Sunday, November 28, 2021

कठुआ रेप केस: धर्मध्वजा की ओट में बलात्कारी!

- Advertisement -

2013 का अक्टूबर था वह। गुलमर्ग में पहली बार देखी उनकी खाली झोपड़ी। न कोई दरवाज़ा न सुरक्षा न मनुष्य। पता किया तो पता चला जम्मू और कश्मीर की घूमन्तु गूजर तथा बकरवाल जातियों की जीवनशैली। थोड़े से बर्तन, भेड़-बकरियाँ और चरैवेति का जीवन। मौसम के हिसाब से तो कभी हालात के हिसाब से। मान्यता है कि मूलतः ये काठियावाड़ क्षेत्र के राजपूत थे जो सातवीं-आठवीं शताब्दी में कश्मीर पलायित हो गए थे। कल्हण के यहाँ इनके नौवीं-दसवीं शताब्दी में कश्मीर के सीमावर्ती प्रदेशों में निवास का ज़िक्र आता है।

चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में इन्होने इस्लाम अपना लिया लेकिन वहाँ भी उन्हें कोई सम्मानजनक जगह नहीं मिली।  देखें तो आबादी के लिहाज से राज्य में बीस फ़ीसद हैं ये, प्रतिनिधित्व उस हिसाब से बहुत-बहुत कम । गूजर समुदाय फिर भी राज्य की सत्ता में थोड़ी बहुत भागीदारी रखता है, लेकिन बकरवाल तो पूरी तरह से ख़ानाबदोश जीवन जीने के लिए ही जाने जाते रहे हैं। उनकी शिक्षा का स्तर बहुत नीचा है और रोज़गार के नाम पर भेड़-बकरी पालन ही है। । प्रदेश के साम्प्रदायिक बँटवारे में भी कहीं बहुत फिट नहीं बैठते ये। हिन्दू तो नहीं ही हैं और उतने मुसलमान कभी हो न सके। बराबरी का संदेश लेकर आए इस्लाम के लिए भी वे बाहरी ही रहे – अशराफ़ और सादात के सामने नीच जात! हालाँकि 1991 में ही इन्हें अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक पहचान मिल सकी। और फिर इस हिन्दू-मुस्लिम बाइनरी के साथ आज़ादी-राष्ट्रवाद-पाकिस्तान वगैरह की बहुस्तरीय बाइनरी में भी वह कहीं सेट नहीं होते। सेना के साथ उनके रिश्ते हमेशा से अलग रहे हैं। 1965 मे जब पाकिस्तान ने हमला किया तो मोहम्मद दीन नाम के गुज्जर ने ही तन्मर्ग के पास पाकिस्तानी हलचल देखकर भारतीय सेना को ख़बरदार किया था। 1971 हो कि कारगिल, हर बार दुर्गम पहाड़ों मे अपने जानवर लिए घूमते गूजर-बकरवाल भारतीय सेना के लिए गुप्तचर और संदेशवाहक की भूमिका निभाते रहे हैं। कोई याद करे तो नब्बे के दशक के आरंभिक खूनी वर्षों में आतंकवाद का शिकार होने वाले लोगों में गूजर समुदाय के अत्यंत प्रतिष्ठित नेता क़ाज़ी निसार अहमद भी थे।

लेकिन सांप्रदायिकता जब अपने सबसे नंगे रूप में सामने आती है तो उसे सिर्फ़ बायनरी चाहिए होती है, हम और वे। अपने और पराये। दोस्त और दुश्मन। तो उस रिटायर्ड राजस्व अफसर संजी राम के लिए आसिफा सिर्फ़ मुसलमान थी। उस बूढ़े हवसी के लिए आठ साल की आसिफा सिर्फ़ एक मादा थी। उस राक्षस के लिए अपना नाबालिग भतीजा भी एक लिंग से आगे क्या था जिसे उसने आठ साल की लड़की से बलात्कार के लिए प्रोत्साहित किया। मंदिर भी क्या था उसके लिए बलात्कार के लिए सुरक्षित जगह से ज़्यादा? तो मंदिर के प्रार्थनाकक्ष को उसने बलात्कार कक्ष बना दिया। जिस उम्र के बच्चों को आप पढ़ने-लिखने और मनुष्य बनने के लिए शिक्षा देते हैं उस उम्र के भतीजे को बलात्कारी बना दिया और आड़ लेने के लिए क्या है? धर्म? वह पुलिस अफ़सर दीपक खजूरिया! जिसके कन्धो पर संविधान का बैच लगा था! उसे कई दिनों से बंधक बनाकर भूखी रखी गई, नशे की गोलियों से बेहोश रखी गई अनेक दरिंदों से बलत्कृत आठ साल की लड़की को देखकर न क़ानून याद आया, न मनुष्यता, न कोई दया, न फर्ज़। धर्म की आड़ में वे सब पुरुष एक लिंग मे बदल गए। एक कायर लिंग। एक अमानवीय लिंग। एक दरिंदा लिंग जिसके समक्ष सब भोग्य है, सिर्फ़ भोग्य। एक बार फिर दरिंदगी का नंगा नाच और फिर पत्थरों से मार्कर मंदिर के प्रांगण मे ही लड़की की हत्या। कौन सा देवता था वह जिसे यह बलि स्वीकार थी?

