इस्लाम धर्म में हज एक पवित्र यात्रा हैं. जो इस्लामिक साल के आखिरी महीने में अदा की जाती हैं. ये यात्रा सभी मुसलमानों को करना अनिवार्य नहीं हैं. हज यात्रा केवल उसी पर अनिवार्य हैं जो अपने दम पर अपने पैसों से हज कर सकता हैं. अन्यथा उस पर अनिवार्य नहीं हैं.

कुरआन मजीद ने फरमाया है कि हज हर उस शख्स पर फर्ज है जो बैतुल्लाह तक जाने की इस्तताअत रखता हो, इस इस्तताअत का मतलब यह है कि इंसान के पास मक्का मुकर्रमा आने जाने और वहां ठहरने, खाने-पीने वगैरह का जरूरी खर्च मौजूद हो और अगर वह बाल-बच्चों को वतन में छोड़ कर जा रहा है तो उनकी जरूरी अखराजात उन्हें देकर जा सके.  ऐसे में स्पष्ट हैं कि कोई भी मुसलमान हज सब्सिडी के जरिए हज करना नहीं चाहता हैं.

हज यात्रा और हज सब्सिडी:

हज यात्रा और हज सब्सिडी का ताल्लुक अंग्रेजों के जमाने से रहा हैं. आज़ादी के बाद भी पंडित जवाहरलाल नेहरु ने इसे जारी रखा. लेकिन वर्तमान में हज सब्सिडी मुसलमानों के लिए नासूर बन गई हैं. राजनेताओं द्वारा हज सब्सिडी का इस्तेमाल मुसलमानों को अपमानित करने के लिए किया जाता हैं. वहीँ दूसरी तरफ सरकार एयर इंडिया को फायदा पहुँचाने के लिए इसका इस्तेमाल कर रही हैं. हज सब्सिडी को खत्म करने को लेकर मुसलमान कई सालों से मांग करते हुए आ रहे हैं. जिसे सरकार खत्म करने के बजाय मुसलमानों को हज सब्सिडी देने के नाम पर 690 करोड़ की राशि एयर इंडिया की झोली में डाल दी जाती हैं.

कैलकुलेशन ऑफ़ सब्सिडी:

फिलहाल मक्का शरीफ से इंडिया के लिये हाजियों का कोटा एक लाख छत्तीस हज़ार (1,36,000) का है.
पिछले साल हमारी गवर्नमेंट ने सालाना बजट में 691 करोड़ हज सब्सिडी के तौर पर मंज़ूर किये थे.
691 करोड़ ÷ 1.36 लाख = 50.8 हज़ार
यानी एक हाजी के लिए 50000 रुपये.
◀ अब ज़रा खर्च जोड़ लेते हैं ▶
पिछले साल एक हाजी को हज के लिए गवर्नमेंट को एक लाख अस्सी हज़ार (1,80,000) देने पड़े.
जिसमे चौतीस हज़ार (34,000) लगभग 2100 रियाल मक्का पहुँचने के बाद खर्च के लिए वापस मिले.
1.8 लाख – 34000 = 1.46 लाख
यानि हमें हमारी गवर्नमेंट को एक लाख छियालीस हज़ार (1,46,000) रुपये अदा करने पडतें हैं.
दिल्ली मुम्बई लखनऊ से जद्दाह रिटर्न टिकट 2 महीने पहले बुक करतें हैं तो कुछ फ्लाइट का किराया 25000 रुपये से भी कम होगा. फिर भी 25000 रुपये मान लेतें हैं. (IRCTC पर चेक कर लीजिये)
खाना टैक्सी/बस का बंदोबस्त हाजियों को अलग से अपनी जेब से करना होता है.
गवर्नमेंट को अदा किये एक लाख छियालीस हज़ार रुपये (1,46,000) में से होने वाला खर्च
फ्लाइट = 25,000
मक्का में रहना (25दिन) = 50,000
मदीना में रहना (15दिन) = 20,000
अन्य खर्चे = 25,000
कुल खर्च हुआ = 1,20,000
कन्फ्यूज़न
मतलब एक हाजी से लिये 1,46,000 रुपये और खर्च आया 1,20,000 रुपये मतलब एक हाजी अपनी जेब से गवर्नमेंट को रूपये 26,000 अधिक देता है. अब असल मुद्दा ये है की जब हाजी सारा रुपया अपनी जेब से खर्च करता है और उसके ऊपर भी 26,000 रुपये और गवर्नमेंट के पास चला जाता है. मतलब लगभग एक हाजी से रूपये 50 हज़ार सब्सिडी मिला कर गवर्नमेंट के पास 76,000 हज़ार हो जाता है तो ये पैसा जाता कहाँ है.
26,000+50,000 =76000 (बचत)× 1,36,000 हाजी = 10,33,60,00,000 (दस अरब तेतीस करोड़ साठ लाख रुपया)
याद रहे की एयर इंडिया कंपनी फिलहाल 2100 करोड़ के घाटे में चल रही है, ये पूरा रुपया एयर इंडिया कंपनी और पॉलिटिशियन के जेब में जाता है. ध्यान दीजिए कि सऊदी अरब सरकार एयर इंडिया को हज यात्रा के लिए एक तरफ के हवाई जहाज़ का ईधन भी मुफ्त में देती है.
यह प्रति व्यक्ति खर्च का गणित है. यदि एक लाख छत्तिस हजार हज यात्रियों को हज कराने का टेंडर निकाला जाए तो इसमें 10 से 15 हजार रूपए की और बचत होगी. जो खर्च बताए गए हैं उनमें एक रूपये का भी अन्तर नहीं है क्योंकि उमरा करने पर लगभग यही खर्च आता है.

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