1846 से 1858 तक फ़ारुख़ाबाद रियासत के नवाब रहे नवाब तफ़ज़्ज़ुल हुसैन ख़ान को अंग्रेज़ो ने जंग ए आज़ादी की पहली लड़ाई में क्रांतिकारियों की मदद करने के जुर्म में सज़ाए मौत दी थी, पर बाद में ये सज़ा घटा दी गई और उन्हे मुल्क बदर कर अदन भेज दिया गया; जहां से वो मक्का गए और वहीं 19 फ़रवरी 1882 इंतक़ाल कर गए।

“Selections from the Poetry of the Afghans” के लेखक Major Raverty फ़ारूखा़बाद के नवाब तफ़ज़्ज़ुल हुसैन ख़ान की ग़िरफ़्तारी और मुल्क बदरी को कुछ यूं लिखते हैं :-

मुझे वो वक़्त याद है जब मै पंजाब में तैनात था और मेरे ही रेजिमेंट के सिपाही फ़ारूखा़बाद के नवाब तफ़ज़्ज़ुल हुसैन ख़ान को बेड़ियों से जकड़े हुए हिन्दुस्तान के पश्चिम इलाक़े नासिक की ग़लियों से गुज़ार रहे थे, ताके उन्हे मक्का भेजा जा सके।

अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ बग़ावत में हिस्सा लेने के जुर्म में इन्हे मुल्क बदर की सज़ा सुनाई गई थी और उन्होने नवाब साहब की ख़्वाहिश पर मक्का भेजने का फ़रमान जारी किया। और उनकी रवानगी के इंतेज़ामात की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गई।

शुरु में इन्हे मौत की सज़ा सुनाई गई थी। पर बाद में जिला वतन करने की सज़ा सुनाई गई! इसके बाद उन्हे मौक़ा दिया गया के जिला वतनी के लिए वो ख़ुद मुल्क का चुनाव कर लें। जिस पर नवाब साहब ने मक्का जाने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की, और अंग्रेज़ी हुकुमत ने उनकी ख़्वाहिश पुरी कर दी।

नासिक की गलियों में मैने उससे कुछ देर बात की; जिसे उसने ग़ौर से सुना फिर कहने लगा “एक ज़माने तक मै ये समझता रहा के मै ही सब कुछ हुं, लेकिन जब बदनसीबी घर में बसेरा कर ले तो इंसान सेवाये तबाही व बर्बादी के और क्या तवक़्क़ो कर सकता है?”

नवाब साहब तीस साल के उमर के एक ख़ूबसुरत मगर थोड़े से बेवक़ूफ़ इंसान थे। उस वक़्त वो मुझे एक बदनसीब और दिल शिक्सात इंसान नज़र आ रहे थे।

नवाब साहब सिर्फ़ नाम के ही अफ़्ग़ान थे; क्युं के उनकी पिछली नस्ल सदियों से हिन्दुस्तान में रह कर पुरी तरह यहीं घुल मिल कर बिलकुल बदल गई थी।। बाद में मुझे पता चला के मक्का में उनका गुज़र बसर ख़ैरात और सदक़ात पर होता है!

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