मेरा नाम राजीव शर्मा है और मेरा मुल्क हिंदुस्तान। मेरा शौक या कहिए पेशा एक ही है- लोगों को कहानियां सुनाना, क्योंकि इसके अलावा मुझे कुछ नहीं आता। पढ़ना बहुत पसंद है। अगर मेरा बस चले तो किसी लाइब्रेरी में घुस जाऊं और उसके दरवाजे पर ताला लगाकर चाबी अरब सागर में फेंक दूं। इसीलिए शादी नहीं करना चाहता, ताकि किताबों से की गई मुहब्बत का बंटवारा न हो जाए।
हिंदी और अंग्रेजी के अलावा कभी-कभार उर्दू पढ़ लेता हूं लेकिन बहुत कम। किताबों में गीता बहुत पसंद है, कुरआन भी बहुत अच्छी लगती है। बचपन में नाना की गोद में बैठकर तिथि-पंचांग और कुुंडली वगैरह पढ़ना सीखा। आज भी कई लोग आ जाते हैं तो पढ़ लेता हूं, मना नहीं करता।
खुदा ने मेरी कई दुआएं कबूल की, बस एक दुआ है जो आज तक अधूरी है। अगर वह पूरी नहीं हुई तो मौत के बाद उससे शिकायत करूंगा। ऐसा क्या है उस दुआ में कि मैं उसके लिए बेचैन हूं? उसे समझने के लिए मैं आपको दो छोटी-छोटी कहानियां सुनाऊंगा। तो ध्यान से सुनिए …।
पहली कहानी
वो मुसाफिर थे। एक पूरब से आया और दूसरा पश्चिम से। दोनों के साथ उनकी औरतें भी थीं। सफर के दौरान एक जंगल में उनकी मुलाकात हुई। दुआ-सलाम के बाद दोनों ने तय किया कि आज की रात जंगल में ही गुजारी जाए, अगले दिन अपनी-अपनी राह चले जाएंगे।
उनकी औरतों ने खाना पकाया, सबने भरपेट खाया। बातों ही बातों में पता चला कि पूरब से आए मुसाफिर का नाम रामू था और पश्चिम से आए मुसाफिर का नाम रहमान।
रामू ने झिझकते हुए कहा- मेरे पास सोने की ढेर सारी अशर्फियां हैं। बाप-दादा की यह दौलत कोई लूट न ले, क्या किया जाए?
रहमान ने कहा- मेरी बीवी के पास बहुत कीमती जेवरात हैं। मुझे भी उनकी फिक्र सता रही है।
अब तक दोनों परिवारों में भरोसा मजबूत हो चुका था, इसलिए दोनों ने तय किया कि आधे वक्त रामू पहरा देगा और आधे वक्त रहमान। बस इसी तरह रात बीत गई। सुबह रामू सोच रहा था, यह मुसाफिर कितना भला आदमी है! मेरी अशर्फियों के लिए रातभर जागता रहा। रहमान ने भी सोचा- अल्लाह हर इन्सान को ऐसा बना दे। मैं आराम करता रहा और यह पहरा देता रहा। ऐसे लोग कहीं और नहीं मिलेंगे।
अब बारी थी सफर की। दोनों परिवार साथ-साथ बैठे, एक-दूसरे का शुक्रिया अदा किया। फिर तय किया कि अब सफर नहीं करेंगे बल्कि यहीं घर बनाकर रहेंगे। दोनों परिवार वहीं रहने लगे। अब रामू रहमान का सहारा था और रहमान रामू का सच्चा पड़ोसी। किसी पर कोई मुसीबत आती तो दूसरा दीवार बनकर खड़ा हो जाता। ईद पर सेवइयां रामू के घर से आतीं और दिवाली पर मिठाई रहमान की बीवी बनाती।
दुनिया देख ले, ऐसा था मेरा भारत।
दूसरी कहानी
अब एक और कहानी सुनिए। यह कोई अलग कहानी नहीं है। इसमें रामू और रहमान की कुछ साल बाद की जिंदगी का लेखाजोखा है। उनका जंगल अब खूबसूरत गांव बन चुका था। एक दिन डाकुओं के झुंड की नजर वहां चली गई। सोचने लगे, यहां माल पर हाथ कैसे साफ हो? क्यों न मौका पाकर धावा बोला जाए!
