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उन्नाव और कठुआ के जघन्य बलात्कार, हस्तिनापुर राज दरबार के द्रोपदी चीरहरण प्रसंग से समझने होंगे. यानी राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में. महाभारत काल में द्रोपदी, जिन पारंपरिक सत्ता आयामों के निशाने पर रही उनके आतंक को उन्नाव ने और भय को कठुआ ने साक्षात कर दिया है.

इस कटु आयाम पर सुर्ख़ियों में चर्चा होनी चाहिए थी कि उन्नाव और कठुआ प्रकरणों में दरिन्दगी का शिकार बनी लड़कियों के परिवार जनों को घर से बेघर क्यों होना पड़ा. पांडवों की तरह ही, लाचार और अपमानित! स्पष्टतः वे सिर्फ आरोपी गिरोह के ही निशाने पर नहीं बल्कि सत्ता गिरोह के निशाने पर रहे हैं.

इस बार के मोमबत्ती मार्च का नेतृत्व कांग्रेस दल के राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने संभाला और बच्चों के दुष्कर्मियों को फांसी देने के कोरस की अगवाई में मोदी दल के मंत्री और मुख्यमंत्री उतर आये. यानी, अभी तक सत्ता के पक्ष-विपक्ष में फैंसी सजा और घड़ियाली आंसू के विकल्प चुके नहीं हैं. महाभारत प्रसंग में दोनों भूमिका कृष्ण ने निभायी थी.

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उन्नाव प्रकरण में हमने ईमानदार कानून-व्यवस्था की कसमें खाने वाले एक ब्रह्मचारी मुख्यमंत्री की शासन के शीर्ष में उपस्थिति का भी हश्र देख लिया. इस योगी का, एक ओर स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक संबंध पर एंटी रोमियो दस्ते का ‘नैतिक’ बुलडोजर चलाने में यकीन है, और साथ ही साथ सत्ता के जातिवादी दखल को भरपूर सींचते रहने में भी. राज दरबार के समर्थन में, प्रश्नाकुल द्रोपदी से आँख चुराते, ब्रह्मचारी भीष्म का हश्र याद आ गया होगा!

मौजूदा बलात्कार, हत्या, पोस्को क़ानूनों के मुताबिक़ भी कठुआ के अपराधियों के समर्थन में उतरे भाजपायी मंत्रियों लाल सिंह और चंद्र प्रकाश गंगा को फाँसी की सज़ा मिलनी चाहिये! भाजपा शासित राज्यों में 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के बलात्कारी के लिए फाँसी माँगने वाले चुप क्यों हैं?मुस्लिम बच्ची की नृशंस बलात्कार-हत्या के हिन्दू आरोपियों के समर्थन में पार्टी कैडर के उग्र धरना-प्रदर्शन को भूल से भी विसंगति समझना भूल होगी; वास्तव में यह सत्ता के चरित्र के अनुरूप है. द्रोपदी को निर्वस्त्र करने में व्यस्त कौरव दरबार क्या ही भिन्न रहा होगा!

दरअसल, महाभारत के आख्यान में न सिर्फ बलात्कार को सत्ता रणनीति के एक  स्वीकृत हथियार की मान्यता दी गयी है बल्कि बलात्कार की रोकथाम जैसा कोई विमर्श सिरे से ही नदारद मिलेगा. अब उन्नाव और कठुआ के गिर्द चल रहे विमर्श में रोकथाम का आयाम तो शामिल है पर रणनीति है वही महाभारत काल वाली.

भारतीय फिल्मों में ही देखिये! बलात्कार के प्रसंग लम्बे से लम्बे और अश्लील से अश्लील बनाकर परोसे जायेंगे जबकि प्रेम प्रसंगों में गाने गाये जायेंगे और आपसी सहमति से सेक्स नदारद होगा. यहाँ तक कि विवाहेतर स्वैच्छिक यौन संबंधों को बलात्कार बताने की होड़ में संसद ने स्त्री की सहमति की उम्र दो वर्ष बढ़ाकर 18 कर दी.

