रवीश कुमार

हमारा चैनल अब कई शहरों में नहीं आता है। इससे काम करने के उत्साह पर भी असर पड़ता है। शहर का शहर नहीं देख पा रहा है, सुनकर उदासी तो होती है। इससे ज्यादा उदासी होती है कि संसाधन की कमी के कारण आपके द्वारा भेजी गई हर समस्या को रिपोर्ट नहीं कर पाते। कई लोग नाराज़ भी हो जाते हैं। कोई बेगुसराय से चला आता है तो कोई मुंबई से ख़बरों को लेकर चला आता है। उन्हें लौटाते हुए अच्छा नहीं लगता। आपमें से बहुतों को लगता है कि हर जगह हमारे संवाददाता हैं। सातों दिन, चौबीसों घंटे हैं। ऐसा नहीं है। दिल्ली में ही कम पड़ जाते हैं। जिन चैनलों के पास भरपूर संसाधन हैं उन्हें आपसे मतलब नहीं है। आप एक एंकर का नाम बता दें तो सुबह चार घंटे लगाकर सैंकड़ों लोगों के मेसेज पढ़ता है। इसलिए धीरज रखें। मेरा सवाल सिस्टम से है और मांग है कि सबके लिए बेहतर सिस्टम हो। आपमें से किसी की समस्या को नहीं दिखा सका तो तो आप मुझे ज़रूर उलहाना दें मगर बात समझिए कि जो दिखाया है उसी में आपका सवाल भी है।

आपके मेसेज ने पत्रकारिता का एक नया मॉडल बना दिया है। उसके लिए मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करना चाहता हूं और प्रणाम करना चाहता हूं। स्कूल सीरीज़, बैंक सीरीज़, नौकरी सीरीज़, आंदोलन सीरीज़ ये सब आप लोगों की बदौलत संभव हुआ है। ज़रूर दो तीन जुनूनी संवाददाताओं का साथ मिला है मगर इसका सारा श्रेय आप पब्लिक को जाता है।दुनिया का कोई न्यूज़ रूम इतनी सारी सूचनाएं एक दिन या एक हफ्ते में जमा नहीं कर सकता था। महिला बैंकरों ने अपनी सारी व्यथा बताकर मुझे बदल दिया है। आप सभी का बहुत शुक्रिया। हर दिन मेरे फोन पर आने वाले सैंकड़ों मेसेज से एक पब्लिक न्यूज़ रूम बन जाता है। मैं आपके बीच खड़ा रहता हूं और आप एक क़ाबिल संवाददाताओं की तरह अपनी ख़बरों की दावेदारी कर रहे होते हैं। मुझे आप पर गर्व है। आपसे प्यार हो गया है। कल एक बुजुर्ग अपनी कार से गए और हमारे लिए तस्वीर लेकर आए। हमारे पास संवाददाता नहीं था कि उसे भेजकर तस्वीर मंगा सकूं। इसलिए मेरी किसी भी तारीफ में आप जैसे लोगों की हिस्सेदारी ज़्यादा है। यह बात मैं आपसे वोट लेने या अच्छी बात कह कर उल्लू बनाने के लिए नहीं कह रहा। यही सच है इसलिए कह रहा हूं।

जब मीडिया हाउस खत्म कर दिए जाएंगे या जो पैसे से लबालब हैं अपने भीतर ख़बरों के संग्रह की व्यवस्था ख़त्म कर देंगे तब क्या होगा। इसका जवाब तो आप दर्शकों ने दिया है। आपका दर्जा मेरे फ़ैन से कहीं ज़्यादा ऊंचा है। आप ही मेरे संपादक हैं। कई बार मैं झुंझला जाता हूं। बहुत सारे फोन काल उठाते उठाते, उसके लिए माफी चाहता हूं। आगे भी झुंझलाता रहूंगा मगर आप आगे भी माफ करते रहिएगा। यही व्यवस्था पहले मीडिया हाउस के न्यूज़ रूम में होती थी। लोगों के संपर्क संवाददाताओं से होते थे। मगर अब संवाददाता हटा दिए गए हैं। स्ट्रिंगर से भी स्टोरी नहीं ली जाती है। जब यह सब होता था तो न्यूज़ रूम ख़बरों से गुलज़ार होता था। अब इन सबको हटा कर स्टार एंकर लाया गया है।

