पूरी दुनिया में समाज विज्ञानियों, मीडिया कर्मियों और संचार शोधार्थियों का दावा है कि अख़बार तक़रीबन मर चुके हैं और टीवी दम तोड़ रहा है। अख़बारों की घटती सर्कुलेशन और टीवी समाचारों के प्रति समझदार लोगों की बेरुख़ी इसकी तस्दीक़ करती है।

कितने लोग टीवी देखते हैं, टीवी पर क्या देखते हैं और किस वर्ग में क्या देखा जाता है ये जानना अब बेहद आसान है। बार्क और डीटीएच कंपनियों के डेटा के मुताबिक़ टीवी पर मनोरंजन और रियल्टी शो देखने वाले समाचार देखने वालों से कम हैं। जिन घरों में टीवी देखा जा रहा है वहां कार्टून नेटवर्क और खेल चैनल सबसे ज़्यादा टीआरपी बटोर रहे हैं।

सांभ्रांत तबक़ा अंग्रेज़ी फिल्म, सीरियल को तरजीह दे रहा है। पढ़ने लिखने वाला तबक़ा या तो टीवी से दूर हो रहा है या फिर विज्ञान, समसामयिक और ट्रेवल कंटेंट को तरजीह दे रहा है। फिर समाचार चैनल कौन देखता है?

वारिष्ट पत्रकार, जैगम मुर्तजा

मेरे हिसाब से तो जाहिल और मुसलमान। मैं जिन लोगों को सोशल मीडिया में समाचार चैनल्स, ख़ासकर हिंदी चैनल्स के कंटेंट पर बहस करते देखता हूं उनमें 90% तक मुसलमान होते हैं। समाचार चैनल्स के कंटेंट में मुस्लिम मुद्दों की भरमार और उनको उकसाने वाली बातें मेरे शक को और पुख़्ता करती हैं।

मेरे शक की एक वजह और है। एंटरटेनमेंट सेग्मेंट के मुक़ाबले समाचार चैनल्स की जितनी टीआरपी या बार्क रेटिंग आती है हिंदी भाषी क्षेत्र के तक़रीबन उतने ही मुसलमान घरों में टीवी है।

मुझे पूरा यक़ीन है कि अगर मुसलमान एक महीना टीवी पर समाचार चैनल न देखने की क़सम खा लें तो कई न्यूज़ चैनल हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। मगर ऐसा होगा नहीं क्योंकि हमें लड़ाई-झगड़े में ख़ूब मज़ा आता है। हम खाने के बिना रह सकते हैं मगर टीवी पर बंदर का तमाशा बन चुकी ख़बरों की क़ब्र देखे बिना नहीं रह सकते। अफसोस सद अफसोस।

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