डाकुओं ने धावा बोला, लेकिन दोनों परिवारों ने उनकी खूब ठुकाई की। डाकुओं के सरदार की तो ऐसी मरम्मत की गई कि वह कई दिनों तक गर्म दूध में हल्दी मिलाकर पीता रहा। तब एक बूढ़े डाकू ने उन्हें समझाया- देखो, यहां तुम्हारी तरकीब काम न आएगी। मेरी बात मानो, तुम सब यहीं रहो। मुझे जाने दो। मैं भेष बदलने में माहिर हूं। दोनों पर ऐसा जादू चलाऊंगा कि निन्यानवे के फेर से बाहर नहीं निकल पाएंगे।
डाकू बोले- अच्छा बाबा, तुम जाओ।
दूसरे दिन डाकू नकली दाढ़ी लगाकर रहमान के घर गया। बातों ही बातों में कहा- रहमान मियां, यहां किस काफिर के साथ पड़े हो? क्या दुनिया के लिए दीन को भी भूल गए? चलो, हमारे गरीबखाने में रहो। वहां मौज ही मौज है।
जी शुक्रिया, लेकिन हम यहां बहुत खुश हैं। मेहरबानी कर मेरे दोस्त को काफिर न कहें- रहमान बोला।
सो तो ठीक है, मगर याद रखो, कल को उस काफिर के बच्चे पैदा होंगे तो तुम्हें कान पकड़कर निकाल देंगे। फिर हमसे पनाह न मांगना। इसीलिए कहता हूं, ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करो, ताकि पूरे रौब से जिंदा रह सको। वर्ना किसी दिन निकाल दिए जाओगे।
शिकारी ने जाल फेंक दिया था। अब रहमान ने फैसला कर लिया- मेरे कम से कम दस बच्चे पैदा होने चाहिए, ताकि घर महफूज रहे।
बूढ़ा डाकू रामू के घर भी पहुंच गया। माथे पर ढेर सारा चंदन और हाथ में कमंडल लिए वह हिमालय से आया कोई सिद्ध महात्मा लग रहा था। साधु बोला- रामू, क्यों यह श्रेष्ठ जन्म भ्रष्ट कर रहे हो? तुम्हारा वह पड़ोसी कभी वफादार नहीं होगा। तुम पूरब से आए हो, यह सूर्यदेव की दिशा है। वह तो पश्चिम की ओर सिर झुकाता है।
तो क्या हुआ? पश्चिम दिशा भी तो नारायण ने ही बनाई है! रामू ने जवाब दिया।
साधु ने कई पांसे फेंके, लोक-परलोक का भय दिखाया, गंगा की कसम दिलाई, पर रामू नहीं डिगा। फिर साधु ने अंतिम दांव चला। बोला- रहमान के यहां आबादी बढ़ती जा रही है। वह दिन दूर नहीं जब उसकी औलादें तुम्हें धक्का मारकर बाहर निकालेंगी। इसीलिए कहता हूं, खूब-खूब बच्चे पैदा करो, वर्ना तुम अल्पसंख्यक हो जाओगे।
रामू चिंतित हो गया। अब उसे साधु की सभी बातें सच लगने लगीं। उसने तय कर लिया, मेरे कम से कम दस बच्चे होने चाहिए, तभी रहमान काबू में आएगा।
नफरत की आग दोनों ओर लगी थी। कुछ साल में ही दोनों परिवार जानी दुश्मन बन गए। दोनों घरों में औलादें खूब हो गईं लेकिन काबिल बहुत कम। कोई जुआ खेलता, किसी पर शराब की मस्ती चढ़ती। किसी पर झगड़े का उन्माद सवार था, कोई जेब काटने में माहिर हो गया। पढ़ाई-लिखाई का कोई इंतजाम नहीं था। भुखमरी के हालात पैदा हो गए। इक्का-दुक्का जो काबिल व समझदार थे, वे परदेस चले गए और वहीं कारोबार करने लगे। पीछे रह गई ऐसी भीड़ जो आए दिन झगड़ा-फसाद करती। कोई खंजर निकालकर कहता- गांव में मस्जिद बनकर रहेगी। कोई तलवार लहराकर चुनौती देता- यहां मंदिर के अलावा कुछ और बना तो ढहा देंगे।