मुस्लिम परिवार में शादीे करने के इच्छुक है तो अभी फोटो देखकर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें 

आपसे एक गुज़ारिश है। आप किसी एंकर को स्टार होने का अहसास न कराएं। मुझे भी नहीं। ऐसा करके आप मीडिया के भीतर के पाप को मान्यता दे रहे होते हैं। ये एंकर अब जन विरोधी गुंडे हैं। मैं यह बात किसी उतावलेपन से नहीं कहता, एक दिन जब आपके भीतर का सियासी और धार्मिक उन्माद थमेगा तब मेरी हर बात याद आएगी। ये एंकर अब हर दिन सत्ता के इशारे पर चलने वाले न्यूज रूम में हाज़िर होते हैं। प्रसून ने हाल ही में कहा था कि पीएमओ से फोन आते हैं ख़बरों को चलाने गिराने के लिए। कोबरा पोस्ट के स्टिंग में आपने देखा ही कैसे पैसे लेकर हिन्दू मुस्लिम किए जाते हैं। इस सिस्टम के मुकाबले आप दर्शकों ने जाने अनजाने में ही एक न्यूज़ रूम विकसित कर दिया है जिसे मैं पब्लिक न्यूज़ रूम कहता हूं। बस इसे ट्रोल और ट्रेंड की मानसिकता से बचाए रखिएगा ताकि खबरों को जगह मिले न कि एक ही ख़बर भीड़ बन जाए।

मैंने सोचा है कि अब से आपकी सूचनाओं की सूची बना कर फेसबुक पर डाल दूंगा ताकि ख़बरों को न कर पाने का अपराधबोध कुछ कम हो सके। यहां से भी लाखों लोगों के बीच पहुंचा जा सकता है। ऐसी बातें कोई एंकर पब्लिक में नहीं कहता मगर मुझे तो आप लोगों ने बनाया है। इसलिए आपसे कह रहा हूं। कभी आकर आप मेरी दिनचर्या देख लें। एक न्यूज़रूम की तरह अकेला दिन रात जागकर काम करता रहता हूं। उसके बीच खुद ही निराशा हताशा से जूझता रहता हूं। कोई बंदा ताकतवर नहीं होता है। जो ताकतवर हो जाता है वो किसी की परवाह नहीं करता। मैं नहीं हूं इसलिए छोटी छोटी बातों का असर होता है। आज कल इस लोकप्रियता को नोचने के लिए एक नई जमात पैदा हो गई है जो मेरा कुर्ता फाड़े रहती है। यहां भाषण वहां भाषण कराने वाली जमात। एक दिन इससे भी मुक्ति पा लूंगा। आप चिन्ता न करें। शनिवार रविवार आता नहीं कि याद आ जाता है कि कहीं भाषण देने जाना है। उसके लिए अलग से तैयारी करता हूं जिसके कारण पारिवारिक जीवन पूरा समाप्त हो चुका है। जल्दी ही आप ऐसे भाषणों को लेकर आप एक अंतिम ना सुनेंगे। साल में दो चार से ज़्यादा नहीं करूंगा। अगर आप मेरे मित्र हैं तो प्लीज़ मुझे न बुलाएं। कोई अहसान किया है तब भी न बुलाएं। मैं अब अपनी आवाज़ सुनूंगा। रोने जैसी हालत हो गई है मेरी। अकेला आदमी इतना बोझ नहीं उठा सकता है। गर्दन में दर्द है। कमर की हालत खराब है। चार घंटे से ज्यादा सो नहीं पाता। हर कोई खबर भेज कर और बुलाने का प्रस्ताव भेज कर मुझ पर ना कहने के अपराध बोध का जिम्मा डाल देता है, यह आप ठीक नहीं कर रहे हैं।