अगर यहीं ख़त्म हो गई होती बात और अपराधी जेल के सींखचों में होते तो इसे कुछ दरिंदों की कारस्तानी समझा जा सकता था। लेकिन धर्म के दलालों ने इसे धर्म की ध्वजा मे तब्दील कर दिया। जिस धर्म का गुण गाते हैं आप, जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम की बात करते हैं, यत्र नार्यस्तु पूज्यते दुहराते हैं, द्रोपदी की लाज बचाते कृष्ण को देवता की तरह पूजते हैं, नवरात्रों पर कन्याओं को भोज करा उनके पाँव पखारते हैं वहीं आठ साल की बच्ची के साथ हुई इस नृशंस कार्यवाही को जम्मू के हिन्दू संगठन एक धार्मिक कार्यवाही में बदल देते हैं। तिरंगा और भगवा जिन्हें उस लड़की का पर्दा बन जाना था, बलात्कारियों का रक्षा कवच बनाए जाते हैं क्योंकि उस अबोध का नाम आसिफ़ा था! कन्हैया पर कोर्ट में हमला करने वाले वकीलों की एक प्रजाति वहाँ भी है जो आरोप पत्र दाखिल करने मे बाधा पहुंचाती है! और यह सब धर्म के नाम पर। धारयति इति धर्म: जो धारण किया जाता है वही धर्म है… महाभारत कहता है – धारणात् धर्म इत्याहुः धर्मो धारयति प्रजाः / यः स्यात् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः अर्थात्—’जो धारण करता है, एकत्र करता है, उसे ”धर्म” कहते हैं। धर्म प्रजा को धारण करता है। जिसमें प्रजा को धारण कर एकसूत्र में बाँध देने की सामर्थ्य है, वह निश्चय ही धर्म है।’ तो यह बलात्कार के समर्थन में एक हो गया है जो वह क्या है? धर्म-अधर्म? राष्ट्र-द्रोह? नीति-अनीति? यहाँ यह सवाल तो बेमानी ही होगा कि सदा सेना के सहाय रहे बकरवाल समुदाय के साथ यह हरक़त राष्ट्रद्रोह है या राष्ट्रप्रेम सवाल तो यह है कि क्या दुश्मन के साथ भी कोई ऐसी कार्यवाही को न्यायसंगत ठहरा सकता है, वह तो ख़ैर आठ साल की मासूम बच्ची थी अरक्षित।

और रुकिए। आसिफा सुनकर चैन की नींद न सो जाइए कि आपकी बेटी का नाम अलग है उससे। जम्मू से बहुत दूर नहीं रहा अब उन्नाव जहाँ आपकी बेटी जैसे नाम वाली एक बेटी मुख्यमंत्री के घर से गुहार लगाकर लौटी तो उसे अपने पिता की देह मिली…देह जो पिटाई से लाश में बदल गई थी। उसके बलात्कारी ने भी राम की ही ओट ली है….और सोचिए कि कैसे आपने अपने मन्दिर, अपने राम, अपनी भावनाएं दरिंदों को सौंप दी।

(कवि- लेखक अशोक कुमार पाण्डेय अपने सामाजिक सरोकारों के लिए  जाने जाते हैं। हाल ही में प्रकाशित उनकी किताब  ‘कश्मीरनामा: इतिहास और समकाल’ काफ़ी चर्चित हुई है। )

- Advertisement -

[wptelegram-join-channel]

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot Topics

Related Articles