराजय और विजय गाथाओं से भरा पड़ा है। यह क़ौम बड़ी चट्टान है। पिछले सत्तर सालों में पचास से सीधा तीन फीसदी सरकारी नौकरियों पर आ गिरी फिर भी ज़िंदा है। आप अपना देखिए। हिंदू ह्रदय सम्राटों की सरकारें अमूमन देश के ज्यादातर हिस्सों में है। कम से कम कुछ न सहीं, हिंदू होने के नाते ही अधिकार मांगिए। आम हिंदुओं को जबकि सरकार के तीन साल से ऊपर हो चुके हैं कुछ खास नहीं मिला। जिन्हें मिल रहा है वे चैनलों पर बैठ कर बता रहे हैं कि,’फलां स्मारक भारतीयता की पहचान नहीं है।’ मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि क्या भारतीयता की पहचान रामकृपाल के बेटे सुरेंद्र का पिचका हुआ पेट है? या फिर भारतीय संस्कृति का बोध विजय माल्या जैसे पूंजीपतियों की मुस्कुराहट देख कर होता है?

तय आपको करना है। इस देश की बहुसंख्यक आबादी को तय करना है कि उन्हें क्या चाहिए। क्योंकि जिसका सपना आरएसएस दिखाती रही है वह तो पूरा होने से रहा। मुसलमान कहीं जाने से रहा। एडजस्ट करना पड़ेगा भाई साहब। साथ रहिए और सरकार से अपना हक़ मांगिए। मुसलमानों को तो वैसे भी कुछ खास नहीं मिलता। आपका जो है वह आप में ही से कुछ मलाईदार लोगों को दिया जा रहा है। तो सवाल और गुस्सा उन पर कीजिए। मुसलमानों पर नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद अनस की फेसबुक वाल से लिया गया है