इन हालात पर डाकुओं की कड़ी नजर थी। मौका देखकर उन्होंने अपना पेशा बदल लिया। अब वे नेता बन गए। उन्होंने अलग-अलग नाम से कई पार्टियां बनाईं। एक पार्टी को खास कौम की फिक्र सताने लगी, दूसरी पार्टी कहती- हमसे बढ़कर संस्कृति का रक्षक कोई नहीं है। दोनों में गर्मागर्म बहस होती, आए दिन दंगे छिड़ते।
एक दिन रहमान की औलादों ने अपनी चहेती पार्टी के नेता को बुलाकर कसम खाई- हम मस्जिद के लिए हजार साल तक लड़ेंगे। लीजिए, ये हैं हमारी अम्मीजान के जेवरात। हम घास खाकर गुजारा कर लेंगे, बस आप तो कौम का सिर न झुकने दें।
नेता तमाम जेवरात ले गया। यह खबर आग की तरह फैल गई। अगले ही दिन दूसरी पार्टी का नेता रामू के घर आया। चिल्ला-चिल्लाकर बोला, घोर कलियुग है! हम हमारी जमीन पर मंदिर नहीं बना सकते। भगवान को क्या हिसाब देंगे?
तभी रामू ने अपनी बीवी का बक्सा लाकर पटका। उसमें ढेर सारी अशर्फियां थीं। नेता को सौंपते हुए बोला- मैं आने वाली सभी पीढ़ियां इस मंदिर के लिए बलिदान कर सकता हूं। फिर यह धन-दौलत किस काम की? आप मंदिर के लिए धर्मयुद्ध कीजिए।
नेता वह माल लेकर चंपत हो गया। घर पहुंचा तो देखा, शराब की पार्टी हो रही है। क्या पक्ष और क्या विपक्ष, सभी जाम छलका रहे थे। रसोई में मुर्गा पक रहा था। तिजोरी में रहमान की बीवी के गहने रखे थे। उन्हीं पर रामू की अशर्फियों का ढेर लगा दिया। फिर वह नेता महफिल में शामिल हो गया। आज उसे पता चला, जिन पड़ोसियों को एक-दूसरे की शक्ल में दुश्मन नजर आता है, उन पर डाकू भी हुकूमत कर सकते हैं।
दुनिया देख ले, ऐसा है मेरा भारत।
सबक
– रामू और रहमान इस मुल्क के हिंदू और मुसलमान हैं।
– डाकू कौन हैं, मैं उनकी पुख्ता पहचान नहीं बता सकता। आप आस-पास देखिए, शायद मिल जाएं।
– बात कड़वी है, पर सच है। अधिकांश हिंदू और मुसलमानों के लिए औरतें इन्सान कम, बच्चे पैदा करने की मशीनें ज्यादा हैं।
– मैं खुदा से कहना चाहता हूं, बच्चे पैदा करने की जिम्मेदारी अब मर्दों पर डाले और भारत के हर मर्द से कम से कम पांच बच्चे पैदा करवाए। फिर देखते हैं, कितने धर्मगुरु हमें ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की नसीहत देते हैं।
– जिन पड़ोसियों को एक-दूसरे की शक्ल में दुश्मन नजर आता है, उन पर डाकू भी हुकूमत कर सकते हैं।
– मैं पहली कहानी को सच होते देखूं, यही मेरी दुआ है।

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