मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा, मंडला, शहडोल, जबलपुर, बालाघाट ऐसे संसदीय इलाक़े हैं जहां की 32 विधान सभाओं में 25 मुस्लिम आबादी 25 लाख से ज़्यादा है। इस लिहाज़ से इन चार लोकसभा और 32 विधानसभा सीटों पर मुसलमान अकसर हार जीत का फैसला करते हैं। लेकिन मज़ेदार बात है कि इस इलाक़े में मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व शून्य है क्योंकि इनमें से अधिकांश सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं।

आरक्षित सीट होने की वजह से प्रतिनिधित्व का सवाल ही नहीं उठता जबकि 95% से ज़्यादा वोट कांग्रेस की झोली में गिरते हैं। 1998 तक संतुलन बनाने के लिए बदले में कांग्रेस एक मुसलमान को राज्य सभा में नामित करती थी। लेकिन अब हालात बदल गए हैं और मुसलमान अछूत हैं। इन दोयम दर्जे के नागरिकों का सबको वोट चाहिए लेकिन प्रतिनिधित्व देना पाप है।

मंदिर आंदोलन के बाद से किसी को राज्य सभा भेजना दूर इस इलाक़े के किसी मुसलमान को निगम, बोर्ड या आयोग तक में नामित नहीं किया गया। बीजेपी से तो ख़ैर इस सबकी उम्मीद रखना बेकार है लेकिन मुसलमानों के वोट की थोक ठेकेदार कांग्रेस को कम से कम नगर पालिकाओं या नगर पंचायतों में ही हिस्सेदारी देकर कुछ लोगों को संतुष्ट किया जा सकता था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

muslim women voters

मुसलमान राजनीति का केंद्र आज भी भोपाल है और राजधानी के सरकारी मुसलमानों और दलालों के अलावा राज्य में किसी मुस्लिम की धेला भर औक़ात नहीं है। ऐसे में अगर मुसलमान एमआईएम और एसपी/बीएसपी/गोंडवाना पार्टी जैसे विकल्पों की तरफ रुख़ करे तो कांग्रेस को शिकायत नहीं होनी चाहिए।

अगर कमलनाथ शिवराज से बेहतर साबित नहीं होते हैं और कांग्रेस बीजेपी से अच्छी नहीं है फिर क्यों न तीसरा, चौथा या पांचवा विकल्प खोजा जाए? मुसलमान की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं और कांग्रेस को समझना चाहिए कि अब जबकि विकल्प हैं तो बग़ैर हिस्सेदारी दिए मुसलमानों को बांध कर नहीं रखा जा सकता। अब सिर्फ बीजेपी जीत जाएगी से काम नहीं चलने वाला। अगर सीधा प्रतिनिधित्व नहीं दे सकते तो वैकल्पिक व्यवस्था कीजिए वरना ख़ुद एक विकल्प बनने को तैयार रहिए।

वरिष्ठ पत्रकार ज़ैग़म मुर्तज़ा की कलम से…

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