आप सब मुझे बहुत प्यार करते हैं, थोड़ा कम किया कीजिए, व्हाट्स अप के मेसेज डिलिट करते करते कहीं अस्पताल में भर्ती न हो जाऊं। इसलिए सिर्फ ज़रूरी ख़बरें भेजा करें। बहुत सोच समझ कर भेजिए। मुझे जीवन में बहुत बधाइयां मिली हैं, अब रहने दीजिए। मन भर गया है। कोई पुरस्कार मिलता है तो प्राण सूख जाता है कि अब हज़ारों बधाइयों का जवाब कौन देगा, डिलिट कौन करेगा। मुझे अकेला छोड़ दीजिए। अकेला रहना अच्छा लगता है। अकेला भिड़ जाना उससे भी अच्छा लगता है। गुडमार्निग मेसेज भेजने वालों को शर्तियां ब्लाक करता हूं। बहुतों को ब्लाक किया हूं। जब नौकरी नहीं रहेगी तब चेक भेजा कीजिएगा! तो हाज़िर है पब्लिक न्यूज़ रूम में आई ख़बरों की पहली सूची।

उत्तर प्रदेश में बेसिक टीचर ट्रेनिंग कोर्स एक पाठ्यक्रम है। प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक की नौकरी पाने के लिए यह कोर्स करना होता है। प्राइवेट कालेज में एक सेमेस्टर की फीस है 39,000 रुपए। राज्य सरकार हर सेमेस्टर में 42,000 रुपये भेजती है। मगर इस बार छात्रों के खाते में 1800 रुपये ही आए हैं। छात्रों का कहना है कि अगले सेमेस्टर में एडमिशन के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। आगरा के एम डी कालेज के छात्र ने अपनी परेशानी भेजी है। उनका कहना है कि प्राइवेट और सरकारी कालेज के छात्रों के साथ भी यही हुआ है।

छात्र ने बताया कि बेसिक टीचर ट्रेनिंग का नाम सत्र 2018 से बदलकर डिप्लोमा इन एलिमेंट्री एजुकेशन कर दिया है। इसमें राज्यभर में 2 लाख छात्र होंगे। अब जब 2 लाख छात्र अपने साथ होने वाली नाइंसाफी से नहीं लड़ सकते तो मैं अकेला क्या कर सकता हूं। इन्होंने कहा है कि मैं कुछ करूं तो मैं लिखने के अलावा क्या कर सकता हूं। सो यहां लिख रहा हूं।

बिहार से 1832 कंप्यूटर शिक्षक चाहते हैं कि मैं उनकी बात उठाऊं। लीजिए उठा देता हूं। ये सभी पांच साल से आउटसोर्सिंग के आधार पर स्कूलों में पढ़ा रहे थे। मात्र 8000 रुपये पर। अब इन्हें हटा दिया गया है। आठ महीने से धरने पर बैठे हैं मगर कोई सुन नहीं रहा है। इन्हें शिक्षक दिवस के दिन ही हटा दिया गया। कई बार लोग यह सोचकर आउटसोर्सिंग वाली नौकरी थाम लेते हैं कि सरकार के यहां एक दिन परमानेंट हो जाएगा। उन्हें आउटसोर्सिंग और कांट्रेक्ट की नौकरी को लेकर अपनी राजनीतिक समझ बेहतर करनी होगी। नहीं कर सकते तो उन्हें रामनवमी के जुलूस में जाना चाहिए जिसकी आज कल इन 1832 कंप्यूटर शिक्षकों की भूखमरी से ज़्यादा चर्चा है। ऐसा कर वे कम से कम उन्माद आधारित राजनीति के लिए प्रासंगिक भी बने रहेंगे। नौकरी और सैलरी की ज़रूरत भी महसूस नहीं होगी क्योंकि उन्माद की राजनीति अब परमानेंट है। उसमें टाइम कट जाएगा। सैलरी की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। वैसे इन शिक्षकों ने एक ट्विटर हैंडल भी बनाया है जहां वे मुख्यमंत्री को टैग करते रहते हैं। मगर कोई नहीं सुनता है। पचास विधायकों ने इनके लिए लिखा है मगर कुछ नहीं हुआ। ये सांसद विधायक भी किसी काम के नहीं है। पत्र लिखकर अपना बोझ टाल देते हैं।

