चलिए, मान लेते हैं कि यूपी की दोनों सीटें बीजेपी हार गई है। काउंटिंग तो होती रहेगी। अब सोचिए, ये हार किसकी है? बीजेपी की? मोदी की? हिंदुत्‍व की? इनमें से किसी की नहीं। एक बार पीछे मुड़ कर साल भर पहले जाइए और देखिए कि किन परिस्थितियों में योगी आदित्‍यनाथ मुख्‍यमंत्री बने थे। लोक कल्‍याण मार्ग से आशीर्वाद लेकर मनोज सिन्‍हा बनारस जाकर बाबा विश्‍वनाथ के यहां मत्‍था टेक चुके थे। सब कुछ सेट था, कि योगी ने लकडी लगा दी। मीटिंग से तमतमा कर चले आए धमकी देकर कि फलाना-फलाना एमएलए मेरे साथ हैं, देख लो। आनन-फानन में अमित शाह ने चार्टर्ड प्‍लेन भिजवाकर योगी को बुलवा लिया था। उसके बाद की कहानी सब जानते हैं। मनोज सिन्‍हा का पत्‍ता कट गया। उत्‍तर प्रदेश योगी का मठ बन गया। योगी फॉर पीएम का नारा लगने लगा।

अब छह महीना पहले आइए। योगी गाजि़याबाद आए थे। दिल्‍ली भी गए थे। तमाम विभागों में तमाम प्रशासनिक फाइलें लटकी पड़ी थीं। गोरखनाथ का मठ चलाने वाले के लिए यूपी का मठ चलाना मुश्किल हो गया था। बजट में आवंटित राशि का 40 फीसदी भी खर्च नहीं हो पाया था। योगी ने लोक कल्‍याण में गुहार लगाई कि मुझे मुक्ति दी जाए। मैं ठहरा साधु आदमी, कहां मैनेजमेंट में फंस गया। क्षमा प्रभो! प्रभो बनिया आदमी हैं। उनके खून में ही सौदा दौड़ता है। बोले- महराज, उड़ता तीर जबरन लिया है तो 2019 तक झेल लो। योगी लौट आए। कुछ नहीं सूझा तो एनकाउंटर शुरू करवा दिए ताकि बाकी नाकामियों से ध्‍यान हट जाए।

बीच में एक बार, तो लगा कि पेट खराब चल रहा है। उन्‍हें पता था दो दिन बाद क्‍या होने वाला है। उनके हाथ में अब कुछ नहीं रह गया था। अपने इलाके में अपनी पसंद का कैंडिडेट तक वे नहीं खड़ा करवा सके थे। उधर बीजेपी के काडरों को थोक में हिंदू युवा वाहिनी में शामिल कर के उन्‍होंने जिस तरह से संगठन को निष्क्रिय कर दिया था, यह उनके खिलाफ़ जाना था। रही-सही कसर संघ ने पूरी कर दी जिसका मठ से पुराना वैचारिक राड़ा है। इस तरह मोदी के संभावित उत्‍तराधिकारी का दावा हमेशा के लिए खत्‍म हो गया। मुख्‍यमंत्री होते हुए भी योगी मठ तक महदूद रह गया।

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दूसरी ओर दिन में आज फूलपुर की पहली बढ़त पर मोदी विरोधियों के मन में पहला लड्डू फूटा। फिर गोरखपुर की बढ़त से दूसरा लड्डू फूटा। दिन ढलते-ढलते अचानक लोकतंत्र में सबकी आस्‍था जाग गई। ईवीएम भी सही काम करने लगा। आखिरी वक्‍त में पैदा हुए ”बुआ-भतीजा समीकरण” को कामयाब करार देकर मोदी विरोधियों ने 2019 की रणनीति भाजपा के सामने ज़ाहिर कर दी। इस सब के बीच बेचारा डीएम खलनायक बना दिया गया। अब देश में लग रहा है कि सब कुछ ठीक है। फ्री एंड फेयर है। 2019 को लेकर सेकुलर खेमे में चिंता कुछ कम हुई है। भाजपा को भी ”बुआ-भतीजा” की काट के लिए पूरा एक साल मिल गया है।

गोरखपुर और फूलपुर के से दोनों रीचार्ज कितने दिनों के लिए वैलिड हैं? मात्र एक साल के लिए। इतना समय तो सांसद की शपथ लेकर बड़े-बूढ़ों का पैर छूने में खप जाता है। विरोधियों को इतनी भी खुशी नहीं मिलनी चाहिए? मोदीजी इतने भी निष्‍ठुर नहीं हैं। कमाल करते हैं शुक्‍लाजी! खुश रहिए। लोकतंत्र आ गया है। ईवीएम हेरा गया है। फासीवाद पोस्‍टपोन हो गया है। जोगी मौन हो गया है। मौर्या को दोबारा छाती में दर्द न हो जाए क्‍योंकि संघप्रिय शर्मा खुश नज़र आ रहे हैं। मनोज सिन्‍हा के मन में भी लड्डू फूटा है। एक नहीं, दो। सोचिए, दोनों सीटों पर भाजपा यदि जीतती तो इतना सब काम हो पाता क्‍या? नहीं समझ आ रहा तो ये सब विश्‍लेषण एक कोने में रख दें। योगी को बीआरडी मेडिकल कॉलेज में घुट कर मरे हुए बच्‍चों की आह भी तो लगी होगी! नहीं?

(लेखक परिचय: यह आर्टिकल पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव द्वारा लिखा गया हैं.)

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