दो टूक शब्दों में, स्त्री सुरक्षा को डसने वाले दोमुंहे सत्ता आयामों का सहज प्रतिबिंब ही हैं उन्नाव और कठुआ, कोई अपवाद नहीं. लिहाजा, निरी लम्पटता को ही निशाना बनाते रहने से स्त्री के लिए सुरक्षा कवच नहीं गढ़े जा सकेंगे.

बेशक, मीडिया में दबंगवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता जैसे सत्ता स्रोतों और पुलिस व न्याय जैसी सत्ता प्रणालियों को वर्तमान सन्दर्भ में कोसा जा रहा है, लेकिन इन्हें सत्ता के मूल चरित्र से जोड़ कर ही स्त्री की असहायता को समझना होगा. उत्तर प्रदेश चुनाव के भाजपा पड़ाव से ही उन्नाव का मनबहलाव नहीं शुरू होता; न कठुआ की हैवानियत महज हिंदुत्व राजनीति की ही मोहताज है.

दरअसल, सत्ता राजनीति के खेल में तमाम दल एक ही दिशा में बढ़ रहे हैं, और वह स्त्री सुरक्षा की दिशा नहीं है. वैसे ही जैसे महाभारत की जद्दोजहद, स्त्री को इज्जत और पौरुष का प्रतीक बनाये रखने की थी, सशक्त करने की नहीं.

चाहें तो अनन्त काल तक बलात्कारी के प्रोफाइल पर बात कर सकते हैं, और चाहें तो वर्मा कमीशन के कठोर दंड क्रम को बढ़ाते हुये राज सत्ता बलात्कारी को फांसी लगानी भी शुरू कर दे; इनसे बलात्कार पर असर न पड़ा है और न ही पड़ेगा. क्योंकि, स्त्री तो कमजोर ही बनी रहेगी जबकि शक्तिशाली होता जायेगा वह राज्य जो निर्भया, उन्नाव और कठुआ को संभव करता आया है. पौराणिक युद्ध में पांडव विजय ने भी उस राजतंत्र को ही तो मजबूत किया जिसने द्रोपदी चीरहरण संभव किया था. क्या यह महज विडम्बना है कि जब गीता में कृष्ण ने तरह-तरह की मुक्ति का मार्ग प्रतिपादित किया, बलात्कार से मुक्ति की चर्चा तक नहीं की!

जिस समाज में द्रोपदी के सार्वजनिक दुष्कर्म के भागीदार युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, भीष्म, द्रोण, इत्यादि नायक के रूप में प्रतिष्ठित चले आ रहे हैं, वहां सेंगर (उन्नाव) और सांजी राम (कठुआ) की छिप कर की गयी यौनिक घात में स्वीकृत राजनीति देखने वाली विचारधारा का पनपना भी स्वाभाविक लग सकता है. बलात्कारियों के प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न समर्थन में जैसे आज हिंदुत्व रणनीति से प्रेरित तर्क हवा में हैं, द्रोपदी को लेकर महाभारत के सामंती किरदारों के भी अपने राजधर्म प्रेरित तर्क थे.

महाभारत काल से गंगा और मैली ही हुयी है. आइये, स्त्री सुरक्षा के सन्दर्भ में कहीं कारगर पहुँचना है तो सत्ता के व्यापक पड़ताल के परिप्रेक्ष्य में सोचें. मौजूदा सन्दर्भ में, जाति, धर्म और राजनीति जैसे विभाजक सत्ता केंद्र, यौनिक हिंसा को लेकर स्त्री के पक्ष में संतुलन नहीं बना पा रहे. परिवार और कानून जैसे यौनिक हिंसा से सीधे प्रभावित सत्ता केंद्र जरूर अपराध के बाद प्रतिशोधक और प्रतिपूरक कवायद में उतरते हैं. जाहिर है, यह काफी नहीं.

