प्रशांत टंडन

नितिन गडकरी फिर बोले हैं और कहा कि जनता सपने दिखा कर पूरे न करने वाले नेताओं की पिटाई भी करती है. ज़ाहिर है उनकी इस टिप्पणी को मोदी के ही संदर्भ में देखा जाएगा. पहले भी इसी तरह के बयान देकर वो मोदी को परोक्ष चुनौती दे चुके हैं.

क्या ये समझा जाये कि उन्हे आरएसएस से आगे बढ्ने का इशारा मिल गया है. गडकरी यशवंत सिन्हा या शत्रुघ्न सिन्हा नहीं है वो नेता के साथ साथ व्यापारी भी हैं और पीछे की कई जांच की वजह से कमजोर ज़मीन पर खड़े हैं. अगर वो ये जोखिम ले रहे हैं तो ज़रूर उनके पीछे कोई बड़ी ताकत है या अंदर ही अंदर बीजेपी में मोदी के खिलाफ एक दूसरी लॉबी बन गई है जो गडकरी का समर्थन कर रही है.

एक दूसरी संभवाना भी है जो हकीकत के ज्यादा करीब लगती है. गडकरी समझ गए हैं कि मोदी सत्ता में दोबारा नहीं आने जा रहे हैं और वो अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए अभी से मोदी से दूरी बनाये रखना चाहते है ताकि अगली सरकार के निशाने पर न हों.

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गडकरी से बेहतर ये कौन जानता होगा कि मनमोहन सिंह की सरकार में कोई ताकतवर व्यक्ति था जो अंदर रह कर मोदी की मदद कर रहा था. जनवरी 2013 में गडकरी का बीजेपी के अध्यक्ष पद के लिए दोबारा चुने जाना तय था. इस बात की भी चर्चा ज़ोरों पर थी कि अगर गडकरी अध्यक्ष बने रहते हैं तो मोदी के प्रधानमंत्री के कैंडीडेट बनने पर रोड़ा अटकायेंगे. फैसला बीजेपी पार्लियामेंटरी बोर्ड को करना था जिसमे आडवाणी लॉबी का दबदबा था.

23 जनवरी 2013 को बीजेपी अध्यक्ष पद के चुनाव की कुछ ही घंटे पहले गडकरी के पूर्ती ग्रुप की कंपनियों के दफ्तरों मे इनकम टैक्स के छापे पड़ गये. छापे एक साथ 11 जगहों पर पड़े थे. सबसे बड़े विपक्षी दल के अध्यक्ष की कंपनियों मे छापे डालने का फैसला किसी अधिकारी का तो नहीं होगा. रात में गडकरी की कंपनियों पर छापे पड़े और अगले दिन राजनाथ सिंह बीजेपी के अध्यक्ष बन गये और उसी के साथ मोदी का प्रधानमंत्री के कैंडीडेट बनने का रास्ता साफ हो गया. पी चिदंबरम उन दिनों वित्त मंत्री थे.

राजनीतिक महत्वाकांक्षा के साथ साथ पिछले अनुभव को देखते हुये वो अगली सरकार से अच्छे रिश्ते भी रखना चाहेंगे.

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