हज़ारों की संख्या में ग्रामीण बैंक के अधिकारी और कर्मचारी तीन दिनों से हड़ताल पर हैं मगर इन्हें सफलता नहीं मिली है। रिटायरमेंट से पहले एक लाख रुपये की सैलरी होती है और रिटायर होने के अगले ही महीने इनकी पेंशन 2000 भी नहीं होती है। बहुत से बुज़ुर्ग बैंकरों की हालत ख़राब है। कोई 2000 में कैसे जी सकता है। आप नेताओं की गाड़ी और कपड़े देखिए। अय्याशी चल रही है भाई लोगों की। ज़ुबान देखिए गुंडों की तरह बोल रहे हैं। आपका सांसद और विधायक पेंशन लेता है और आप से कहता है कि पेंशन मत लो। यह चमत्कार इसलिए होता है क्योंकि आप राजनीतिक रूप से सजग नहीं है। आखिर ऐसा क्यों है कि सरकारें किसी की नहीं सुनती तो फिर क्यों इन दो कौड़ी के नेताओं के पीछे आप अपना जीवन लगा देते हैं।

कटिहार मेडिकल कालेज के छात्र लगातार मेसेज कर रहे हैं। वहां डॉक्टर फैयाज़ की हत्या हो गई थी। कालेज प्रशासन ख़ुदकुशी मानता है। फ़ैयाज़ की हत्या को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं। कैंडल मार्च कर रहे हैं। बहुत दुखद प्रसंग है। गोपालगंज, कटिहार में भी छात्रों ने प्रदर्शन किया है। दोस्तों अपनी लड़ाई में मेरे इस लेख को ही शामिल समझना। मिलने की ज़रूरत नहीं है न बार बार मेसेज करने की। काश संसाधनों वाले चैनल के लोग आपकी खबर कर देते तब तक आप अपने घरों से हर न्यूज़ चैनल का कनेक्शन कटवा दें। एक रुपया चैनलों पर ख़र्च न करें।

अनवर बर्ख़ास्त हो गया, अनिल बच गया। हांसी से किसी पाठक ने दैनिक भास्कर की क्लिपिंग भेजी है। खबर में लिखा गया है कि गवर्नमेंट पी जी कालेज प्रशासन ने प्रोग्रेसिव स्टुडेंट यूनियन के सदस्य अनवर को बर्ख़ास्त कर दिया और एक अन्य सदस्य अनिल को चेतावनी दी है। अच्छी बात है कि सभी छात्रों ने इसका विरोध किया है और प्रिंसिपल सविता मान से मिलकर आंदोलन की चेतावनी दी है। भास्कर ने लिखा है कि कालेज के इतिहास विभाग ने 22 मार्च को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत के मौके पर भाषण प्रतियोगिता कराई थी। कार्यक्रम में प्रोगेसिव स्टुडेंट्स फ्रंट के सदस्यों ने पुस्तक प्रदर्शनी लगाई। भगत सिंह की जेल डायरी,दस्तावेज़ व अन्य प्रगतिशील पत्रिकाएं रखी गईं। छात्रों ने कहा कि प्रिंसिपल ने क्रायक्रम के बीच से ही सब हटवा दिया। छात्रों के आई कार्ड छीन लिया। इसके बाद नोटिस लगाया गया जिसने अनवर का नाम काटने और अनिल को चेतावनी देने की बात लिखी हुई है। छात्रों ने विरोध किया है। प्रिंसिपल ने कहा कि अनवर अनुशासनहीनता करता है। प्राध्यापकों की बात नहीं मानता है। दीवार पर पोस्टर चिपका देता है। उसे कई बार चेतावनी दी गई मगर नहीं माना। हमने भास्कर की ख़बर यहां उतार दी।

Loading...