महाभारत युद्ध में मिली सम्पूर्ण विजय ने पांच पांडवों को इन्द्रप्रस्थ में ही नहीं, लोक मानस में भी शाश्वत सत्ता केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया. कुछ ऐसी ही स्थिति भारतीय समाज में जम कर पैर पसारे उपरोक्त पांच सत्ता केन्द्रों की भी है. पांडवों को समर्पित द्रोपदी की भांति इन सत्ता केन्द्रों को समर्पित मीडिया है जो उन्हें उकसाता भी है और अपना चीर हरण भी कराता है.

जाति के चौधरी, धर्म के ठेकेदार और सुषमा-सोनिया मार्का महिला राजनेता किसी लैंगिक क्रांति के लिए काम नहीं करने जा रहे. अरसा गुजरने के बाद, प्रधानमन्त्री मोदी ने विदेशी जमीन पर कठुआ-उन्नाव प्रकरणों को समाज के प्रति अपराध बताने की कूटनीतिक कवायद भर की है. मुख्यमंत्री महबूबा ने कठुआ में शिकार बनी बच्ची को माता वैष्णो देवी का रूप बताया और दिल्ली हाई कोर्ट ने उसकी पहचान जाहिर करने वाले मीडिया संस्थानों पर भारी जुर्माना ठोंक दिया. दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष मालीवाल दोषियों को छह माह में फांसी के कानून की मांग के साथ अनिश्चित उपवास पर बैठी हैं, और बलात्कारियों को निर्दोष बताने वाली मधु किश्वर को प्रशांत भूषण ने अदालत में खींच लिया. हालाँकि, क्या हम नहीं जानते कि कैसे भी दिखावे से अगले संभावित शिकारों की कतार छोटी होने नहीं जा रही?

ऐसे में तुरंत कदम चिह्नित किये जा सकते हैं जो पारिवारिक और क़ानूनी सत्ता को लिंग संवेदी रखने का काम कर सकें. हो सकता है, इसी क्रम में क्रमशः जातिवादी सत्ता, साम्प्रदायिक सत्ता और राजनीतिक सत्ता के लिंग निरपेक्ष होने का सिलसिला भी बने.

  1. कौरवों को कोसना बहुत हो लिया, पांडवों के चरित्र को भी विमर्श में लाना होगा. हर न्यायकर्मी के लिए, पुलिस, अभियोजक और जज समेत, संविधान मुताबिक प्रमाणित लिंग संवेदी होना अनिवार्य हो.
  2. द्रोपदी की न्याय दरबार में हाजिरी की फजीहत बंद होनी चाहिये. पुलिस, परामर्श, मुआवजा और न्यायालय समेत कानून के हर पक्ष को स्वयं रियल टाइम में चल कर यौन पीड़ित के दरवाजे पर आना पड़े.
  3. पांडवों के दांव पर द्रोपदी को छोड़ने के बजाय स्व-निर्भर द्रोपदी पर दांव लगाने की जरूरत है. लिहाजा, कारणों की भूल-भुलैया में उतरे बिना, स्त्री का पैतृक हिस्सा या तो उसके अपने हाथ में बने रहना चाहिए अन्यथा उसे राज्य बतौर जमानत जब्त कर ले.
  4. यौन हिंसा से बचने के जरूरी पूर्व उपाय के नाते, बच्चे को केंद्र में रखकर परिवार सुरक्षा परामर्शदाता और स्कूल सुरक्षा परामर्शदाता की सुविधा सरकार प्रदान कराये.
  5. परिवार और स्कूल से दूर श्रम/आवारगी में पिसते बच्चे, यौन उत्पीड़न के सर्वाधिक शिकार भी मिलेंगे. तमाम घोषित स्कीमों के बावजूद इनका इस रूप में पाया जाना ही सरकार से पर्याप्त मुआवजे का आधार हो. (साभार – मिडिया विजिल)



    (अवकाश प्राप्त आईपीएस विकास नारायण राय, हरियाणा के डीजीपी और नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद के निदेशक रह चुके हैं।)
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